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ब्लॉग

गरीब छात्रों के भविष्य पर नीट का फंदा

दलित छात्रा एस अनीता की आत्महत्या के बाद तमिलनाडु की राजनीति और दलित समाज में उबाल है. लोग एक सुर में सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश को कोस रहे हैं जिसमें मेडिकल में दाखिले के लिए नीट परीक्षा को अनिवार्य बना दिया था.

तमिलनाडु के अरियालुर जिले के कुजमुर गांव में दिहाड़ी मजदूर की बेटी, एस अनीता ने इंजीनियरिंग और मेडिकल परीक्षाओं में रैंक हासिल कर ली थी. डॉक्टर बनने का ख़्वाब संजोए अनीता ने इंजीनियरिंग में सीट के ऑफर को ठुकरा दिया था लेकिन तभी उसके इरादों पर नीट की गाज गिर गई. मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया, एमसीआई ने नीट प्रवेश परीक्षा (नेशनल एलिजिबलिटी एंट्रेंस टेस्ट) प्रस्तावित की थी और पिछले साल इसमें राज्यों को रियायत दी गई लेकिन इस साल अनिवार्य कर दिया गया. अनीता इसी फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपना केस लड़ रही थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट से उसे निराशा हाथ लगी. दुख और हताशा में अनीता ने अपनी जान दे दी. तमिल माध्यम से 12वीं की स्टेट बोर्ड परीक्षा में 1200 में से 1176 अंक भी उसे बचा नहीं पाए.

इस मामले से नीट की प्रक्रियागत खामियों को लेकर जारी बहस फिर तेज हो गई है. कई आलोचक कह चुके हैं कि नीट जिस सीबीएसई पाठ्यक्रम के आधार पर और जिस अकेली अंग्रेजी भाषा और राज्यवार अनूदित भाषाओं में एक समान परीक्षा पूरे देश में करा रहा है उससे राज्यों के शिक्षा बोर्डों के तहत अपनी मातृभाषाओं में पढ़ने वाले छात्रों खासकर वंचित तबकों के छात्रों पर बुरी मार पड़ेगी. तमिलनाडु जैसे राज्य, सीबीएसई का पैटर्न नहीं फॉलो करते हैं, इसलिए वे अपनी प्रवेश परीक्षाएं संचालित कराते आ रहे थे, लेकिन नीट के जरिए एमसीआई ने राज्यों के इस अधिकार को एक तरह से कुचल दिया. और न जाने कैसे सुप्रीम कोर्ट को भी एमसीआई का तर्क वाजिब लगा, जबकि यही अदालत नीट को पहले खारिज भी कर चुकी है.

तमिलनाडु में करीब ढाई हजार सरकारी स्कूल हैं जहां उच्च माध्यमिक स्तर यानी हायर सेकेंडरी तक की पढ़ाई होती है. अगर वहां के सीबीएसई स्कूलों की बात करें तो करीब छह सौ स्कूलों में से हायर सेकेंडरी पढ़ाई वाले स्कूल कम हैं. देश में सबसे अधिक सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) वाले राज्यों में तमिलनाडु भी एक है. राष्ट्रीय औसत से दोगुना नामांकन यहां पर छात्रों का रहा है. यहां तक कि लड़कियों की दर भी 22.7 फीसदी की राष्ट्रीय औसत के सापेक्ष 42.7 फीसदी है. लेकिन नीट से सीबीएसई पृष्ठभूमि वाले छात्रों को ज्यादा फायदा मिला है. तमिलनाडु की ही बात करें तो पता चलता है कि राज्य के टॉप मेडिकल कॉलेजों में अधिकांश सीटें सीबीएसई छात्रों को मिली हैं. आनुपातिक लिहाज से बेशक उनका प्रतिशत कम है लेकिन आंकड़े बताते हैं कि नीट निकालना, स्थानीय बोर्डों के छात्रों की तुलना में उनके लिए अपेक्षाकृत रूप से ज्यादा आसान और सहज रहा है.

