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मनोरंजन

गहनों की चमक में छिपा दर्द

चेहरे और आंखों का नूर बनते गहनों की चमक में उन तकलीफों के धब्बे नजर नहीं आते जो खान मजदूरों के चेहरे पर बिछी होती हैं. पहनने वालों को तो अहसास भी नहीं होता कि इस चमक में कितना दर्द मिला है.

जर्मन शहर कोलोन में गहने की दुकान चलातीं नीना वोस ने यह करियर चुनते वक्त पर्यावरण, सही कारोबार और उचित खनन जैसी बातें दिमाग में नहीं रखी थीं. उन्हें तो धातु के टुकड़ों को जोड़ खूबसूरत गहने बनाने का शौक था. बहुत से लोग है जिन्हें नीना का काम पसंद है और वो उनकी बनाई चीजें बड़े शौक से खरीदते हैं. नीना मानती हैं कि इस्तेमाल हुई धातुओं का खनन उचित तरीके से हुआ हो, यह ध्यान रखना बेहद जरूरी है.

डीडब्ल्यू से बातचीत में उन्होंने कहा, "मैंने हमेशा कोशिश की है कि टिकाऊ तरीका अपनाऊं, लेकिन शुरुआत में मैंने ऐसा नहीं सोचा था. फिर एक दिन अचानक मेरे मन में आया कि यह सामान आता कहां से है और तब मैंने फैसला किया कि गहनों के लिए हमेशा उचित खनन के जरिए मिला सोना और चांदी ही इस्तेमाल करूंगी." एक बार यह विचार मन में आ गया तो उन्होंने तय कर लिया कि वो हर स्तर पर यह देखेंगी कि सामान कैसे बन रहा है. नीना की कंपनी कोरेक्टे क्लुंकर (सही चमक) के लिए अर्जेंटीना की उन खानों से सोना चांदी आता है जहां उचित तरीके से खनन होता है. वो जानती हैं कि धातुओं को साफ करने में किन रसायनों का इस्तेमाल होता है और ध्यान रखती हैं कि पर्यावरण को नुकसान कम से कम हो.

उचित कीमत

नीना आठ साल से गहनों की दुकान चला रही है लेकिन पिछले चार साल से उन्होंने इस ओर खास ध्यान दिया है और अब वो लोगों तक इन खास गहनों को पहुंचाने में माहिर हो गई हैं. हालांकि सब कुछ बदलना उनके लिए इतना आसान नहीं था. वो बताती हैं कि अगर चीजों की सप्लाई के हर स्तर पर आप आंख बंद कर लें तो काम सस्ते में हो जाएगा लेकिन सब उचित हो यह सुनिश्चित करने पर खर्च बहुत बढ़ जाता है. नीना खुद को खुशकिस्मत मानती हैं, "मेरे पास ऐसे ग्राहक हैं जो गहने पहनने के साथ ही पर्यावरण और लोगों की जिंदगी पर पड़ने वाले असर के बारे में सोचते हैं."

लोगों की पसंद में जागरुकता भी शामिल हो जाए तो बदलाव आ सकता है. नीना ने देखा है कि थोड़ी ज्यादा कीमत देकर लोग अंतरात्मा को खुश करना चाहते हैं. उचित खनन से आए सोने चांदी या दूसरे धातु की कीमत सामान्य धातुओं की तुलना में बहुत ज्यादा नहीं लेकिन ज्यादा जरूर है. हालांकि डिजायनरों की भीड़ में नीना जैसी सोच रखने वाले लोग कम ही हैं. वह अपने विरोधियों पर आरोप नहीं लगातीं. वो खुद भी जब तक इस बारे में नहीं जान गईं तब तक उनके जैसे ही करती थी. नीना बताती हैं, "जब तक मैंने ढूंढा नहीं तब तक मैने खानों की तस्वीर नहीं देखी थी. ट्रेनिंग के दौरान भी हमें नहीं दिखाया गया. छात्रों को इनके बारे में बताना चाहिए, उनके लिए यह देखना समझना जरूरी है."

अच्छी बात यह है कि लोग इनके बारे में अब सोचने लगे हैं और इनकी मांग धीरे धीरे ही सही, पर बढ़ रही है. खास तौर से शादी की अंगूठी के लिए लोग इनकी खूब मांग करने लगे हैं.

रिपोर्टः सारा अब्राहम/एनआर

संपादनः मानसी गोपालकृष्णन

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