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दुनिया

गांवों से पहले खुद को सुधारें नेता

भारत में एसडीएम, डीएम, पार्षद, ग्राम प्रधान, जिला पंचायत सदस्य व अध्यक्ष, विधायक, सांसद, सीएम और पीएम सब हैं. तो फिर दिक्कत कहां है. दिक्कत है मंशा और ईमानदारी में, इनके बिना आदर्श ग्राम योजना भी विकलांग हो जाएगी.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चाहते हैं कि संसद में बैठे उनके सभी साथी सांसद, एक गांव को गोद लेकर 2016 तक चमकाएं. ये वाकई अच्छी पहल हो सकती है. गांवों का विकास होना चाहिए. लेकिन पहले इन सांसदों को खुद बताना चाहिए कि वो गांवों के बारे में क्या जानते हैं. क्या उन्हें पता है कि गांव में राशन कार्ड में नया नाम लिखवाने में कैसी हालत खराब होती है. जमीन के मामले में कैसे पटवारियों के पैर पकड़ने पड़ते है. एक बार ट्रांसफार्मर फुंक जाए तो कितने दिन बिना बिजली के रहना पड़ता है. गांवों के विकास के लिए आने वाली योजनाएं किस गर्त में चली जाती हैं.

केंद्र से हर साल हर गांव के लिए कम से कम करोड़ों रुपये की योजनाएं आती हैं. ईमानदार ग्राम प्रधान इनका बखूबी इस्तेमाल करते हैं. हिमाचल, महाराष्ट्र और गुजरात के कुछ गांव इसकी मिसाल हैं. लेकिन अगर ग्राम प्रधान ही उदासीन या भ्रष्ट हो तो क्या किया जाए. भारत के लाखों गांवों में रहने वाले ग्रामीणों से अगर पूछ लीजिए कि वो अपने विधायक या सांसद से कैसे मिल सकते हैं तो वो ऐसे खिसियाएंगे, जैसे राजा के सामने रंक.

Deutsche Welle Hindi Onkar Singh Janoti

ओंकार सिंह जनौटी

राजनीतिक पार्टियों की तरह सांसदों और विधायकों के लिए गांवों का मतलब जाति आधारित वोट बैंक वाला इलाका है. बीते दो दशक की राजनीति को देखें तो पता चलता है कि माननीय सांसद सिर्फ शहरों तक सिमट जाते हैं. गांव जाने में उन्हें कष्ट होता है. हां, आपदा आ जाए तो उन्हें हेलिकॉप्टर में उड़ते हुए नीचे देखना बड़ा मनोरंजक लगता है. ज्यादातर सांसद या विधायक अगर कभी गांवों में जाते भी हैं तो वे लोगों से सीधे बातचीत करने के बजाए अपने स्थानीय एजेंटों (छुटभैये नेताओं) की मदद लेते हैं. ज्यादातर मामलों में सांसद अपने करीबी लोगों को ठेका देकर गांव में कुछ बनवा देते हैं और रिबन काटने पहुंच जाते हैं. अगर सांसद या विधायक निधि से कोई इमारत बने तो उसमें सबसे अच्छी क्वालिटी की एक ही चीज होगी - स्मृति पटल, जिसमें काले संगमरमर में स्वर्णिम अक्षरों में नेताजी का नाम और उद्घाटन की तारीख लिखी होगी. बाकी सब ठेकेदारों के हिसाब से बना होगा.

चुनावी मौसम में गांव के भोले लोगों को सब्जबाग दिखाने के बाद नेता जैसे ही बाहर निकलते हैं, उनके एजेंट सम्राट वाली अकड़ में आ जाते हैं. ये ग्रामीणों को बता देते हैं कि फलां काम कराना है तो मेरे सहयोग के बिना नहीं हो सकेगा. गांवों की असली मुश्किल यही है.

प्रधानमंत्री को साथी जन प्रतिनिधियों से यह भी पूछना चाहिए कि उनके इलाके में कितने गांवों में रोडवेज की बसें जाती हैं. क्या घाटे में जाते ही गांवों के लिए सरकारी परिवहन सेवा बंद करना सही है. भारत के ज्यादातर ग्रामीण आज टैक्सियों में भेड़ बकरियों की तरह सफर कर रहे हैं. डीजल के दाम बढ़ते ही किराया बढ़ जाता है, दाम कम होते ही किराया नीचे नहीं आता. एक थोड़ी, दर्जनों परेशानियां हैं साहब.

असल में बीते 60 साल में राजनीतिक पार्टियां और नेता जान चुके हैं कि गांवों में कुछ मत करो, जनता जागरूक होगी ही नहीं, तो सवाल भी नहीं करेगी. मोदी जी, बस इसी जनता को जागरूक कर दीजिए, बाकी काम वो खुद कर लेगी.

ब्लॉग: ओंकार सिंह जनौटी

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