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मनोरंजन

गुरु से सीखने का विकल्प नहीं

तेजेंद्रनारायण मजूमदार भारत के जानेमाने सरोदवादक हैं. उनका संबंध उस्ताद अल्लाउद्दीन खां द्वारा स्थापित मैहर घराने से है. उनके तकनीकी कौशल, कल्पनाशीलता और भावप्रवणता में श्रोताओं को बांधकर रखने की शक्ति है.

53 वर्षीय तेजेंद्रनारायण मजूमदार के गुरु उस्ताद बहादुर खां भी अपने समय के शीर्षस्थ सरोदवादकों में गिने जाते थे. कालजयी फिल्म ‘गर्म हवा' में उस्ताद बहादुर खां का ही संगीत था. यहां प्रस्तुत है तेजेंद्रनारायण मजूमदार के साथ बातचीत के कुछ अंश:

आपने किस उम्र से संगीत सीखना शुरू किया? क्या आपके परिवार में संगीत का माहौल था? और, सरोद जैसा कठिन साज ही क्यों चुना?

दरअसल हमारे परिवार में बहुत संगीत था. मेरे पिताजी रंजन मजूमदार सितार बजाते थे और उन्होंने वीरेंद्र किशोर रॉयचौधुरी और उस्ताद दबीर खां से सीखा था. मेरे दादा भी संगीतकार थे, लेकिन प्रोफेशनल नहीं. मुझे चार साल की उम्र से ही मेरे दादाजी ने गायन और तबले की शिक्षा देना शुरू कर दिया था. फिर पहले मैंने तीन-चार साल मेंडोलिन बजाना सीखा, फिर सरोद सीखना शुरू किया. शायद परिवार के लोगों ने ही तय कर दिया कि मेरे लिए सरोद ही ठीक रहेगा. मेरे चाचा भी उस्ताद बहादुर खां से सीखते थे. मैंने भी उन्हीं से सीखना शुरू किया.

उस्ताद बहादुर खां के बारे में कुछ बताइये. अब तो लगता है लोग उन्हें काफी कुछ भूल-सा गए हैं.

वे महान सरोदवादक थे, बल्कि कहना चाहिए कि जीनियस थे. वे उस्ताद अल्लाउद्दीन खां के भतीजे थे और उन्हीं से उन्हें पूरी तालीम मिली थी. उनकी टोन, बहुमुखी प्रतिभा, चमत्कृत कर देने वाला कौशल, सब कुछ अद्भुत था. एक समय था जब उनके और उस्ताद अली अकबर खां के बजाने में एक बिन्दु तक फर्क ही नहीं लगता था. पहले वे मुझे दिन में घंटा-दो घंटा सिखाते थे, पर गंडाबंधन के बाद घंटों-घंटों सिखाते थे. दुर्भाग्य से वे सिर्फ साठ वर्ष की आयु में स्वर्ग सिधार गए. फिर मैंने उस्ताद अली अकबर खां से सीखा.

आजकल मैहर घराना तो छाया हुआ है. इसने उस्ताद अली अकबर खां, उस्ताद बहादुर खां, पंडित रविशंकर, पंडित पन्नालाल घोष, पंडित निखिल बैनर्जी, शरण रानी और अन्नपूर्णा देवी जैसे अप्रतिम कलाकार दिये. आज भी पंडित हरिप्रसाद चौरसिया और आप जैसे कलाकार सक्रिय हैं. इस घराने की विशेषताओं के बारे में कुछ बताइये.

हमारा घराना कई दृष्टियों से विशिष्ट है. उस्ताद अल्लाउद्दीन खां ने ध्रुपदियों और रबाबियों से बहुत कुछ सीखा था और वे स्वयं भी अनेक तालवाद्य बजाने में निपुण थे. उनसे पहले इस तरह का शुद्ध और सॉलिड आलाप, जोड़ और झाला बजाने का चलन नहीं था. उन्होंने इसे ध्रुपद से लिया. मसीतखानी, सितारखानी और रजाखानी, विलंबित से लेकर अतिद्रुत लय में गतों का समावेश किया, तबले और पखावज के बोलों को सरोद और सितार के दाहिने हाथ से बजाए जाने वाले बोलों में शामिल किया, खयाल और ठुमरी से भी कुछ चीजें लीं. मतलब यह कि हर तरह से एक रसपूर्ण संगीतशैली का निर्माण किया. साज में भी परिवर्तन किए और ऊपरी हिस्से में चार ड्रोन के तार जोड़े. मैहर शैली के सरोदवादन में नाखून और उंगली के अगले हिस्से की खाल से तार को हल्का सा दबाया जाता है जिससे मधुर, गोल और अधिक समय तक रहने वाली ध्वनि पैदा होती है. और भी बहुत-सी खूबियां हैं.

गुरु-शिष्य परंपरा की बहुत बातें होती हैं. क्या आज भी यह उतनी ही सशक्त है जितनी पचास साल पहले थी? या कुछ बदलाव आया है?

गुरु-शिष्य परंपरा तो आज भी बहुत महत्वपूर्ण है, लेकिन स्थितियां बदल गई हैं. आज न गुरु के पास सिखाने का उतना समय है और न शिष्य के पास सीखने का. जीवन की रफ्तार तेज हो गई है. लेकिन आज संगीत विद्या सीखने के और भी अनेक रास्ते खुल गए हैं. आधुनिक उपकरण और यंत्र गुरु के साथ संपर्क रखने में मदद करते हैं, और उनका लाभ उठाना चाहिए. लेकिन इसके साथ ही यह भी सही है कि गुरु के पास बैठकर उनसे सीधे-सीधे सीखने का कोई विकल्प नहीं है. वही सबसे श्रेष्ठ तरीका है.

युवा संगीतकारों को आप क्या सलाह देना चाहेंगे?

सलाह देने के लिए मैं उपयुक्त व्यक्ति नहीं हूं. फिर भी क्योंकि आप पूछ रहे हैं इसलिए जवाब दे रहा हूं. युवा संगीतकारों को संगीत पर अधिक से अधिक फोकस करना चाहिए, ध्यान देना चाहिए और उसके लिए उनके मन में आदर होना चाहिए. बेहतर होगा यदि वे सफलता हासिल करने के लिए शॉर्ट कट के चक्कर में न फंसें. संगीतविद्या तो एक सागर है. इसके जल से जितना अधिक सराबोर होंगे, उतना ही अच्छा है.

इंटरव्यू: कुलदीप कुमार

संपादन: महेश झा