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दुनिया

खाने में घोड़े का मांस

यूरोप में खाने पीने की चीजों में मिलावट को ले कर एक बार फिर बवाल मचा है. फ्रोजेन खाने में धोखे से घोड़े के मांस का इस्तेमाल किया गया है. इसे किन किन देशों में बेचा गया और इलके लिए कौन जिम्मेदार हैं, इसकी जांच चल रही है.

पहले मुर्गियों को चारे के साथ मांस खिलाने के मामला, फिर अंडों में जहरीले डाइऑक्सिन का पाया जाना और अब पके पकाए खाने में घोड़े का मांस मिलना, यूरोप में एक के बाद एक खाने पीने की चीजों के साथ छेड़ छाड़ के मामले सामने आ रहे हैं. इसे देखते हुए यूरोपीय कमीशन को हस्तक्षेप करना पड़ा है. ब्रसेल्स में आठ सदस्य देशों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक के बाद कमीशन ने यूरोप संघ के सभी देशों में मांस से बनी चीजों की डीएनए जांच करने के आदेश दिए हैं. बैठक में जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, आयरलैंड, लग्जमबर्ग, स्वीडन, रोमानिया और पोलैंड शामिल थे.

यूरोपीय संघ के स्वास्थ्य कमिसार टोनियो बोर्ग ने बैठक के बाद पत्रकारों से बात करते हुए कहा, "सभी सदस्य देशों में खाने की चीजों की डीएनए जांच की जाएगी." माना जा रहा है कि उन खानों में घोड़े का मांस मिलाया गया जिनमें आमतौर पर गोमांस का इस्तेमाल होता है. मामला तब सामने आया जब पिछले हफ्ते आयरलैंड और ब्रिटेन में सुपर मार्केट में मिलने वाले फ्रोजन खाने में घोड़े का मांस पाया गया. जांच करने पर पता चला कि खानों को 100 फीसदी घोड़े के मांस से ही बनाया गया था. सबसे पहले यह लजानिया नाम के खाने में मिला और बाद में बर्गर और कबाब में भी यही मांस पाया गया. इसके बाद से कई सुपर बाजारों से इन्हें हटा लिया गया.

Europaparlament - Anhörung Tonio Borg

यूरोपीय संघ के स्वास्थ्य कमिसार टोनियो बोर्ग

जहरीला मांस

हालांकि ऐसा नहीं है कि यूरोप में घोड़े का मांस नहीं खाया जाता. यूरोप भर में घोड़े के मांस की कुल सालाना खपत एक लाख टन से भी अधिक है. इटली, पोलैंड और रोमानिया में इसे बेहतरीन खाना समझा जाता है. लेकिन ब्रिटेन और आयरलैंड समेत कई देश इसे पसंद नहीं करते और ना ही वहां खाने में इस्तेमाल के लिए घोड़ों को पाला जाता है. लोगों में इस बात की नाराजगी तो है ही कि गलत लेबल लगा कर उनके साथ धोखा किया गया, इसके साथ ही स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं भी हैं. घोड़ों को कुछ ऐसी खास दवाएं दी जाती हैं, जिनसे वे तंदुरुस्त रहें और दौड़ भाग के काम कर सकें. ये दवाएं यदि इंसानी आहार का हिस्सा बनें तो घातक साबित हो सकती हैं.

जिन घोड़ों को मांस के लिए पाला जाता है, उनमें इन दवाओं का इस्तेमाल नहीं किया जाता. यूरोपीय कमीशन द्वारा की जाने वाले जांच में इसी बात को साफ किया जाएगा. 2,500 टेस्ट घोड़े के डीएनए का पता लगाने के लिए किए जाएंगे और 4,000 टेस्ट फिनाइल बूटाजोन दवा के लिए. रिपोर्टों के अनुसार हर टेस्ट पर करीब 400 यूरो का खर्च आएगा. यूरोपीय कमीशन ने आधा खर्च उठाने की बात कही है. लेकिन जांच प्रक्रिया में कम से कम एक महीने का समय लगेगा. माना जा रहा है कि जांच की रिपोर्ट 15 अप्रैल तक ही आ पाएगी.

किसकी जिम्मेदारी?

फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांसोआ ओलांद ने इसे "एक गंभीर मामला" बताया है, तो जर्मनी में ग्रीन पार्टी ने कहा है कि कंपनियों ने पैसा बचाने के लिए उपभोक्ताओं के साथ धोखा किया है. इसकी शुरुआत कहां से हुई इस बारे में यूरोपीय पुलिस यूरोपोल जांच कर रही है. घोड़े का मांस फ्रांस की कंपनी कोमिगेल के बनाए खानों में मिला है. कोमिगेल ने अपना पल्ला झाड़ते हुए कहा है कि उसने कोई गड़बड़ी नहीं की, बल्कि उसने उसी मांस का इस्तेमाल किया जो लग्जमबर्ग की कंपनी स्पंघेरो ने उसे मुहैया कराया. वहीं स्पंघेरो ने रोमानिया के दो कसाईखानों से मांस खरीदने की बात कही है.

Lasagne Bolognese

फ्रांस की कंपनी कोमिगेल के बनाए लजानिया में मिला घोड़े का मांस

इस मामले में डेनमार्क के एक व्यापारी यान फासेन का नाम सामने आ रहा है. हालांकि फासेन ने भी रोमानिया के कसाईखानों से ही मांस खरीदने की बात दोहराई है. वहीं रोमानिया ने भी जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया है. रोमानिया के कृषि मंत्री डानियल कॉन्स्टैन्टीन ने बुधवार को कहा, "रोमानिया की कंपनियों ने यूरोपीय संघ के बाजार में जितना भी घोड़े का मांस भेजा, उस सब पर सही तरह से लेबल लगाया गया था."

जर्मनी में भी

पहले कहा जा रहा था कि जर्मनी पर इसका कोई असर नहीं पड़ा है, लेकिन ताजा रिपोर्टों के अनुसार जर्मन प्रांत नॉर्थ राइन वेस्टफेलिया में भी घोड़े के मांस से बना खाना पहुंचा. इस बीच जर्मनी में आल्डी, काइजर्स और रियाल जैसे सुपर बाजार उस सामान को अपनी ताखों से हटा चुके हैं जिनमें घोड़े का मांस डले होने का शक है. देश में बेहतर कानूनों की मांग की जा रही है.

ग्रीन पीस के प्रवक्ता युर्गेन क्निर्श का कहना है कि इस तरह की तकनीक भी मौजूद है, जिसके तहत उपभोक्ता इंटरनेट के जरिए यह जान सकेंगे कि उन्होंने जो सामान खरीदा है वह कहां से बन कर आया है. एफ-ट्रेस नाम की इस तकनीक में खेतों या कसाईखानों से ले कर अलग अलग जगहों से होते हुए कोई भी उत्पाद बाजार तक कैसे पहुंचा, यह पूरी जानकारी मिल सकेगी. लेकिन अत्यधिक खर्च आने के कारण अब तक इसे लागू नहीं किया गया है.

रिपोर्ट: ईशा भाटिया (एएफपी, डीपीए, रॉयटर्स)

संपादन: महेश झा

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