खेतों की ″बॉस″ बनती महिलाएं | दुनिया | DW | 13.02.2017
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दुनिया

खेतों की "बॉस" बनती महिलाएं

कृषि क्षेत्र में अब तक महिलाओं की भूमिका महज एक सहायक के रूप में नजर आती थी, लेकिन समय के साथ इनकी भूमिका भी बदली है. अब महिलाएं अपने खेतों की जिम्मेदारी तो संभाल ही रही हैं साथ ही कारोबार का प्रशिक्षण भी ले रही हैं.

गुजरात के मायापुर की रहने वाली हीरा कंजारिया के लिए दिन के 17 घंटे काम करना एक आम बात है. सुबह की शुरुआत बच्चों के लिए खाना बनाने से करने वाली हीरा घर का पूरा कामकाज तो करती ही हैं साथ ही कपास के खेत की पूरी जिम्मेदारी भी उठाती है.

36 साल की हीरा उन महिलाओं में से हैं जो आज कृषि कार्यों के लिए प्रशिक्षिण ले रही हैं. हालांकि कृषि क्षेत्र में महिलाओं का काम करना कोई नई बात नहीं है. तकरीबन 70 फीसदी कार्य महिलाएं ही करती रही हैं लेकिन अब तक इनके काम को कोई खास तवज्जो नहीं मिलती थी.

लेकिन अब महिलाओं की पारंपरिक भूमिका में बदलाव नजर आ रहा है और महिलाएं ही परिवार के साथ-साथ खेती भी कर रही हैं. इस बदलाव के कई कारण नजर आते हैं. नौकरियों के लिए पुरूषों का शहर की ओर होने वाला पलायन तेजी से बढ़ा है साथ किसानों की आत्महत्याओं के बढ़ते मामलों ने भी महिलाओं को ज्यादा जिम्मेदारी दी है.

महिलाओं की इस बढ़ती भूमिका को अब राज्य सरकारों और निजी संस्थानों का भी सहयोग मिल रहा है. देश भर के तमाम सरकारी, गैरलाभकारी और निजी संस्थान इन महिलाओं को फसल, सिंचाई और वित्त प्रबंधन का प्रशिक्षण दे रहे हैं. पिछले कई अध्ययनों में देखा गया है कि महिलाएं बच्चों की पढ़ाई, कारोबार और सामुदायिक गतिविधियों पर अधिक खर्च करती हैं जो इन्हें गरीबी से बाहर आने में मदद करता है.

हीरा ने बताया कि वह पांच साल की उम्र से खेतों में काम कर रही हैं, लेकिन अब वह खेतों में काम अपने बच्चों के लिए करना चाहती हैं. उन्होंने कहा "मैं काम करना चाहती हूं ताकि मेरे बच्चे पढ़ सकें, उन्हें अच्छी नौकरियां मिलें और बेटियों को अच्छे पति भी.” महिलाओं की बदलती भूमिकाएं भारतीय पांरपरिक कृषि के बदलते स्वरूप की कहानी बयां करती हैं. पुराने समय में महिलाओं को खराब फसल, सूखे और बीमारियों के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता था. यहां तक कई बार इन्हें चुड़ैल और भूत मानकर शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना भी झेलनी पड़ती थी.

हीरा उन 1,250 महिलाओं में से एक हैं जिन्हें सामाजिक उद्यम कॉटन कनेक्ट और भारत में स्वकार्यरत महिला संस्थान (सेवा) द्वारा कपास की खेती के साथ-साथ कारोबारी प्रशिक्षण दिया जा रहा है.

इसी इलाके की 32 वर्षीय अरुणा के खेतों में पिछले तीन सालों में कपास की पैदावार दोगुनी हो गई है साथ ही लागत में भी भारी गिरावट आई है. अरुणा के मुताबिक, "अब मेरे बच्चे स्कूल में हैं और मेरे पति भी पढ़-लिख कर आज कंप्यूटर ऑपरेटर का काम कर रहे हैं."

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, कृषि क्षेत्र में करीब एक तिहाई महिलाएं काम कर रही हैं लेकिन सिर्फ 13 फीसदी कृषि क्षेत्र पर ही महिलाओं का स्वामित्व है .संयुक्त राष्ट्र के एक अध्ययन मुताबिक कृषि में कम होते लिंगभेद से दुनिया भर के 10-15 करोड़ लोगों को भूख से उबारा जा सकता है. आज दुनिया भर में करीब 80 करोड़ लोग भूख से जूझ रहे हैं. सेवा से कार्यकारी निदेशक रीमा नानावती कहती है "खेती में महिलाओं की बदलती भूमिकाओं को आधिकारिक रूप से अहम समझा जाना चाहिए. उन्हें बस किसान ही नहीं समझना चाहिए."

एए/ओेएसजे (रॉयटर्स)

 

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