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विज्ञान

खून की कमी से लड़ेगी आयरन फिश

विकासशील देशों में एनिमिया की परेशानी बहुत ज्यादा होती है. कंबोडिया की आयरन फिश इस समस्या को खत्म करने में मदद कर रही है. मजेदार बात यह है कि यह मछली है ही नहीं.

इन दिनों जब सोथ सोखोउन अपने परिवार के लिए खाना बनाती हैं तो वह अपनी झोपड़ी के ऊपरी टांट से एक आयरन की बट्टी निकालती हैं और इसे भगोने में डाल देती हैं. उन्हें अभी भी वो दिन याद हैं जब उनका परिवार बीमारी से जूझ रहा था, "मैं बहुत जल्दी बीमार पड़ जाती और अक्सर पीली भी रहती थी, कभी कभी चक्कर भी आते."

Soth Sokhoeun in ihrer Küche

सोखोउन के परिवार का स्वास्थ्य अच्छा

लेकिन फिर कनाडा के शोधकर्ताओं ने पाया कि उनके शरीर में लोहे की कमी के कारण उन्हें यह परेशानी हो रही थी. उन्होंने उसे एक छोटी आयरन फिश दी और कहा कि खाना बनाते समय वह इसे पतीली में डाल दें. उन्होंने उसे कहा कि इससे उसे जरूरी आयरन मिल जाएगा. वह बताती हैं, "जब से मैं इसका इस्तेमाल कर रही हूं, कमजोरी नहीं है और मैं पहले जैसी पीली भी नहीं हूं. मेरा मूड भी एकदम अच्छा रहता है."

सोखेउन जिस मछली का इस्तेमाल कर रही हैं, उसका आकार साबुन की बट्टी जितना बड़ा है. इसका इस्तेमाल आसान है. और इससे दुनिया भर में आयरन की कमी और एनिमिया की मुश्किल खत्म हो सकेगी. अगर इसे खाना पकाने के पतीले में खाने के साथ 10 मिनट पकाया जाए तो दिन की जरूरत का 75 फीसदी आयरन आराम से मिल जाता है. और शरीर में लोहे का संचय भी बढ़ जाता है. बस खाना बनाते समय थोड़ा नींबू डालना जरूरी है.

वैश्विक समस्या

एनिमिया के कारण दुनिया में 1.6 अरब लोग प्रभावित हैं. हालांकि विकासशील और गरीब देशों में यह परेशानी ज्यादा है. यह बहुत से कारणों से हो सकता है जिसमें परजीवी या आनुवांशिक कमी भी शामिल है. लेकिन खाने में लोहे की कमी होना इस परेशानी का मुख्य कारण है. विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि एनिमिया के आधे मामले लोहे की कमी के कारण होते हैं.

कंबोडिया में 2010 के सर्वे के दौरान देखा गया कि छह महीने से पांच साल के बच्चों में 55 प्रतिशत के शरीर में आयरन कम जाता है. गर्भवती महिलाओं में से 45 प्रतिशत के शरीर में या तो खून की कमी है या फिर लोहे की. शरीर में लोहे की कमी होने से थकान, आलस, मूड खराब होना, एकाग्रता की कमी, शारीरिक गतिविधि में मुश्किल जैसी कई चीजें होती हैं. भले ही लोग मछली, सब्जियां चाहे जो खा लें लेकिन इससे उन्हें जरूरी लोहा नहीं मिल पाता. दुनिया के कई देशों में या तो आयरन की गोली दी जाती है या फिर इंजेक्शन.

लोहे के बर्तन में खाना बनाना भी एक विकल्प है लेकिन कंबोडिया में लोगों को यह पसंद नहीं और आधुनिक किचन में लोहे और कांसे के बर्तनों की जगह स्टेनलेस स्टील के बर्तन ले चुके हैं. इसलिए कनाडा की गुल्फ यूनिवर्सिटी के क्रिस्टोफर चार्ल्स को नया आयडिया आया कि आयरन की एक बट्टी पानी में डाल दी जाए. लेकिन इस बट्टी को आकर्षक बनाने के लिए उन्होंने इसे मछली का आकार दे दिया. इसका तेजी से असर गांवों के स्वास्थ्य में देखा गया.

कैसे बनती हैं आयरन मछली

गांव के बाहर एक जगह पर खूब चिंगारियां और गर्मी के बीच लोहा पिघलाया जाता है. कार के पुर्जों और फेंके गए लोहे को पिघला कर ये मछलियां बनाई जाती हैं. इन मछलियां को बनाने वाली लाओ भी अब अपने घर में आयरन फिश के साथ ही खाना बनाने लगी हैं और मानती हैं कि उनमें ऊर्जा बढ़ी है.

अब जल्द ही करीब 1,500 मछलियां कंबोडिया के 10 गांवों में बांटी जाएंगी और असर देखा जाएगा. कोशिश की जाएगी कि इससे कंबोडिया की सरकार और बड़े गैर सरकारी संगठनों को राजी करवा लेंगे कि फिश काम करती है. वैसे तो उन्होंने रुचि दिखाई है लेकिन थोड़ा संदेह है क्योंकि जरूरी डाटा उपलब्ध नहीं है. हेलेन किलर इंटरनेशनल संगठन अभी भी लोगों को आयरन की गोलियां बांट रहा है और अपना खाना बेहतर करने को कह रहा है. लकी आयरन फिश को अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन और क्लिंटन ग्लोबल इनिशिएटिव का पुरस्कार भी मिला.

रिपोर्ट: कायल जेम्स/एएम

संपादन: ईशा भाटिया

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