नीट परीक्षा में 12वीं परीक्षा के अंकों का कोई महत्त्व नहीं है जबकि तमिलनाडु में यही व्यवस्था थी. नीट के पेपर का स्टाइल, बहुविकल्पीय प्रश्न व्यवस्था, सीबीएसई छात्रों के ज्यादा अनुकूल बैठती है और जो सवाल क्षेत्रीय भाषाओं में अनूदित भी हैं तो उनकी संप्रेषणीयता भी एक मुद्दा है. ये सब बातें, अनीता जैसी प्रखर छात्रा के लिए भी एक भारी पत्थर बन गईं. नीट को लेकर केंद्र का रवैया असावधान, लापरवाह और संदिग्ध ही लगता है. मानो उसमें कोई न इच्छा है न दूरदर्शिता. यही हाल तमिलनाडु सरकार का रहा जो नीट को लेकर दबाव बनाने में नाकाम रही. नीट की जबर्दस्ती, अनिता की आत्महत्या और तमिल छात्रों का आक्रोश बताता है कि केंद्रीयकृत व्यवस्था, राज्यों के हितों की अनदेखी करती आ रही है. और ये सिर्फ केंद्र सरकार बनाम राज्य की सरकार का मामला नहीं, ये सरकार बनाम सामाजिक ढांचे की लड़ाई भी है. उस तानेबाने से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती जिनसे इस महादेश का निर्माण हुआ. कुल भारतीयता, अलग अलग बहुत सारी स्थानिकताओं से ही बनी है. इन स्थानिकताओं को अनदेखा नहीं उन्हें जगह देनी होगी.

नीट की बाध्यता, अनीता जैसे गरीब बच्चों के भविष्य और राज्यों की विवशताओं के बीच इस मामले ने एक बार फिर शिक्षा के व्यवसायीकरण पर भी सवाल उठाए हैं. राज्य अब भी पिछड़े इलाकों और कमजोर संसाधनों का हवाला दे रहे हैं लेकिन ये पूछा जाना चाहिए कि अगर अनीता जैसे प्रतिभाशाली छात्र एक दयनीय शैक्षिक पर्यावरण में पढ़ रहे हैं तो इसका दोषी कौन है. क्यों नहीं ये हालत सुधरे हैं. ये साफ है कि राज्यों ने भी इस पर कम ध्यान दिया है. अगर सामाजिक स्थिति में सुधार नहीं हुआ है तो फिर बात शिक्षा की ही नहीं रह जाती, कमी उस बुनियादी मशीनरी में है जो विकास के लिए जवाबदेह है. अपनी राजनीतिक लड़ाइयों, महत्वाकांक्षाओं और केंद्र के साथ अन्य टकराहटों और राज्यों में निजी सेक्टर के बेशुमार निवेश के बीच गरीबी और पिछड़ापन मिटाने या शिक्षा में सुधार के ठोस कार्यक्रम या तो पीछे चले गए हैं या भुला दिए गए हैं या निजी स्वामित्व के हवाले कर दिए गए हैं.

शिक्षा को लेकर सरकार की उदासीनता का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि पिछले तीन वर्षों में केंद्र का शिक्षा बजट कम होता गया है. इस समय ये 3.65 फीसदी का है. जीडीपी के एक हिस्से के रूप में शिक्षा का खर्च देखें तो 2013-14 में ये 0.63 फीसदी था तो 2017-18 में इसके 0.47 फीसदी होने का अनुमान है. 2015-16 में राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान और राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान को कुल शैक्षिक मद का कुल सात फीसदी बजट ही मिल पाया था. कहने को प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक नामांकन के आंकड़े सुनहरे हैं लेकिन सिर्फ दाखिले ही तो शैक्षिक विकास के परिचायक नहीं हो सकते. क्योंकि अगर यही पैमाना होता तो बहुत अच्छे अंकों से उत्तीर्ण दलित लड़की अनीता को कोर्ट पहुंचना और हार कर चले जाना नहीं पड़ता.

बेशक इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए, लेकिन आक्रोश की अभिव्यक्ति तो होगी ही. तमिलनाडु का आंदोलन अन्य राज्यों को भी उठेगा और नीट के खिलाफ माहौल बनेगा. केंद्र भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले की आड़ में ज्यादा देर चुप नहीं बैठे रह सकता. जाहिर है किसी समरूप परीक्षा प्रणाली में नहीं बल्कि समाधान, उस सामाजिक सांस्कृतिक विविधता के स्वीकार में है जिससे इस देश की पहचान है.

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