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दुनिया

'गरीबी म्यूजियम की चीज है'

ऐसी कंपनियां जो लोभ नहीं कर रहीं, उन्हें समाज को विकसित करने और गरीबी से लड़ने के लिए अहम भूमिका निभाना चाहिए. ऐसी अपील है नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस की. पेश है डॉयचे वेले की उनके साथ बातचीत के कुछ अंश.

डॉयचे वेलेः 2011 में सरकारी दबाव की वजह से आपको ग्रामीण बैंक से हटना पड़ा. आपने त्यागपत्र में लिखा, मैंने कभी नहीं सोचा था कि माइक्रो क्रेडिट मेरे जीवन भर का काम बन जाएगा. आपको क्या मिला?

मोहम्मद यूनुसः यह महसूस करना बहुत शानदार है कि लोगों को आयडिया समझ में आया. आज ग्रामीण बैंक में साढ़े अस्सी लाख सदस्य हैं. इनमें से 97 फीसदी महिलाएं हैं. उन्हीं का यह बैंक है. यह बैंक अब खुद आगे बढ़ रही है और संस्था इस बीच पूरे देश में फैल गई है.

हम पढ़ाई के लिए कर्ज देते हैं ताकि गरीब परिवारों के बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके. हमने एक नर्सिंग स्कूल शुरू किया है जहां युवा लड़कियों को नर्स बनने की ट्रेनिंग दी जाती है. हमने एक स्वास्थ्य प्रणाली शुरू की है.

गरीबी गरीबों पर और समाज पर कैसे प्रभाव डालती है?

गरीबी गरीबों की वजह से नहीं है. यह हमारी सामाजिक प्रणाली का नतीजा है. मैं बोन्साई की उपमा का इस्तेमाल करता हूं. जब आप एक बड़े पेड़ की बीज को एक छोटे गमले में लगाते हैं तो उससे एक बड़ा पेड़ नहीं बल्कि बोन्साई निकलेगा. यह प्यारा तो लगता है लेकिन जगह न मिलने पर पूरी तरह बढ़ नहीं सकता. हमारी बैंक अमीरों को आसानी से कर्ज देती है लेकिन गरीबों को पैसा नहीं मिलता, यह कहकर कि वह कर्ज वापस नहीं कर सकेंगे. ग्रामीण बैंक ने दिखाया है कि लोग पाई पाई वापस चुकाते हैं. ग्रामीण बैंक का आयडिया पूरी दुनिया में चल रहा है और हर जगह लोग कर्ज पूरा चुकता करते हैं. लेकिन बैंक प्रणाली फिर भी नहीं बदली है. ये ही सिस्टम के फेल होने की जड़ है जो गरीबी के लिए भी जिम्मेदार है.

हमें गरीब लोगों को तकनीक, शिक्षा, ट्रेनिंग, आर्थिक मदद और स्वास्थ्य सेवा देनी होगी, जिसके लिए वह पैसा चुकाएं. ऐसा नहीं है कि उन्हें सब कुछ मुफ्त में देने की मांग की जा रही हो. हम मुफ्त के क्रेडिट नहीं देते हैं. हमारे ग्राहकों को पूरा पैसा वापिस चुकाना जरूरी है. और जब वह ऐसा करते हैं उसी दौरान उनकी जिंदगी बदल रही होती है. यह है सामाजिक उद्यमिता. अगर हम इस विचार को विस्तार देंगे तो कोई कारण नहीं कि लोग आगे भी गरीबी में रहें.

औद्योगिक देशों ने वादा किया था कि वह अपने सकल घरेलू उत्पाद का 0.7 फीसदी सरकारी विकास सहायता के लिए रखेंगे. एक ओर तो हम अभी भी इस आंकड़े से दूर हैं. दूसरी ओर गरीबी खत्म नहीं हो रही जबकि पिछले दशक में दसियों हजार डॉलर विकास सहायता के लिए खर्च किए गए हैं. क्या है जो गलत हो रहा है?

विकास सहायता बहुत अच्छा आयडिया है. यह कंसेप्ट अच्छा है लेकिन इसे लागू करने में गड़बड़ी होती है. विकास के सहायता के इस मॉडल में दो देशों के बीच विकास सहायता सहयोग होता है. एक पैसे देता है दूसरा लेता है. लेकिन हम इस प्रणाली को खोलते क्यों नहीं. जिन देशों को पैसे दिए जा रहे हैं उन देशों में इस धन का एक हिस्सा सामाजिक उद्यम के लिए कोष के तौर पर क्यों नहीं रखा जाता. सभी को अपना आयडिया रखने की छूट हो ताकि सामाजिक उद्यम के जरिए समस्या का समाधान किया जा सके. गरीबी की समस्या जितनी ज्यादा दूर होगी उतना ज्यादा पैसा इस कोष में आएगा. यह अच्छा विकास सहयोग होगा.

इसके अलावा हमें नई तकनीक चाहिए. हमने बीएएसएफ, ओटो, अडिडास जैसी कंपनियों के साथ साझा उपक्रम शुरू किए हैं. अगर ये कंपनियां लक्षित बाजार के हिसाब से काम करें तो लोग अपने लिए उपाय ढूंढ सकते हैं. सवाल यह है कि आप अंतरराष्ट्रीय सहायता का मतलब क्या समझते हैं. इस मुद्दे पर सामाजिक उद्यम भविष्य में अहम भूमिका निभाएंगे.

वैश्विक अर्थव्यवस्था में सामाजिक उद्यमिता की क्या सीमाएं हैं?

