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ब्लॉग

गंभीर है भारत के लिए आईएस की चुनौती

इस्लामिक स्टेट के प्रति देश के युवाओं में आकर्षण को लेकर भारत सरकार गंभीर रुख अपना रही है. सामाजिक और राजनीतिक चिंतकों ने भी भारत के कुछ मुस्लिम युवाओं में आईएस के प्रति सहानुभूति को एक बड़ा खतरा माना है.

दुनिया भर में आईएस की आतंकी हरकतों की आलोचना हो रही है. इसके बावजूद युवाओं के दिल में इस संगठन ने अपनी जगह बनाने में कामयाबी पायी है. खुफिया रिपोर्ट के मुताबिक करीब 20 भारतीय आईएस में शामिल हो चुके हैं. भारत की आबादी को देखते हुए भले ही यह संख्या कोई मायने नहीं रखती हो, लेकिन सुरक्षा एजेंसियों को इस बात का डर है कि यह संख्या तेजी से बढ़ सकती है. केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी माना है कि इस्लामिक स्टेट एक बड़ा सुरक्षा खतरा है. उनका कहना है कि भारत अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद से अछूता नहीं रह सकता. इस्लामिक स्टेट की गतिविधियां भी हमें प्रभावित कर रही हैं. युवाओं के बीच इन आतंकी संगठनों की बढ़ती लोकप्रियता चिंता का विषय है.

अरीब की वापसी

आईएस का लड़ाका रह चुका अरीब भारत क्यों लौटा इसको लेकर कोई भी आश्वस्त नहीं है. अरीब से हुई पूछताछ के बाद जो तथ्य सामने आये हैं उनसे लगता है कि वह किसी विशेष उद्देश्य से ही भारत लौटा है. अरीब को आईएस से जुड़ने को लेकर कोई अफसोस भी नहीं है. उसका कहना है कि वो जिहाद के लिए इराक गया था. इससे संदेह पैदा होता है कि वह इस्लामिक स्टेट को छोड़कर नहीं बल्कि किसी योजना के तहत भारत लौटा है. अतीत में भी भारतीय मुस्लिमों को बरगलाने का प्रयास होता रहा है. आर्थिक रूप से पिछड़े मुस्लिम युवाओं के आक्रोश को धर्म से जोड़कर आतंकी समूह अपने लिए सहानुभूति प्राप्त करते रहे हैं. ऐसे में अरीब जैसा शिक्षित युवा उन युवाओं के लिए रोल मॉडल बन सकते हैं जो रोजी रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
अरीब का यह खुलासा कि उसके साथ “कथित जेहाद” के लिए 43 और लोग इराक जाने वाले थे, ये चिंता का विषय है. हालांकि वह उन 43 में से केवल तीन को अपने साथ ले जाने में कामयाब रहा. साफ है कि अरीब अकेला नहीं है बल्कि आईएस से सहानुभूति रखने वालों की संख्या काफी है. नेशनल इंवेस्टीगेशन एजेंसी के मुताबिक अरीब मजीद अब पूरी तरह से ट्रेंड आतंकी बन गया है. यही नहीं, उसकी सोच भी कट्टर हो चुकी है, जो देश के लिए खतरा साबित हो सकता है. अरीब और अन्य युवाओं को आईएस से जोड़ने में किसका हाथ है, इसका पता लगाने में सुरक्षा एजेंसियों को अब तक कामयाबी नहीं मिली है.

Indien Parlamenstwahlen 2014

सरकार के सामने चुनौती

ऑनलाइन ब्रेन वॉश

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इंटरनेट आज एक जरूरत है. भारत के शहरी और शिक्षित युवाओं को यह सहज उपलब्ध भी है. आईएस ने भारत में अपने पांव पसारने के लिए इंटरनेट का सहारा लिया है. सोशल नेटवर्किंग साइटों पर युवाओं को आकर्षित करने के लिए आईएस ने अपने काम को जिहाद का नाम दिया है.

अरीब का कहना है कि आईएस से जुड़ने के लिए उसका ब्रेन वॉश एक इंटरेनट चैट रूम के जरिए शुरू हुआ था. इसके पहले हैदराबाद के चार युवकों ने भी माना था कि आईएस के दुष्प्रचार एवं इंटरनेट आधारित मोबाइल मैसेंजर से इतने प्रभावित हुए थे कि उन्होंने इराक जाने का फैसला किया.

लगाम लगाने की कोशिश

खुफिया रिपोर्ट के अनुसार देश में कई गैरकानूनी मदरसे हैं जिनमें से कुछ चरमपंथियों की जाने-अनजाने मदद कर रहे हैं. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले दो वर्षों के दौरान कई अलग-अलग देशों के चरमपंथी संगठन देश में आए हैं और उनकी ओर से इन मदरसों में लोगों को उपदेश दिए गए हैं. इसी के दम पर इन मदरसों को आतंकी कैंपों में तब्दील कर दिया गया. बर्दवान ब्लास्ट की जांच में यह बात खासतौर पर सामने आई है कि पश्चिम बंगाल में कई गैरकानूनी मदरसों का संचालन हो रहा है. इन मदरसों के जरिए ही आतंकी संगठनों की मदद की गई जिससे उन्होंने राज्य में अपनी पकड़ मजबूत कर ली. देश भर में ऐसे कई मदरसे होने का अनुमान है.

नींद से जागते हुए गृह मंत्रालय ने अब एक सर्वे कराने का फैसला लिया है. सर्वे के जरिए यह सुनिश्चित हो सकेगा कि मदरसों में आधुनिक शिक्षा व्यवस्था के जरिए शिक्षा दी जा रही है या नहीं. आईएस के दुष्प्रचार से निपटने के लिए सरकार को तर्कयुक्त प्रचार का सहारा लेना पड़ेगा. इस अभियान के साथ इस्लामिक धर्मगुरुओं को भी जोड़ा जाना चाहिए. इंटरनेट पर गुमराह हो रहे युवाओं के लिए अब ठोस कदम उठाने की जरूरत है. सुरक्षा एजेंसियों को भी ऑनलाइन आतंक का सामना करने के लिए स्वयं को चौकन्ना रखना होगा. "सबका साथ सबका विकास " के नारे को अगर सरकार अमल में लाती है तो भटके हुए युवाओं को समझाना कठिन नहीं होगा.

ब्लॉग: विश्वरत्न श्रीवास्तव

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