1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

ब्लॉग

गर्भवती होना नौकरी न देने का आधार नहीं

गर्भावस्था को निजी नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी के तौर पर देखने का नजरिया अब भारत में भी आगे बढने लगा है. इस राह में सामाजिक और सरकारी संस्थाओं द्वारा रोड़े अटकाने की प्रवृत्ति पर न्यायपालिका सख्त रवैया अपना रही है.

ताजा मामला पंजाब का है जहां सेना की चिकित्सा इकाई में भर्ती प्रक्रिया को पार करने के बाद सफल अभ्यर्थी महिला को महज गर्भवती होने के आधार पर नौकरी ज्वाइन करने से रोक दिया गया. पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने सैन्य प्रशासन की इस प्रवृति को तरक्कीपसंद समाज की राह में बाधक बताते हुए महिला को ज्वाइन कराने का आदेश दिया है.

फैसले का आधार

भारत में महिलाओं को बराबरी के अधिकार से वंचित करने की दकियानूसी सोच को बदलने के लिहाज से यह फैसला काफी अहमियत रखता है. फैसले का तकनीकी आधार कानून में पुरुष और महिलाओं को प्राप्त समानता के मौलिक अधिकार को ही बनाया गया है. लेकिन अदालत ने फैसले में कहा कि आधुनिक भारत में ऐसी सोच के लिए कोई जगह नहीं है. दरअसल अदालत का बयान बदलाव की उस बयार की स्वीकारोक्ति‍ है जो लैंगिक आधार पर नाबराबरी की सोच को चुनौती देता है. साथ ही इस फैसले का सामाजिक लिहाज से भी महत्व है. जो यह स्पष्ट संकेत देता है कि सामाज को यह सोच बदलनी होगी जो यह मानती है कि बच्चों की पैदाइश और परवरिश की जिम्मेदारी सिर्फ महिला की है.

अदालत के फैसले का संदेश साफ है कि देश समाज और परिवार के निर्माण, विकास और उत्थान में पुरुष और महिला की अगर बराबर भागीदारी है तो घर परिवार से लेकर बच्चों की परवरिश और पैदाइश की जिम्मेदारी में भी पुरुषों को ही नहीं बल्कि समाज को भी अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करना होगा. और समाज एवं व्यवस्था के स्तर पर यह जिम्मेदारी सरकारी दफ्तरों सहित सभी संस्थान, संगठन और प्रतिष्ठानों को महज गर्भावस्था जैसे आधारों पर महिलाओं को रोकने की मनोवृत्ति बदलकर निभानी होगी.

फैसले की अहमियत

इस फैसले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू इसका यूनीफॉर्म सर्विसेज से जुडा होना है. दरअसल सैन्य एवं अन्य वर्दीधारी सेवाओं में महिलाओं के लिए सीमित विकल्प और कठोर सेवा शर्तें इस तरह के दकियानूसी फरमानों को प्रश्रय देते है. इस मामले में अदालत ने तथ्य एवं परिस्थितियों के आधार पर भर्ती प्रक्रिया पूरी होने के बाद नौकरी ज्वाइन करने की अवधि में गर्भधारण करने के आधार पर महिला के आवेदन को ही रद्द कर देने को गलत ठहराया है. इसे मनमाना बताते हुए अदालत ने कहा कि आधुनिक होते समाज में ऐसे मनमाने फैसलों को जगह नहीं दी जा सकती है.

इसका फायदा न सिर्फ सैन्य सेवाओं में भेदभावपूर्ण सेवा शर्तों का सामना कर रही महिलाओं को मिलेगा बल्कि विमानन सेवाओं और मनोरंजन जगत में काम करने वाली महिलाओं के लिए भी इस फैसले ने भविष्य में भेदभाव के खिलाफ मुहिम का कानूनी आधार मुहैया करा दिया है. बात सिर्फ बराबरी के हक की नहीं है. बल्कि समाज को संवारने की जिम्मेदारी में पुरुष और महिला की बराबरी की भागीदारी को सुनिश्चित करने की है. समाज को अपना नजरिया बदलने के लिए अदालत के इस फैसले को तासीर भरी नजरों से देखना होगा तभी इसकी सचेत स्वीकारोक्ति संभव हो सकेगी.

ब्लॉग: निर्मल यादव

DW.COM

संबंधित सामग्री