1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

मनोरंजन

गुलजार को फाल्के पुरस्कार

बॉलीवुड के मशहूर शायर और गीतकार गुलजार को फिल्म इंडस्ट्री के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा है. किसी जमाने में गुलजार पेट्रोल पंप पर काम करके पढ़ाई का खर्च निकालते थे.

भारतीय सिनेमा की महत्वपूर्ण शख्शियतों में शुमार जाने माने फिल्मकार गुलजार अपने संघर्ष के शुरूआती दिनों में दिल्ली में सब्जी मंडी में पेट्रोल पंप पर काम किया करते थे. भारत के विभाजन के बाद गुलजार का परिवार अमृतसर में बस गया लेकिन गुलजार का ज्यादातर बचपन दिल्ली में बीता. परिवार के पास उनकी पढ़ाई के लिए पैसे नहीं थे. इसलिए उन्हें पेट्रोल पंप पर नौकरी करनी पड़ी.

हवा में लहराती पेट्रोल की तेज खुशबू के साथ उन्होंने अपनी शायरी को कागज पर उतारना शुरू किया. फिल्मों में करियर बनाने के लिए वे दिल्ली से मुंबई पहुंच गए. वहां उन्होंने एक गैराज में बतौर मैकेनिक काम शुरू किया.

यूं हुई शुरुआत

खाली समय में वे कविताएं लिखते. पाकिस्तान बंटवारे का र्दद बहुत करीब से महसूस करने के कारण उनकी कविताओं में यह एहसास बहुत शिद्दत के साथ उभरकर आता. जल्द ही गुलजार शायरों, साहित्यकारों और नाटककारों के संपर्क में आए. इन्हीं की मदद से वे गीतकार शैलेंद्र और संगीतकार सचिन देव बर्मन तक पहुंचे.

उस वक्त एसडी बर्मन फिल्म बंदिनी के गाने तैयार करने में लगे थे. शैलेंद्र की सिफारिश पर सचिन दा ने गुलजार को एक गीत लिखने को कहा और गुलजार ने पांच दिनों में गीत लिखकर दिया. उन्हें ये इतना पसंद आया कि उन्होंने गीत को अपनी आवाज में फिल्म निर्देशक बिमल राय को गाकर सुनाया. यहां से गुलजार का सिनेमा का सफर शुरू हुआ. जब फिल्म रिलीज हुई तो सभी के होंठों पर यही गामा था.. "मोरा गोरा अंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे."

एए/आईबी (वार्ता)

DW.COM