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मनोरंजन

गुम हुई शमशाद की छम छमा छम

साफ, खनकती और आजादख्याल आवाज दशकों पहले हिंदी सिनेमा की पहचान बनी और नया नया बोलना सीखे बॉलीवुड ने झूम झूम कर गाना शुरू किया.

हिंदी सिनेमा जब अपने जन्म के 100 साल का जश्न मना रहा है तभी उसकी शुरूआती आवाजों में से एक शमशाद बेगम हमेशा के लिए खामोश हो गईं. मंगलवार की रात शमशाद बेगम ने आखिरी सांस ली. 94 साल की शमशाद बेगम काफी बीमार थीं. उनके पति गणपत लाल बट्टो का 1955 में निधन हो गया था और उसके बाद से ही वह मुंबई में वो अपनी बेटी ऊषा के साथ रहती थीं. ऊषा ने बताया, "पिछले कुछ महीनों से उनकी तबियत ठीक नहीं रहती थी और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था. पिछली रात उनका इंतकाल हो गया." ऊषा ने बताया कि अंतिम संस्कार में कुछ करीबी रिश्तेदार और दोस्त शामिल होंगे.

घर तो क्या, पास पास पड़ोस या शहर में भी टेलीफोन दुर्लभ था लेकिन उस दौर में भी भारत की लड़कियां प्रेमियों के रंगून जाने और वहां से फोन करने का सपना देखने लगीं. यह उसी आवाज का जादू था जिसने केवल एक गीत गुनगुना कर मासूम आंखों में सपने भर दिए. फिर तो कजरा भी मोहब्बत वाला बना, कहीं पर निगाह रख कहीं निशाने लगाए गए, नाम की पहेली बुझाई गई और हिंदी सिनेमा के दिखाए सपनों की बारिश होती रही. केएल सहगल, सुरैया, तलत महमूद, लता मंगेशकर जैसे नामों के दौर में ही हिंदी फिल्मों ने शमशाद बेगम की आवाज सुनी और कई सालों तक इसके पहलू में रहा.

Indien Pratibha Patil und Shamshad Begum

शमशाद बेगम को पद्मभूषण

अमृतसर में पैदा हुईं शमशाद ने पहली बार पेशावर रेडियो के लिए 1947 में गाया और लोगों के दिल में अपने लिए जगह बना ली. वैसे उनकी सुरीली आवाज ने तो तभी से जादू दिखाना शुरु कर दिया था जब वो पांचवीं क्लास में पढ़ती थीं. उनके प्राइमरी स्कूल की प्रिंसिपल ने तभी उन्हें क्लास का हेडसिंगर बना दिया था. फिर घर रिश्तेदारी में शादी ब्याह या ऐसे ही मौकों पर पारंपरिक गीतों को गाने की शुरूआत हुई. उनकी गायकी और साफ आवाज से प्रभावित हो कर सारंगी के सुल्तान उस्ताद हुसैन बख्शवाले साहेब ने शमशाद बेगम को अपनी शागिर्दी में लिया.

पारंपरिक मुस्लिम परिवार में पैदा हुईं शमशाद कि पिता उनके गाने के खिलाफ थे लेकिन लोगों के समझाने पर कुछ शर्तों के साथ उन्हें घर से बाहर पांव रखने की इजाजत दे दी. उन्होंने साफ कर दिया था कि किसी भी हालत में उनकी तस्वीर न खींची जाए. पिता के आदेशों का असर था या कुछ और, जो भी हो फिल्मों में गाने गाकर बहुत मशहूर होने के बाद भी लंबे समय तक लोगों ने उनकी कोई तस्वीर नहीं देखी थी. वैसे यह भी कहा जाता है कि शमशाद बेगम का चेहरा बहुत खूबसूरत नहीं था और इसलिए वो खुद ही नहीं चाहती थीं कि उनकी तस्वीर सामने आए. बिगड़े राजनीतिक माहौल का भी कुछ असर था कि उनके गाए भजनों में कोई और नाम लिखा गया. बहरहाल इन सब बातों से बेपरहवाह बेगम का जादू हिंदी फिल्मों पर चलता रहा.

लेके पहला पहला प्यार और सैंया दिल में आना रे के साथ छम छमा छम करती शमशाद ने हिंदी फिल्मों के लिए बहुत ज्यादा गाना नहीं गाए लेकिन उस दौर पर उनका असर साफ देखा जा सकता है. खासतौर से 1940-50 के दशक में उनके गीतों ने लोगों में खूब अहसास भरे और वो घर घर में सुनी गुनगुनाई जाने लगीं. उनके गाए गीतों की लोकप्रियता का आज भी ये आलम है कि हिंदी गानों की रिमिक्स बनाने वालों के लिए वो सबसे ज्यादा बिकने वाला नाम हैं.

एनआर/ओएसजे (पीटीआई)

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