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दुनिया

"गुड़िया पीटो नहीं झुलाओ"

सावन की पंचमी पर गुड़िया पीटना, यानी महिला पर हिंसा की प्राइमरी पाठशाला. एक साहसी महिला ने इसके खिलाफ आवाज उठाई पर उसकी आवाज बहुत दूर तक नहीं जा सकी. यहां तक कि मीडिया की भी नजर इस मुद्दे पर ज्यादा नहीं जा पाई.

पूर्वांचल के जौनपुर की ऋचा सिंह ने 1996 में जब पहली बार सीतापुर में सावन की पंचमी पर गुड़िया पीटने का धार्मिक समारोह देखा तो उन्हें ये रस्म महिलाओं पर अत्याचार की पहली पाठशाला लगी. महिला हिंसा की प्राइमरी. क्योंकि केवल लड़के ही गुड़िया पीटने को अधिकृत होते हैं. लड़कियां सिर्फ गुड़ियों को कोड़ों से पिटता देख सकती हैं. ऋचा सिंह बताती हैं कि सबसे मजे की बात ये है कि उन लड़कों की मांएं ही ये गुड़िया नई नई डलियों में बना कर लाती हैं और पतावर के बने 'पटक्के' यानी कोड़े से अपने लड़कों से पिटवाती हैं.

ऋचा सिंह तब सरकार से सहायता प्राप्त संस्था महिला सामाख्या की जिला कार्यक्रम समन्यक के रूप में सीतापुर में थीं. इस घटना से व्यथित हुईं तो अगले सावन की पंचमी तक उन्होंने इस कुरीति के खिलाफ पोस्टर, पर्चे तैयार किए और नुक्कड़ नाटक तैयार कर लिए, "हजारों साल से चले आ रहे धार्मिक रीति रिवाज के खिलाफ बोलना आसान नहीं होता. शुरू में काफी डर लग रहा था. तब तय किया कि इसे बंद करने की आवाज उठाने के बजाए इसे कोई अच्छा सा मोड़ देना चाहिए." तो उन्होंने नारा दिया 'बिटिया पढ़ाओ गुड़िया झुलाओ'.

Indien - Traditionelles Schlagen von Puppen

यूपी में सावन पंचमी पर गुड़ियों की पिटाई

ऋचा उन दिनों को याद कर सिहर उठती हैं कि कैसे उन्होंने 'बेटी' शब्द को भावनात्मक रूप में भुनाया. उनके मुताबिक कोई भी व्यक्ति जो अपनी बीवी को पीटता है, अपनी बेटी के खिलाफ एक भी अपशब्द बर्दाश्त नहीं कर पाता. इसी को उन्होंने अपनी मुहिम की थीम बना लिया और 1997 में पहली बार सीतापुर की मिश्रित तहसील के 15 गांवों में उन्होंने सावन की पंचमी पर 'बिटिया पढ़ाओ गुड़िया झुलाओ' कार्यक्रम का आयोजन किया.

आश्चर्यजनक रूप से ये सफल रहा. इसी से उत्साहित होकर ऋचा ने 1998 में नैमिषारण्य तीर्थ में जहां हर साल करीब तीन चार हजार लड़के गुड़िया पीटा करते थे वहां भी गुड़िया सफलतापूर्वक झुला डालीं. जिला प्रशासन ने भी साथ दिया और खूब वाह वाही हुई.

नैमिषारण्य के नारदानंद आश्रम की शिक्षा सुधार समिति के अध्यक्ष रमेश चंद्र दीक्षित अभी भी उस दिन को कृतज्ञ हैं, "कहते हैं कि किंवदंतियों पर आधारित किसी कुरीति से छुटकारा मिलने पर सब प्रसन्न हैं. बताते हैं कि चंद दिन पहले इस सावन की पंचमी पर भी वहां गुड़िया झुलाई गईं."

लेकिन गुड़ियों को हर साल सावन में पिटने से बचा कर झूला झुलाने का कार्यक्रम सीतापुर की सीमाओं से आगे नहीं बढ़ पाया. हालांकि सामाख्या की सीनियर रिसोर्स पर्सन मनका सिंह का दावा है कि ऋचा सिंह की इस मुहिम को सामाख्या 18 जिलों के गांवों में चला रही है. लेकिन यूपी के बाकी बचे 57 जिलों में अभी भी गुड़िया शायद पीटी ही जा रही हैं.

Indien - Stöcke zum traditionellen Schlagen von Puppen

इन लकड़ियों से होती है पिटाई

ऋचा सिंह इससे हतोत्साहित नहीं हैं. कहती हैं कि कोई भी बीज कभी न कभी अंकुरित होता है, कभी न कभी फलता फूलता है. लेकिन वो इससे इनकार नहीं करतीं कि सामाख्या को इसके लिए और बड़ी रणनीति बनाकर इसके खिलाफ कमर कसनी चाहिए थी. उन्होंने सामाख्या छोड़ी, इससे भी ये मुहिम कमजोर हुई.

ऋचा ने अब संगतिन किसान मजदूर संगठन बना लिया है, इंडो फ्रेंच एसोसिएशन की फेलो हैं. मीडिया की बेरुखी पर उन्हें आश्चर्य है. कहती हैं कि जरा जरा सी बात को खबर बना देने वाले टीवी ने इस मुहिम को राष्ट्रीय स्तर पर कभी दिखाया ही नहीं. अखबारों में छपा पर शीर्ष स्तर पर ध्यान नहीं खींचा जा सका. वर्ना अब तक गुड़िया पीटना बंद हो चुका होता क्योंकि इस रीति का कोई धार्मिक आधार ही नहीं है. बड़े महिला संगठनों ने भी इस कुरीति के खिलाफ कभी आवाज नहीं उठाई. ऋचा सिंह के मुताबिक ऐसे अधिकांश संगठन शहरी हैं.

रिपोर्टः सुहेल वहीद, लखनऊ

संपादनः ए जमाल

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