खाप के समर्थन में खट्टर | दुनिया | DW | 02.02.2016
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दुनिया

खाप के समर्थन में खट्टर

हरियाणा और उत्तर प्रदेश की खाप पंचायतें विवादास्पद फैसलों के लिए बदनाम होती रही हैं. लेकिन हरियाणा के मुख्यमंत्री को लगता है कि समाज सुधार में इनकी अहम भूमिका है.

खासकर हरियाणा में तो इन पंचायतों की ताकत अदालतों से भी ज्यादा है. ऑनर किलिंग जैसे मामलों में भी इन पंचायतों का ही हाथ रहा है. लेकिन उसी हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का कहना है कि खाप के फैसलों से होने वाले तमाम विवादों के बावजूद इन पंचायतों पर पाबंदी लगाने का कोई प्रस्ताव नहीं है.

गुड़गांव में होने वाले निवेशक सम्मेलन के सिलसिले में एक रोड शो के दौरान कोलकाता आए खट्टर का कहना था कि खाप पंचायतें समाज के लिए बेहद उपयोगी चीज हैं. उन्होंने कहा खाप पंचायतों की अपनी ताकत है. वह समाज सुधार का काम करती हैं. वह कहते हैं, "एक या दो गलतियों की वजह से इन पंचायतों को पूरी तरह गलत नहीं हो ठहराया जा सकता. इंसान और संस्थान भी गलतियां करते हैं. खाप पंचायतों की अपनी ताकत है."

मुख्यमंत्री के मुताबिक इन पंचायतों को सरकार ने नहीं बनाया है. राज्य (हरियाणा) में यह बीते 800 वर्षों से काम कर रही हैं. उन्होंने दहेज प्रथा के खिलाफ संघर्ष और बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ और लिंग अनुपात जैसे मुद्दों पर समाज में सुधार लाने का काम किया है. खट्टर ने कहा, "मुझे लगता है कि यह पंचायतें समाज के लिए एक उपयोगी चीज हैं. यह गलत कामों को बढ़ावा नहीं देतीं. खाप बड़ी पंचायत है."

पंचायत चुनावों में उम्मीदवारी के लिए शैक्षणिक योग्यता तय करने संबंधी कानून का जिक्र करते हुए खट्टर ने कहा कि इस कानून की काफी सराहना हो रही है. इससे जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार रोकने में सहायता मिलेगी. तो क्या केंद्र को भी राज्यों में चुनाव लड़ने के लिए ऐसा कोई कानून बनाना चाहिए? इस पर मुख्यमंत्री का जवाब था कि वे ऐसी किसी पहल का समर्थन करेंगे. लेकिन इस बात का फैसला केंद्र को ही करना है.

वैसे, उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों में ऑनर किलिंग और अपने बेतुके फरमानों के लिए खाप पंचायतें अक्सर सुर्खियां बटोरती रहती हैं. उनकी गतिविधियों की निंदा भी की जाती है. पश्चिम बंगाल में भी ऐसी पंचायतों, जिनको स्थानीय भाषा में सालिसी सभा कहा जाता है, के फैसले अक्सर सुर्खियां बटोरते रहे हैं. राज्य के ग्रामीण इलाकों में ज्यादातर मामले इसी सभा के जरिए निपटाए जाते हैं. बहुत कम मामले ही अदालतों तक पहुंचते हैं. इन पंचायतों में सत्तारुढ़ राजनीतिक दलों के नेता और ग्राम प्रधान शामिल रहते हैं. कई मामलों में तो पुलिस भी इन पंचायतों के फैसलों का समर्थन करती है.

अब पश्चिम बंगाल में दो महीने के भीतर विधानसभा चुनाव कराए जाने हैं. तो क्या खट्टर इन पंचायतों के समर्थन में बयान देकर ग्रामीण इलाकों में अपनी पार्टी के लिए समर्थन हासिल करना चाहते हैं? राजनीतिक हलकों में यही सवाल पूछा जा रहा है. वैसे, भाजपा के किसी नेता ने अब तक खट्टर के बयान पर कोई टिप्पणी नहीं की है.

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