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दुनिया

गरीबी से जूझते दीपों के कारीगर

कभी उत्सवों की शान समझे जाने वाले दीपों का व्यवसाय आज संकट के दौर से गुजर रहा है और दीपावली में रोशनी करने वाले मिट्टी के कारीगर आज दो जून की रोटी के लिए तरस रहे हैं.

करवा चौथ हो या अहोई अष्टमी, दीपावली हो अथवा कोई अन्य त्योहार, ये कुम्हारों के चाक और बर्तनों के बिना पूरे नहीं होते. कुम्हार के चाक से बने खास दीपक दीपावली में चार चांद लगाते हैं लेकिन बदलती जीवन शैली और आधुनिक परिवेश में मिट्टी को आकार देने वाला कुम्हार आज उपेक्षा का दंश झेल रहा है. बाजारों में चाइनीज झालरों की धमक ने मिट्टी के दीपक की रोशनी को फीका करना शुरु कर दिया है.

ताजगंज निवासी कुम्हार राजाराम बताते हैं कि जब दीये की खरीददारी करने वाले ही कम रह गए हैं तो ज्यादा बनाने से क्या फायदा. शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक चायनीज दीये की मांग हर साल बढती ही जा रही है. दो जून की रोटी के लिए कड़ी धूप में मेहनत करने वाले कुम्हार का परिवार मिट्टी के व्यवसाय में महीनों .लगा रहता है उसके बावजूद न तो उसे वाजिब दाम मिलते हैं और न ही खरीददार. समय की मार और मंहगाई के चलते लोग अब मिट्टी के दीये उतने पसंद नहीं करते. चीन में निर्मित बिजली से जलने वाले दीये और मोमबत्ती दीपावली के त्योहार पर शगुन के रुप में टिमटिमाते नजर आते हैं.

मिट्टी के व्यवसाय से जुड़े 70 वर्षीय भूरेलाल का कहना है कि अब मिट्टी के दीप का जमाना गया. कभी दीपावली पर्व से एक महीने पहले मोहल्लों में रौनक हो जाती थी और कुम्हारों में भी यह होड़ रहती थी कि कौन कितनी कमाई करेगा लेकिन अब तो खरीददार ही नजर नहीं आते.

बरसों से मिट्टी के बर्तन बेचकर पेट पालने वाले छोटेलाल का कहना है, "महंगाई की मार से मिट्टी भी अछूती नहीं रही, कच्चा माल भी महंगा हो गया है. दिन रात मेहनत के बाद हमें मजदूरी के रुप में अस्सी से 100 रुपये की कमाई हो पाती है. इससे परिवार का गुजारा नहीं हो पाता."

ताजनगरी में मोती कटरा, कुम्हार पाड़ा, आवास विकास तथा सिकंदरा ऐसे क्षेत्र हैं जहां कुछ परिवार इस व्यवसाय से जुडे हैं जो किसी तरह जीवन यापन कर रहे हैं. पर्यावरण के लिहाज से मिट्टी के बर्तन खास होते हैं, इनसे किसी प्रकार का नुकसान नहीं होता. प्रयोग के बाद मिट्टी के बर्तन समाप्त हो जाते हैं फिर भी बाजार में इनका कोई मोल नहीं.

कड़ी मशक्कत के बाद वाजिब दाम नहीं मिलने से कुम्हार अब अपना पैतृक व्यवसाय छोडने को मजबूर हैं क्योंकि इससे उनके परिवार का गुजर बसर मुश्किल हो गया है. मिट्टी के व्यवसाय से जुडे एक अन्य निर्माता का मानना है कि अभी भी कुछ ऐसे लोग हैं जिन्हें मिट्टी के बर्तन लुभाते हैं और जो मिट्टी से बनी वस्तुएं अच्छे दाम पर खरीदते हैं. कुल्हड, सकोरा और शादी में प्रयोग आने वाले मिट्टी के बर्तन आज भी प्रचलन में हैं जिससे कुछ कुम्हारों की रोजी रोटी चल जाती है.

एएम/एमजे (वार्ता)

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