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मनोरंजन

गुरु-शिष्य परंपरा में ही उपजते हैं कलाकार

ओजेश प्रताप सिंह प्रतिभाशाली शास्त्रीय गायक के अलावा संगीत के गंभीर अध्येता भी हैं. संगीत के सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक दोनों पक्षों से अच्छी तरह परिचित हैं. जानिए किस बात को वह गुणवत्ता घटने के लिए जिम्मेदार मानते हैं.

हिन्दुस्तानी गायिकी में पढ़ाई और पीएचडी करने के बाद वे पिछले पंद्रह सालों से दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे हैं. पिछ्ले कुछ वर्षों के दौरान संगीत के कार्यक्रमों में उनकी प्रस्तुतियों ने गुणीजनों का ध्यान अपनी ओर खींचा है. उनके साथ डॉयचे वेले की बातचीत के कुछ अंश:

आप तो पंडित उल्हास कशाळकर के शिष्य हैं. क्या उनसे पहले भी आपने किसी से सीखा? आप इस क्षेत्र में कैसे आए?

मेरे दादाजी रॉयल इंडियन आर्टिलरी में कप्तान थे और पिताजी भी वायुसेना में रहे हैं. पिताजी को बचपन से ही शायरी और गाने का बहुत शौक था, परन्तु गाना कहीं सीख नहीं पाए. मैं पांच-छह साल का ही रहा हूंगा जब उन्होंने मुझे बेगम अख्तर की गजल "ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया" गुनगुनाते सुना, और उसी दिन वे मेरे लिए हारमोनियम खरीद लाए. उन्होंने तभी से मुझे प्रेरणा दी और बहुत प्रोत्साहित किया. मेरी आदर्श हमेशा ही बेगम अख्तर रही हैं. उनकी गजलों में रागदारी भरी रहती है. उनकी गायकी का अनुसरण करने से मुझे लाभ यह हुआ कि आवाज स्वतः ही तैयार हो गई. हम मोदी नगर में रहते थे जहां संगीत शिक्षा की कोई उचित व्यवस्था न होने के कारण 1982 में पिताजी ने दिल्ली में रामपुर-सहसवान घराने के उस्ताद गुलाम सिराज खां से मुझे शिक्षा दिलवाई जिसमें मुझे उन्होंने ढाई साल तक गजलों के साथ-साथ कुछ राग भी सिखाए. 1989 में दिल्ली में ही ग्वालियर घराने के पंडित महादेव गोविन्द देशपांडेजी से, जो पंडित विनायकराव पटवर्धन के शिष्य थे, तालीम लेनी शुरू की. बीकॉम करने के बाद उन्होंने मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय से संगीत में एम.ए. करने के लिए प्रेरित किया. तब मैंने गजल गाना छोड़कर पूरा ध्यान सिर्फ शास्त्रीय संगीत और रागदारी पर ही केंद्रित कर लिया. 1987 में मैंने रेडियो पर पंडित उल्हास कशाळकर का पहली बार गायन सुना और उनकी गायकी से मैं अत्यंत प्रभावित हुआ. उनका कार्यक्रम प्रत्यक्ष सुनने का सबसे पहला अवसर मुझे 1993 में मिला जिसमें उन्होंने राग धनाश्री एवं बसंत प्रस्तुत किए थे. मैंने उनकी रिकॉर्डिंग लेकर बंदिशों को स्वरलिपिबद्ध कर लिया और जब वे दोबारा दिल्ली आये तो उनसे मिलकर उन्हें दिखाईं. वह बहुत प्रसन्न हुए और मेरे कहने से पहले ही बोले, "तुम आ जाओ हमारे पास, हम सिखाएंगे तुम्हें." तब से उन्हीं से सीख रहा हूं.

आपका संबंध अकादमिक जगत से भी है. क्या आपको लगता है कि संगीत विभागों में जिस किस्म का शोध होना चाहिए, वह हो रहा है? परफॉर्मिंग आर्टिस्ट तो गुरु-शिष्य परंपरा में दीक्षित होकर ही निकलते हैं, लेकिन इन विभागों में उत्कृष्ट रिसर्च तो हो ही सकता है. संगीत को पूरी सामाजिक-ऐतिहासिक प्रक्रिया के साथ जोड़कर नहीं देखा जाता और अक्सर तकनीकी किस्म का शोधकार्य किया जाता है. आपकी क्या राय है?

संस्थागत शिक्षण में विद्यार्थियों को संगीत के प्रयोगात्मक, सैद्धांतिक एवं ऐतिहासिक पक्षों से अवगत अवश्य कराया जाता है किन्तु सिद्ध कलाकार बनने के लिए इन को आत्मसात करने की आवश्यकता होती है जो गुरु के दीर्घकालिक सान्निध्य के बिना संभव नहीं है. इसीलिए कलाकार हमेशा गुरु-शिष्य परंपरा में ही उपजते हैं. आपने सही कहा कि शिक्षा जगत में उत्तम शोध कार्य होना ही चाहिए. मैं वर्ष 1997 से ही विश्वविद्यालय में अध्यापन कर रहा हूं. जब से विश्वविद्यालय में नौकरी और प्रोमोशन के लिए डॉक्टरेट अनिवार्य की गयी है तभी से विवशता में निश्चित समयसीमा के भीतर किये जाने के कारण शोधकार्य की गुणवत्ता में कमी आई है.

मंच पर गाते समय आप किन बातों पर अधिक ध्यान देते हैं. क्या आप भी अपने गुरु की तरह ग्वालियर, आगरा और जयपुर तीनों शैलियों में गाते हैं?

मंच पर गायन प्रस्तुत करते समय किसी घराने विशेष के बारे में न सोच कर मैं प्रस्तुत किये जाने वाले रागों पर ही ध्यान देता हूं. जो राग गुरु जी से जिस प्रकार सुने और सीखे हैं, उन्हें वैसा ही प्रस्तुत करने का प्रयास करता हूं. उन्हें गाते समय वही गायकी प्रबल रहती है. मसलन भूपाली, तोड़ी और मुल्तानी में ग्वालियर, बरवा, धनाश्री और जोगकौंस में आगरा तथा ललितागौरी एवं शुद्धकल्याण में जयपुर गायकी का आधार रहता है. सौंदर्यवृद्धि की दृष्टि से एक घराने की गायकी में कभी-कभी बीच में दूसरी गायकी का कुछ प्रयोग करने से अपनी तथा श्रोताओं की एकरसता भंग होती है, और इस से उनकी उत्सुकता भी बनी रहती है.

शास्त्रीय संगीत का भविष्य आपको कैसा लगता है? कला की श्रेष्ठता और लोकप्रियता, दोनों ही दृष्टियों से.

लोकप्रियता और श्रेष्ठता की दृष्टि से शास्त्रीय संगीत के भविष्य के प्रति मैं पूरी तरह आश्वस्त हूं. युवाओं में इसके प्रति रूचि बढ़ी है, यह विभिन्न कार्यक्रमों में उनकी बढ़ती संख्या देख कर कहा ही जा सकता है. नए कलाकार सामने आ रहे हैं, जिनमें कुछ तो बहुत ही अच्छे हैं. यह देख कर विश्वास होता है कि हमारे शास्त्रीय संगीत की परंपरा अक्षुण्ण रहेगी.

इंटरव्यू: कुलदीप कुमार

संपादन: महेश झा

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