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ताना बाना

खूब लड़ीं वह और दुनिया ने देखा

रुथ मनोरमा, दक्षिण भारत से निकला यह नाम दलित और उपेक्षित तबके की महिलाओं के अधिकारों के लिए दशकों से संघर्षरत है. इनके काम को मौन क्रांति का नाम मिला. मनोरमा ने डॉयचे वेले से साक्षात्कार में अपनी योजनाओं का खुलासा किया.

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संघर्ष में लगी हैं रुथ

दक्षिण भारत से शुरू हुई इनकी मौन क्रांति भारत से निकल कर एशिया और यूरोप में भी चर्चा का विषय बन रही है. मनोरमा के शांत और शालीन तरीके से काम करने की शैली के कारण उनके काम को मौन क्रांति का नाम दिया गया है.

उनके करिश्माई व्यक्तित्व और काम को देखते हुए 2006 में मनोरमा को समाज सेवा के क्षेत्र में दिया जाने वाले दुनिया के प्रतिष्ठित सम्मान राइट लाइवलीहुड अवॉर्ड से नवाजा गया. उनका जन्म 1952 में तमिलनाडु के मद्रास में हुआ था जिसे अब चेन्नई कहा जाता है. समाजसेवी पॉल धनराज और दोरथी धनराज के घर पैदा हुईं मनोरमा को समाज सेवा का गुण विरासत में मिला. दलित परिवार में जन्म लेने के बावजूद उनकी मां दोरथी धनराज महिला अधिकारों की पैरोकार थीं और उस जमाने में पढ़ लिखकर टीचर बन गई थीं जब ऊंची जातियों में भी महिलाओं की पढ़ाई लिखाई ना के बराबर होती थी.

Frauen der Swadhyaya Parivar Bewegung folgen aufmerksam der spirituellen Führerin Jaishree Didi in Ahmadabad, Indien

दोरथी दक्षिण भारत में महिला अधिकारों के लिए अंग्रेजी हुकूमत से लड़ रहीं पंडित रमा बाई से काफी प्रभावित थीं और उन्हीं के नाम पर उन्होंने अपनी बेटी का नाम मनोरमा रखा. मनोरमा के पिता पॉल धनराज डाक विभाग में नौकरी करते थे और उन्होंने भी भूमिहीनों के लिए लंबी लड़ाई लड़ी.

मनोरमा के खून में मौजूद समाज सेवा के गुण को परिवार की ओर से शुरू से ही खूब बढ़ावा मिला. इसमें और ज्यादा निखार लाने के लिए उन्होंने 1975 में चेन्नई की यूनीवर्सिटी से सोशल वर्क में पोस्ट ग्रैजुएशन किया. पढ़ाई के बाद नौकरी करने के बजाए मनोरमा ने दलित और उपेक्षित तबकों की महिलाओं के अधिकार दिलाने के लिए काम शुरू किया.

इसके लिए उन्होंने 1985 में वुमेन्स वॉइस नाम का एनजीओ बनाया. संगठन के स्तर पर मनोरमा ने अपने काम का दायरा मद्रास से बाहर लाकर समूचे तमिलनाडु और कर्नाटक सहित दक्षिण भारत के अन्य राज्यों तक फैलाया. तकरीबन एक दशक के दौरान उन्होंने झुग्गीवासियों, घरेलू नौकर के रूप में काम करने वालों, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों और दलित महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरुक किया.

Frauen in blauen Saris protestieren vor dem Parlament in Neu Delhi

1993 में उन्होंने दलित महिलाओं के प्रति हिंसा की शिकायतों को लेकर बंगलौर में जनसुनवाई कर दलित चेतना का एक बड़ा मंच तैयार कर दिया. इसकी चर्चा देश दुनिया में हुई. इस काम को आगे बढ़ाने के लिए मनोरमा ने नेशनल फेडरेशन ऑफ दलित वूमेन बनाया. जिसके माध्यम से उन्होंने देश के अन्य भागों में दलित महिलाओं को जन सुनवाई के जरिए अपनी परेशानियां सार्वजनिक रूप से दुनिया के सामने रखने का मौका दिया. इससे दलित उद्धार की राजनीति करने वाली सरकारों पर सच्चाई से मुंह न मोड़ने का प्रभावी दबाव बनाने में कामयाबी मिली.

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