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दुनिया

खुफिया खबर देने वाला एडवर्ड स्नोडेन

अमेरिका खुफिया कार्यक्रम चला कर लोगों के बारे में जानकारी जुटा रहा है. सीआईए के लिए तकनीकी सहायक के रूप में काम कर चुके एडवर्ड स्नोडेन ने यह जानकारी सार्वजनिक कर सजा भुगतने का जोखिम मोल लिया है.

पिछले हफ्ते ही इस बारे में खबर सामने आई और आतंकी हमलों से बचाव के नाम पर लोगों की निजी जिंदगी में सरकार की बढ़ती दखलंदाजी पर बहस गर्म हो गई. अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी ने इस खुलासे के बारे में अमेरिकी न्याय विभाग से आपराधिक जांच के लिए कहा है. उधर न्याय विभाग का कहना है कि उसने प्रारंभिक जांच शुरू कर दी है. स्नोडेन को पहले ही इस बात का अंदेशा था इसलिए उन्होंने अमेरिका से दूर हॉन्गकॉन्ग के एक होटल में अपना ठिकाना बना रखा है.

सबसे पहले इस बारे में जानकारी गार्डियन अखबार ने दी. अखबार ने बाद में कहा कि वह एडवर्ड स्नोडेन के अनुरोध पर उनकी पहचान सार्वजनिक कर रहा है. अखबार ने स्नोडेन का बयान छापा है, "मेरा एकमात्र उद्देश्य लोगों को यह बताना है कि उनके नाम पर उनके खिलाफ क्या हो रहा है." गार्डियन और वाशिंगटन पोस्ट ने लोगों पर नजर रखने के दो कार्यक्रमों के बारे में जानकारी दी है. इनमें से एक कार्यक्रम के जरिए एनएसए लाखों करोड़ों फोन कॉल के ब्यौरे जमा करता है. इसके जरिए एक विशाल डाटाबेस तैयार किया जा रहा है. एनएसए इसके जरिए यह जानने की इच्छा रखता है कि संदिग्ध आतंकवादी अमेरिका में किन लोगों के संपर्क में हैं. ओबामा प्रशासन का कहना है कि एनएसए के इस कार्यक्रम में कभी भी असल बातचीत नहीं सुनी जाती.

इसके अलावा एक दूसरा कार्यक्रम भी है जिसे प्रिज्म नाम दिया गया है. इसमें एनएसए और एफबीआई 9 इंटरनेट कंपनियों के सभी प्रकार के इंटरनेट इस्तेमाल पर नजर रखती है. इनमें ऑडियो, वीडियो, तस्वीरें और ईमेल के सर्च भी शामिल हैं. इसका मकसद देश के बाहर शुरू हुई संदिग्ध गतिविधियों के बारे में पता लगाना है.

अमेरिका के नेशनल इंटेलिजेंस के निदेशक जेम्स क्लैपर ने जानकारी जुटाने के अमेरिकी कार्यक्रमों के सार्वजनिक होने पर बड़ा हो हल्ला मचाया और कहा कि इससे "बहुत नुकसान" हुआ है. क्लैपर ने आतंकवाद रोकने के लिए इस्तेमाल की जा रही तकनीकों के बारे में मीडिया की खबरों का जवाब देने के लिए कुछ गोपनीय बातों को भी जाहिर कर दिया.

स्नोडेन ने इन कार्यक्रमों के सुरक्षित होने के दावे को गलत बताते हुए कहा है, "कोई विश्लेषक जब चाहे किसी को भी निशाना बना सकता है. कौन सी बातचीत सुननी है, यह सेंसर नेटवर्क की रेंज पर निर्भर करता है और इसके बारे में अधिकार विश्लेषक के पास है." स्नोडेन ने गार्डियन को बताया है, "सारे विश्लेषकों के पास किसी को निशाना बनाने का अधिकार नहीं है लेकिन मैं अपनी मेज पर बैठा हूं और किसी के भी इंटरनेट खाते की तलाशी लेने का मेरे पास अधिकार है. अब वो चाहे आपका हो या आपके अकाउंटेंट से ले कर संघीय जज या फिर यहां तक कि राष्ट्रपति का भी निजी ईमेल हो सकता है."

हॉन्गकॉन्ग जाने के फैसले पर स्नोडेन ने कहा है, "बोलने की आजादी और राजनीतिक विरोध के प्रति इनकी भावना काफी मजबूत है." इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि यह ऐसी जगह है जो अमेरिकी सरकार के हुक्म की नाफरमानी कर सकता है.

चीन का हिस्सा होने के बावजूद हॉन्गकॉन्ग में पश्चिमी देशों जैसी कानून व्यवस्था है. हालांकि बीते सालों में अमेरिका और हॉन्गकॉन्ग के बीच प्रत्यर्पण संधि बड़े अच्छे से चली है. हॉन्गकॉन्ग ने अल कायदा के तीन संदिग्धों को 2003 में प्रत्यर्पित भी किया था.स्नोडेन ने वॉशिंगटन पोस्ट से कहा है कि वह किसी ऐसे देश में शरण लेना चाहेंगे जो बोलने की आजादी में यकीन करता हो और दुनिया की निजता के उल्लंघन का विरोध करता हो.

एनआर/एमजे(एएफपी,रॉयटर्स)

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