विश्व अर्थव्यवस्था में सामाजिक उद्यमिता का करीब पांच से 20 फीसदी हिस्सा हो सकता है. जितनी ज्यादा सामाजिक उद्यमिता बढ़ेगी उतने ही प्रभावी ढंग से हम गरीबी से लड़ पाएंगे. पारंपरिक कंपनियों को उससे डरने की कोई जरूरत नहीं है. वो आगे बढती रहेंगी और उन्हें मुनाफा भी होता रहेगा. और तो और उन्हें इस सामाजिक उद्यमों से लाभ होगा. क्योंकि जह गरीब, बेसहारा लोग सामाजिक रूप से स्वतंत्र हो जाएंगे तो वह भी एक उपभोक्ता बन जाएंगे. मांग बढ़ेगी तो मुनाफा भी बढ़ेगा और कंपनी को फायदा ही होगा.

क्या आपको इस बात का डर नहीं लगता कि अडिडास और बाकी वैश्विक कंपनियां आपके सामाजिक उद्यमकर्ता की छवि का इस्तेमाल करती हैं. क्योंकि इनमें से कई कंपनियां आलोचना का शिकार हो रही हैं कि वह कर्मचारी संघ को दबा रही हैं और पर्यावरण का ध्यान नहीं रख रहीं.

कंपनियों की छवि काफी हद तक खराब है लेकिन वहां भी कई लोग काम कर रहे हैं जो विकास को गंभीरता से लेते हैं. अगर हम इन लोगों को सामाजिक उद्देश्यों के लिए जीत सकें तो कंपनी की नीतियों पर भी असर तो पड़ेगा. कई आलोचकों का कहना है कि हम बहुत ही छोटे हैं और इसलिए बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर असर नहीं डाल सकते. लेकिन ऐसा नहीं है. हम हर कर्मचारी का सोच बदलते हैं और आखिरकार कंपनी का भी.

अगर हम इस तरह की कंपनियों से कन्नी काटेंगे और उन्हें अपनी छवि सुधझारने का कोई मौका नहीं देंगे तो क्या वो बेहतर हों पाएंगी. मुझे नहीं लगता कि ऐसा होगा. यह जरूरी और अहम है कि बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों पर प्रभाव डाला जाए और उन्हें अपने इरादों से अवगत करवाया जाए.

सामाजिक उद्यम सहस्त्राब्धि लक्ष्यों को 2015 तक पाने की दिशा में कौन सी भूमिका निभाती हैं?

सभी मिलेनियम लक्ष्य चाहे वो गरीबी आधी करना हो या लोगों को शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा की सुविधा मुहैया करवाना हो, सभी के लिए सामाजिक उद्यम एक जरिया हैं. ग्रामीण बैंक ने स्वास्थ्य सेवा के लिए कई कार्यक्रम किए ताकि जच्चा और बच्चा की मृत्यु दर घटे. अब हम नई तकनीक ढूंढने की कोशिश कर रहे हैं. हम ऐसी कंपनी को ढूंढ रहे हैं जो अल्ट्रासाउंड की मशीने हल्की और आसान तकनीक वाली बनाएं ताकि उन्हें मोबाइल ऐप के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके. इस तरीके से हम मोबाइल से लिए फोटो को अस्पताल भेज सकेंगे ताकि वहां डॉक्टर उसे अच्छे से देख सके. मोबाइल हर जगह उपलब्ध हैं लेकिन एक गर्भवती महिला को हर बार अस्पताल तक ला सकना संभव नहीं होता.

यही बात शिक्षा प्रणाली के लिए भी लागू होती है. आज क्यों अनपढ़ लोग अभी तक मौजूद हैं. उनके पास भी मोबाइल है. क्यों ऐसा सॉफ्टवेयर हम नहीं बना सकते कि मोबाइल ही उन्हें पढ़ना लिखना सिखा दे. इसके लिए न तो स्कूल की जरूरत है न ही शिक्षकों की बस एक तकनीक मिलनी चाहिए.

कई कंपनियां इस तरह के प्रोग्राम पर काम कर रही हैं. सभी के लिए शिक्षा संभव है. इंटरनेट के जरिए अमीर और गरीब लोगों को समान शिक्षा दी जा सकती है. आज अमीरों के लिए तो सारे दरवाजे खुले हैं लेकिन गरीबों के पास न तो शिक्षा है न स्वास्थ्य सुविधा. यह सामाजिक उद्यमिता से बदल सकता है. और सहस्त्राब्धि लक्ष्य सही व्यावयासिक मॉडल के लिए आदर्श आधार हैं.

आपने एक बार कहा था कि 2030 तक गरीबी को संग्रहालय का हिस्सा हो जाना चाहिए. लेकिन क्या बढ़ती जनसंख्या, वैश्विक जलवायू परिवर्तन और ऊर्जा संकट के इस दौर में क्या इस बयान पर एक बार और विचार करने की जरूरत नहीं?

नहीं. क्योंकि विकास हो रहा है. हम 2015 तक गरीबी आधी कर देंगे. ठोस परिणाम मौजूद हैं. तकनीक भी इस समस्या को हल करने में मदद करेगी. मैं तो और आगे जाता हूं कि सिर्फ गरीबी नहीं बल्कि बेरोजगारी भी म्यूजियम का हिस्सा बने. क्यों कोई व्यक्ति बेरोजगार रहे. यह एक विफल प्रणाली का नतीजा है जो हमने खुद बनाई है और हमें इसकी सजा मिल रही है. बेरोजगारी रचनात्मक क्षमता का नुकसान है. हम ये नहीं झेल सकते.

इंटरव्यूः मिरयम गेरके/एएम

संपादनः मानसी गोपालकृष्णन

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