खिलौनों में जहर | विज्ञान | DW | 15.03.2013
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विज्ञान

खिलौनों में जहर

बच्चों के खिलौने बेहद खूबसूरत और मन लुभाने वाले होते हैं, लेकिन इन्हीं खिलौनों में जहर भी मिला होता है, इसकी भनक बच्चों को तो क्या, उनके लिए खिलौने खरीदने वाले मां बाप को भी नहीं लगती.

रोमांच और कल्पना से भरी दुनिया में रहने वाले बच्चों के खिलौने अक्सर प्लास्टिक के होते हैं. प्लास्टिक के खिलौनों में जिन रंगों का इस्तेमाल किया जाता है वे बच्चों के लिए बेहद हानिकारिक होते हैं. खिलौनों में आर्सेनिक और सीसे का भी इस्तेमाल होता है. यह जहरीले तत्व हैं. इन्हें मुंह में डालने पर बच्चों की कई बीमारियां होती है. खुशबू के लिए डाले जाने वाले पदार्थों और जस्ते से से एलर्जी होती है. रंगों में कई ऐसे रासायन भी मौजूद होते हैं जिनसे कैंसर का खतरा हो सकता है. साथ ही भविष्य में प्रजनन में भी परेशानी आ सकता है.

यूरोपीय संघ के नए नियमों के बाद तो जहरीली चीजों की मात्रा और बढ़ सकती है. सीसे की मात्रा तो दोगुनी की जा सकती है. जर्मन संस्थान इसके खिलाफ गंभीरता से आवाज उठा रहे हैं. उन्होंने यूरोपीय संघ से इसे सीमित करने की मांग की है. अब यूरोपीय अदालत में सुनवाई चल रही है. जर्मनी चाहता है कि खतरनाक तत्व कम हों. खिलौनों को लेकर नए नियम जुलाई में लागू होंगे, लेकिन यूरोपीय अदालत में जर्मन शिकायत पर सुनवाई इसके बाद होगी.

हाईटैक सेहत

खिलौनों के साथ साथ बच्चों में चॉकलेट की भी दीवानगी होती है. कैसे बनती है एक अच्छी चॉकलेट, क्या है 4,500 रुपये प्रति किलो वाली चॉकलेट की खासियत, जानेंगे इस बार मंथन में. सेहत पर ध्यान देते हुए इस बार मंथन में रोगों की जांच और इलाज के लिए कंप्यूटर के इस्तेमाल पर जानकारी दी गई है. कई बार डॉक्टर समझ नहीं पाते कि बीमारी क्या है. मर्ज का इलाज भी तुक्केबाजी से करने लगते हैं. कुछ दिन एक दवा दी, काम नहीं की, तो दूसरी शुरू कर दी. इस चक्कर में अक्सर फायदा कम और नुकसान ज्यादा हो जाता है.

इसी से बचने के लिए जर्मनी में डॉक्टर मरीजों की डिजीटल इमेज बनाने में लगे हैं. दवा टेस्ट की जाएगी, लेकिन इंसानों पर नहीं, बल्कि कंप्यूटर में डले उनके डाटा पर. कंप्यूटर पर इंसान की हूबहू जैविक नकल बनाई जाएगी. दवा उसी पर टेस्ट की जाएगी. इससे समय भी बचेगा, इलाज भी बेहतर होगा और खर्च भी घटेगा.

इसी तरह की तकनीक का इस्तेमाल स्मार्ट फोन और टैबलेट ऐप बनाने के लिए भी किया जा रहा है. बर्लिन में यूरोप के सबसे बड़े यूनिवर्सिटी क्लीनिक चैरिटे में डॉक्टर टेबलेट पीसी पर एक खास ऐप्लिकेशन की मदद से मरीजों की जानकारी चुटकियों में देख सकते हैं.

साथ ही इस बार मंथन में अवलांच यानी हिमस्खलन के बारे में विस्तार में जानकारी दी गयी है. हिमस्खलन किस तरह से शुरू होते हैं, उनसे कितना खतरा होता है और उनसे कैसे बचा जा सकता है, यह सब जानने के लिए देखिए मंथन शनिवार सुबह 10.30 बजे डीडी-1 पर. कार्यक्रम आपको कैसा लगा, हम तक जरूर पहुंचाएं अपनी राय, सुझाव और सवाल.

रिपोर्ट: ईशा भाटिया

संपादन: ओंकार सिंह जनौटी

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