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दुनिया

गुम हो रही युवा पीढ़ी

यूरो संकट ने यूरोप के सामने बड़ी भारी चुनौतियां खड़ी की हैं. खासकर युवा पीढ़ी बेरोजगारी से जूझ रही है. उनके सामने कोई विकल्प नहीं हैं. एक सहायता कार्यक्रम की मदद से यूरोपीय संघ गुम हो चुकी इस पीढ़ी की मदद करना चाहता है.

एलेना सिल्वेस्ट्रा को नौकरी की तलाश है. 25 साल की एलेना मैड्रिड में रहती हैं. कानून और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की पढ़ाई कर चुकी एलेना को एक दो साल पहले नौकरी मिलने में जरा देर नहीं लगती. लेकिन वो दौर खत्म हो चुका है. वह बताती है, "जो नौकरियां हैं उसमें तनख्वाह बहुत ही कम है. पूरे दिन के काम के लिए मुझे 300 यूरो मिलेंगे." ये यूरो रुपये में तब्दील करने पर भले ही ज्यादा लगें लेकिन यूरोप में कोई इतने से पैसे में नहीं रह सकता. एलेना अब अपने माता पिता के साथ रहने लगी है. वही खाने पीने, मकान का और बस का किराया देते हैं.

यूरोप में जारी आर्थिक संकट ने एलेना जैसे युवाओं को बहुत ज्यादा प्रभावित किया है. इस संकट के कारण यूरोपीय संघ के सदस्य देशों में बेरोजगारी की दर 15 से बढ़कर 23 फीसदी हो गई है. यूरोस्टैट के ताजा आंकड़े बताते हैं कि 15 से 24 साल की उम्र के 56 लाख युवा बेरोजगार हैं. बहुत गंभीर स्थिति स्पेन और ग्रीस में है. यहां आधे से ज्यादा लोग बेरोजगार है इनमें स्कूल और यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले शामिल नहीं हैं.

बेबस युवा

डबलिन के ट्रिनिटी कॉलेज में कॉन्सटंटीन गुर्दगीव अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं. वे जानते हैं कि क्यों यूरो संकट में युवा सबसे ज्यादा घिरे हुए हैं. "युवा कर्मचारी संगठन के तौर पर संगठित नहीं हैं और उनके पास सीमित कॉन्ट्रैक्ट हैं. कंपनियों के लिए सस्ता पड़ता है जब वह तंगी की हालत में युवाओं को निकाल सकते हैं. पुराने कर्मचारियों के लिए कंपनी को काफी पैसे देने पड़ते हैं.

अधिकतर बेरोजगार युवाओं का मतलब है सरकार को भी कम कर मिलेगा और चीजें कम खरीदी जाएंगी. युवा जब बहुत कम में जीना सीख जाते हैं तो वह कोई परिवार नहीं बनाते, घर या कार नहीं खरीदते. हमारी सामाजिक प्रणाली जिसमें युवा बूढ़े लोगों की पेंशन का जरिया बनते हैं, वह सामाजिक प्रणाली गड़बड़ा जाएगी.

समाज की चुनौती

इस समस्या के कारण सामाजिक शांति को खतरा पैदा हो सकता है, ऐसा गुर्दगीव का मानना है, क्योंकि युवा पीढ़ी रुढ़िवादी और सोशल डैमोक्रैट दोनों से हताश हो गई है. इस कारण अतिवादी या चरमपंथी गतिविधियां या पार्टियां पनपने लगती हैं. पैरिस, लंदन और हाल ही में स्टॉकहोम में हुए दंगों से अच्छे संकेत नहीं मिलते. समस्या यह है कि भले ही आर्थिक स्थिति सुधर जाए, युवा पीढ़ी जो खो चुकी है वह गुम ही रहेगी, क्योंकि लंबे समय से बेरोजगारों को नए पढ़े लिखे लोगों की प्रतियोगिता में खड़े होना होगा. बिना अनुभव और मोटिवेशन के उनकी स्थिति कोई बहुत अच्छी नहीं होगी.

इस साल की शुरुआत से राजनीतिक एजेंडा पर यह विषय सबसे ऊपर है. जून के आखिर में यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के प्रमुखों ने बेरोजगार युवाओं के लिए एक प्रोग्राम शुरू किया है. अच्छी एडवांस ट्रेनिंग के साथ हर युवा को चार महीने में नौकरी मिल जाए. इसके लिए यूरोपीय संघ छह अरब यूरो खर्च करने के लिए तैयार है.

कॉन्सटंटिन गुर्दगीव बेरोजगार युवाओं को एक सलाह देते हैं, "आने वाले साल बहुत मुश्किल होंगे. इसलिए जो पढ़ा लिखा ट्रेनिंग किया हुआ है उसे यूरोपीय संघ के दूसरे देशों में चले जाना चाहिए."

अगर हालात नहीं बदलते तो एलेना भी यही करना चाहती हैं. ब्रिटेन और जर्मनी में वैसे भी कई स्पेनी हैं, वह लातिन अमेरिका जाना चाहेंगी.

रिपोर्टः मिषाएल हार्टलेप/एएम

संपादनः मानसी गोपालकृष्णन

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