खस्ताहाल है जर्मन सेना | ब्लॉग | DW | 07.10.2014
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ब्लॉग

खस्ताहाल है जर्मन सेना

एक ओर जर्मनी अपनी सेना की अंतरराष्ट्रीय गतिविधियां बढ़ाना चाहता है तो दूसरी ओर विमानों की खराब क्वालिटी की खबरें आ रही हैं. डॉयचे वेले के ग्रैहम लूकस मानते हैं कि जर्मनी को तय करना होगा कि वह कितना खर्च करने को तैयार है.

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जर्मनी की रक्षा मंत्री उर्सुला फॉन डेय लाएन

पांच दशक पहले 1962 में जर्मन पत्रिका डेय श्पीगेल का यह दावा कि जर्मन सेना सोवियत संघ के संभावित हमले से देश की रक्षा करने की हालत में नहीं है, राजनीतिक हंगामे की वजह बन गया था. देश की सुरक्षा को खतरा पहुंचाने के आरोप में श्पीगेल के दफ्तर पर छापे मारे गए, प्रमुख पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया, लेकिन आखिर में प्रेस की स्वतंत्रता पर हमले के लिए रक्षा मंत्री की कुर्सी भी गई.

अब जर्मनी की रक्षा मंत्री उर्सुला फॉन डेय लाएन पर आरोप लग रहे हैं कि देश की सेना चुस्त दुरुस्त नहीं है. उनकी लोकप्रियता गिरी है. जर्मनी में बहुत कम लोग ऐसे हैं जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जर्मनी की सैनिक हिस्सेदारी में इजाफा चाहते हैं, खासकर तब जब नाटो के सदस्य के रूप में अफगानिस्तान में जर्मन सेना की तैनाती का समय खत्म हो रहा है.

लेकिन वे चाहते हैं कि जर्मनी जरूरत पड़ने पर मदद कर सके. जर्मन जनमत इस्लामिक स्टेट के खिलाफ संघर्ष में कुर्दों को सैनिक मदद देने के पक्ष में है. बहुमत को इस्लामी कट्टरपंथी हमलों का डर है. यूक्रेन में रूस की नीतियों ने बहुत से लोगों को चौंकाया है और सोवियत खतरों की यादें ताजा हो गई हैं.

अब जर्मन आबादी का बहुमत सेना पर अधिक खर्च किए जाने के पक्ष में है. लोगों को इस खबर ने चौंका दिया है कि सैनिक साजो सामान स्तरीय नहीं है. सवाल पूछा जा रहा है कि यह नौबत आई कैसे. जर्मनी के मुख्य लड़ाकू विमान यूरोफाइटर की आपूर्ति क्वालिटी की मुश्किलों के कारण रोक दी गई. मीडिया के अनुसार इजेक्टर सीट के साथ समस्याएं हैं. जर्मनी का ट्रांसपोर्ट प्लेन ब्रांसऑल पुराना हो चुका है और भरोसमंद नहीं रहा. सेना के 190 हेलीकॉप्टरों में सिर्फ 41 उड़ान भरने लायक हैं, जी36 राइफलों की क्वालिटी भी संदेह के घेरे में है. पिछले साल यूरोड्रोन परियोजना करोड़ों यूरो के खर्च के बाद रोक दी गई. लिस्ट लंबी है और इनमें से कोई संगठित और इनुशासित होने की जर्मनी की छवि के साथ फिट नहीं बैठती.

निश्चित तौर पर यह उर्सुला फॉन डेय लाएन की गलती नहीं है जिन्होंने सिर्फ एक साल पहले रक्षा मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली है. समस्या की जड़ें गहरी है. शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद जर्मनी बहुत झिझक के साथ नाटो के इलाके से बाहर अंतरराष्ट्रीय मिशनों में योगदान देने को तैयार हुआ. बहुत से लोगों की राय थी कि सोवियत संघ के खात्मे के बाद सैनिक खर्च ऊंचे स्तर पर बनाए रखने की कोई जरूरत नहीं थी. रक्षा मंत्रालय कम विकास दर वाले वर्षों में बजट कटौतियों का आसान लक्ष्य बन गया.

सेना की समस्याओं को देखते हुए अब जर्मनी को फैसला लेना होगा कि वह किस तरह की सेना चाहती है और उसके लिए कितना खर्च करने को तैयार है. यह वह फैसला है जो देश के राजनीतिज्ञ एकीकरण के बाद से ही टालते आ रहे हैं. यदि जर्मनी सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट चाहता है तो उसके साथी उससे दुनिया भर में मध्यस्थ और शांति रक्षक के रूप में ज्यादा जिम्मेदारी उठाने की अपेक्षा करते हैं. ऐसा करने के लिए सैनिक पर ज्यादा खर्च करने की जरूरत है. लेकिन पहले जनमत में इस पर बहस करनी होगी. इस बार मामला 1962 की तरह प्रेस की आजादी का नहीं है, इस बार मामला यह है कि जर्मनी अपनी सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय समुदाय में प्रभावी भूमिका के लिए कितना खर्च करने को तैयार है.

ब्लॉग: ग्रैहम लूकस

संपादन: महेश झा

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