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जर्मन चुनाव

गुजरात मॉडल से बर्बाद बनारसी साड़ी

भारत में चुनाव प्रचार के दौरान हर कहीं गुजरात मॉ़ल की बात कर रहा है. कोई उसके पक्ष में कोई विरोध में. लेकिन गुजरात मॉ़डल ने बनारसी साड़ी को तबाही के मुहाने पर ला खड़ा किया है, नरेंद्र मोदी बनारस से भी चुनाव लड़ रहे हैं.

विख्यात भारतीय महिला परिधान, बेहतरीन कारीगरी और नर्म नाजुक रेशम पर बनी बनारसी साड़ी पिछले पांच साल में बाजार से लगभग गायब हो गई है. इसकी जगह ले ली है गुजरात के शहर सूरत में बनने वाली नकली बनारसी साड़ी ने. सूरत में यह सिंथेटिक धागे पर तैयार होती है. यानी यह पालिएस्टर की हुई, जबकि बनारसी साड़ी बेंगलूरु और चीन से आने वाले रेशम के धागे पर तैयार की जाती है.

बनारसी साड़ी किसी भी मौसम में जिस्म को आराम पहुंचाती है. सूरत की साड़ी में फॉल अच्छी नहीं गिरती, जबकि बनारसी साड़ी हर एतबार से जिस्म पर फबती है. लेकिन सूरत की साड़ी सस्ती होती है. बनारस की जो साड़ी कम से कम 500 में तैयार होती है वैसी ही साड़ी सूरत वाले 100 में तैयार कर देते हैं. हालांकि असली बनारसी साड़ी करीब 10 हजार रुपये की पड़ती है.

यही वजह है कि बनारसी साड़ी के लगभग 90 फीसदी बाजार पर सूरत की नकली बनारसी साड़ी का कब्जा हो चुका है. सूरत की नकली बनारसी साड़ी की बढ़ती मांग से बनारसी बुनकर भुखमरी के कगार पर पहुंच गए हैं. बड़ा बाजार, पीली कोठी, अलईपुर, मदनपुरा, लल्लापुर, बजरडिहा, कोटवा, लोता, रामनगर, सराय मोहान और आदमपुर के बुनकर मायूस है. चुनाव प्रचार में इन्हें सबसे ज्यादा गुजरात मॉडल डरा रहा है.

वीविंग में राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित हाजी अब्दुल मतीन बताते हैं कि पांच साल पहले सूरत के व्यापारी बनारसी साड़ियां खरीद ले गए और उन्होंने उसका डिजाइन नकल किया और सिंथेटिक साड़ी बनाने लगे. अब हालत यह है कि बनारस के बाजार में ही 90 फीसदी सूरत की नकली बनारसी साड़ी भरी पड़ी है. खरीदार बनारस से सूरत की बनारसी साड़ी ले जा रहे हैं. हाजी मतीन ने बताया कि गुजरात में 50-50 लाख की कीमत वाले हजारों जैकार्ड लग गए. वहां सरकार सब्सिडी देती है, हमें कोई पूछता भी नहीं है. हम लोग गरीब हैं, हमारा कोई पुरसानेहाल भी नहीं है. पर अब हम लोग भी छोटे जैकार्ट लगाने जा रहे हैं.

Webindustrie in Benaras Indien

बुनकरों को इस चुनाव से बहुत उम्मीदें हैं.

मोहम्मद सलमान को रंज है कि बनारसी साड़ी की कला मरती जा रही है. बताते हैं कि पिछले पांच सालों में बेंगलुरु से आने वाले रेशम के दाम 1400 रुपए किलो से 4200 रुपए हो गए. इसमें 30 फीसदी ड्यूटी है. अगर यह ड्यूटी ही माफ कर दी जाए तो 1200 रुपए किलो की बचत है. कहते हैं, "हम लोग भी हैंडलूम छोड़ पॉवर लूम ले आए. लेकिन लागत कम नहीं हुई." इंजीनियरिंग कर चुके अब्दुल रहीम बनारसी साड़ी की कला को बचाने मैदान में उतरे हैं. बोले कि डर उस दिन से है जब बनारसी बुनकर भी कहीं पालिएस्टर न अपना लें, बनारस सूरत न बन जाए.

बड़ा बाजार में जाकिर अली, शमीम हैदर, शेर अली बताते हैं कि जिस दिन लूम चलता है उसी दिन 100 रुपए मजदूरी मिलती है. हालत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही है. वे कहते हैं, "जबसे सूरत की साड़ी ने बाजार पकड़ा है हम लोगों को पेट के लाले पड़ गए. अब मांग ही नहीं बची तो माल बनेगा क्यों, जब माल नहीं बनेगा तो हमें कहां से मिलेगा मेहनताना." पांच साल पहले रोजाना 15 से 20 हजार साड़ियां बनती थीं जबकि अब चार पांच हजार ही बन रही हैं, और तब मंहगाई भी इतनी नहीं थी तो 100 रुपए में घर चल जाता था लेकिन अब नहीं चलता.

पास खड़े युवा मुकर्रम अगले हफ्ते सूरत के एक साड़ी मिल में काम करने सूरत जा रहे हैं. उनके घर के दो लोग पहले ही जा चुके हैं. बताया कि छपरा-सूरत एक्सप्रेस रोज 11 बजे वाराणसी कैंट से रवाना होती है, उसी से चले जा रहे हैं बनारस के बुनकर. दस हजार से ज्यादा बनारसी बुनकर सूरत में रोजी रोटी के लिए पलायन कर चुके हैं. गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी बनारस से ही चुनाव लड़ रहे हैं और गुजरात मॉडल की बात भी जोर शोर से करते हैं. बनारस के बुनकरों के चेहरों पर गुजरात मॉडल की चर्चा और अधिक मायूसी बिखेर देती है.

रिपोर्ट: सुहैल वहीद, वाराणसी

संपादन: महेश झा