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मनोरंजन

खाड़ी में वैटिकन की पहली प्रदर्शनी

वैटिकन कैथोलिक गिरजे का मुख्यालय है, लेकिन साथ ही उसके पास अकूत सांस्कृतिक धरोहर भी है. धार्मिक सहयोग की मिसाल पेश करते हुए वैटिकन शरजाह के म्यूजियम में अपनी कलाकृतियों का प्रदर्शन कर रहा है.

वैटिकन के एथनोलॉजी म्यूजियम की कलाकृतियों की किसी अरब देश में पहली प्रदर्शनी हो रही है. इनमें 12वीं से 19वीं सदी की प्रसिद्ध कलाकृतियां तो हैं ही, अरब दुनिया की रोजमर्रा की चीजें भी हैं. अरब इलाकों से 1925 में हुई विश्व प्रदर्शनी में शामिल होने के लिए वैटिकन गई चीजें पहली बार वापस लौटी हैं. छह साल से जर्मन मूल की कला इतिहासकार उलरीके अल खामिस इस्लामी आर्ट म्यूजियम की प्रमुख हैं. दरअसल उन्हें शरजाह के अमीर के कलेक्शन को संभालने के लिए नियुक्त किया गया था, लेकिन इस बीच इस अमीरात ने कला की दुनिया में अपनी खास जगह बना ली है.

अब उन्होंने दुबई में जो प्रदर्शनी आयोजित की है, वह लोगों की उम्मीदों से कहीं दूर तक जाती है. अपने एयर कंडीशन कमरे में वे बताती हैं, "यह वैटिकन के साथ किसी अरब मुल्क का पहला सहयोग है." और सचमुच शरजाह की प्रदर्शनी सनसनीखेज है. सिर्फ इसलिए नहीं कि यहां शीशे के डब्बों में अद्भुत कलाकृतियां दिखाई जा रही हैं, बल्कि इसलिए कि इस प्रदर्शनी से ईसाइयत और इस्लाम के बारे में नई समझ पैदा हुई है, जो धर्मों के बीच संवाद का सांस्कृतिक संकेत बदल रही है.

संवाद की कला

प्रदर्शनी में गुलदान, कलाई की पट्टी, मुहर, हथियार, कालीन और मूल्यवान छुरे दिखाए जा रहे हैं. ये सब इस्लामी दुनिया के उत्पाद हैं, लेकिन इस समय वैटिकन की मिल्कियत हैं.मोरक्को से लेकर पश्चिमी चीन तक फैसी इस्लामी दुनिया की कलाकृतियां, जिन्हें अब देखा और निहारा जा सकता है. इनके अलावा इस तरह की चीजें भी प्रदर्शनी में दिखाई जा रही हैं जो पश्चिम और इस्लामी दुनिया के बीच संवाद का प्रतीक है, मसलन नाखून जितनी बड़ी कुरान जिसे ग्लासगो के प्रेस में छापा गया है. या फिर पश्चिम चीन का पीसा जग, जिसपर अरब अक्षर लिखे हैं, लेकिन चारों ओर बौद्ध धर्म का संकेत कमल फूल है.

उलरीके अल थामिस कहती हैं, "हमारे पास इस प्रदर्शनी की तैयारी के लिए सिर्फ एक साल था." जब कोलोन में पैदा हुई उलरीके वहां पहुंची थी तो उन्हें पता नहीं था कि उन्होंने कैसी जिम्मेदारी हाथ में ली है. "मैं अपने साथियों के साथ रोम गई. हमने साथ मिलकर, शरजाह के विशेषज्ञों और ईसाई कला इतिहासज्ञ ने वैटिकन के कमरों को छान मारा, और बहुत सी ऐसी चीजें निकाली जिन्हें अब तक सार्वजनिक रूप से दिखाया नहीं गया था." नतीजतन ऐसी प्रदर्शनी तैयार हुई है जो इस्लाम को उसकी व्यापकता में दिखाता है.

संग्रह में मुस्लिम कला

लेकिन इस्लामी कलाकृतियां वैटिकन पहुंची कैसे? पोप पीउस ग्यारहवें ने 1925 में एक सांस्कृतिक विश्व प्रदर्शनी का आयोजन किया. एक प्रदर्शनी जिसके लिए उन्हें दुनिया भर से तोहफे भेजे गए. वैटिकन के संग्रहालय में ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों की कलाकृतियां भी हैं और दक्षिण अमेरिका, एशिया और पोलीनेशिया के नागरिकों की भी. उनके साथ इस्लामी दुनिया की तलवारें, गहने और पोशाक भी.

समस्या यह है कि इनका क्या किया जाए. उस समय दुनिया भर से 100,000 कलाकृतियां रोम आईं. 1926 में पोप ने उन्हें रखने के लिए एक नया एथनोलॉजी म्यूजियम बनवाया. वह बार बार खुला, बार बार बंद हुआ. सही मायनों में वह कभी खुला नहीं रहा. इसलिए उसके मौजूदा प्रमुख फादर निकोला मापेली उसे दूसरी संस्कृतियों के साथ संवाद के जरिए खोलना चाहते हैं. और उसके लिए उन्हें शरजाह में प्रदर्शनी की संभावना मिली.

कूटनीति की कला

शरजाह एक मायने में सौभाग्य था. यहां शरजाह के संस्कृति प्रेमी सुल्तान अल कासिमी धार्मिक संवाद का समर्थन करते हैं. उन्होंने शरजाह में 20 साल पहले अरब दुनिया में समकालीन कला का पहला द्विवार्षिक मेला शुरू किया था . उनके अमीरात में 40 म्यूजियम भी हैं. वेटिकन ने प्रदर्शनी के कैटेलॉग में कहा है कि वह इस्लामी कलाकृतियों को लियोनार्डो, रफाएल और माइकलएंजेलो जैसा ही सम्मान दे रहा है. वैटिकन द्वारा अपनी कलाकृतियों को पहली बार किसी और को देना कूटनीति का हिस्सा है जो नए पोप फ्रांसिस्कुस की नई नीतियों के अनुकूल है.

पुराने पोप बेनेडिक्ट ने दूसरे धर्मों के प्रति दूरी बना रखी थी, उनके उत्तराधिकारी एकदम अलग नीति पर चल रहे हैं. उन्होंने एथनोलॉजी म्यूनियम के स्पॉन्सरों के सामने बोलते हुए धार्मिक, सामाजिक और नैतिक मामलों में संस्कृति की जोड़ने वाली भूमिका की ओर ध्यान दिलाया था. शरजाह प्रदर्शनी का टाइटिल भी इसके अनुरूप ही है, "ताकि आप एक दूसरे को जान सकें." दरअसल कुरान की एक आयत. एक दूसरे को जानना यानि एक मौका. ईसाइयत और इस्लाम के बीच एकदम अलग तरह का संवाद, बराबरी का संवाद.

रिपोर्ट: वैर्नर ब्लॉख/एमजे

संपादन: ईशा भाटिया