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ब्लॉग

खत्म नहीं हुई भारत में आयाराम गयाराम राजनीति

तमिलनाडु में मुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेल्वम के इस्तीफे और बाद में इस्तीफे के लिए दबाव का आरोप लगाए जाने के बाद पद के लिए खींचतान जारी है. तमिलनाडु की घटना ने एक बार फिर भारत में लोकतंत्र की मुश्किलों को उजागर किया है.

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री और एआईएडीएमके की सर्वोच्च नेता जे. जयललिता के निधन के बाद से राज्य में चल रहा राजनीतिक प्रहसन भारतीय राजनीति में आयी चौतरफा गिरावट को तो दर्शाता ही है, साथ ही उससे यह भी पता चलता है कि दशकों पहले आयाराम-गयाराम की जो प्रवृत्ति शुरू हुई थी, उस पर अभी तक कोई नियंत्रण नहीं लग पाया है. तमिलनाडु की घटनाएं इस बात की भी गवाह हैं कि अधिकांश राजनीतिक पार्टियां लोकतांत्रिक संगठन होने के बजाय व्यक्ति विशेष या परिवार विशेष द्वारा चलाई जाने वाली निजी कंपनियां बन कर रह गई हैं और व्यक्तिपूजा ने राजनीति में गहराई तक जड़ें जमा ली हैं.

इस समय स्थिति यह है कि एआईएडीएमके टूट के कगार पर है. मुख्यमंत्री ओ. पन्नीरसेल्वम ने पार्टी महासचिव वी. के. शशिकला के खिलाफ विद्रोह कर दिया है जबकि पहले उन्हीं ने महासचिव के पद के लिए उनका नाम प्रस्तावित किया था और फिर अपने पद से इस्तीफा दे दिया था ताकि शशिकला मुख्यमंत्री बन सकें. इसके बाद पार्टी विधायकों की एक बैठक में शशिकला को सर्वसम्मति से नेता चुन लिया गया. लेकिन इसके बाद अचानक पन्नीरसेल्वम ने घोषणा की कि उनसे जबर्दस्ती इस्तीफा दिलवाया गया और ‘अम्मा' यानी जयललिता की आत्मा ने उनसे कहा है कि वे पार्टी को एक रखने के लिए हर संभव प्रयास करें.

मूल्यहीन होती राजनीति

इस घटनाक्रम से ही स्पष्ट है कि भारतीय राजनीति कितनी दिवालिया और मूल्यविहीन हो चुकी है. शशिकला को किसी किस्म का राजनीतिक अनुभव नहीं है. उनकी एकमात्र योग्यता यह है कि वे जयललिता के इतना अधिक करीब थीं कि एक लंबे अरसे से उन्हीं के साथ रह रही थीं. लेकिन बीच में एक समय ऐसा भी आया था जब जयललिता ने उन्हें घर से बाहर निकाल दिया था और फिर इसी शर्त पर वापस आने दिया था कि उनके परिवार के व्यक्ति दूर रहेंगे. दोनों ने कई कंपनियों में निवेश भी किया था और शशिकला के ऊपर भी भ्रष्टाचार के मुकदमे चल चुके है. एक मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला अगले कुछ ही दिन में आने वाला है.

जयललिता ने एक इंटरव्यू में स्पष्ट किया था कि शशिकला केवल उनके घर की देखभाल करती हैं क्योंकि राजनीतिक व्यस्तता के कारण वे स्वयं ऐसा नहीं कर पातीं. लेकिन जयललिता के बीमार पड़ते ही शशिकला बेहद महत्वपूर्ण और प्रभावशाली हो गईं. पन्नीरसेल्वम ने किसी भी कदम पर उनका विरोध नहीं किया. इसलिए अचानक उनकी अंतरात्मा जागने पर किसी को विश्वास नहीं हो रहा है. हकीकत यह है कि उन्हें भारतीय जनता पार्टी की ओर से समर्थन का आश्वासन मिल चुका है और इसीलिए राज्यपाल विद्यासागर राव ने उनका इस्तीफा मंजूर करने के बावजूद शशिकला को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने का कोई प्रयास नहीं किया है. कुछ लोग इसकी आलोचना कर रहे हैं लेकिन सोली सोराबजी जैसे प्रख्यात कानूनविद मानते हैं कि राज्यपाल अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करके इसे कुछ दिन के लिए टाल सकते हैं क्योंकि यदि मुख्यमंत्री बनने के बाद सुप्रीम कोर्ट का फैसला शशिकला के खिलाफ गया तो उन्हें तत्काल अपने पद से इस्तीफा देना पड़ेगा और राज्य में एक बार फिर राजनीतिक अस्थिरता छा जाएगी.

कमजोर होती राजनीतिक प्रक्रिया

इस पूरे प्रकरण में कुछ ऐसे मुद्दे एक बार फिर उभर कर सामने आए हैं जिन पर पहले भी काफी चर्चा हो चुकी है लेकिन कोई समाधान नहीं निकल पाया है. सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा राजनीतिक प्रक्रिया का है. आज स्थिति यह है कि कोई भी व्यक्ति केवल इस कारण विधायक, सांसद या मंत्री बन सकता है क्योंकि उसका किसी एक महत्वपूर्ण नेता या परिवार से संबंध है. नीचे से राजनीतिक काम करके पार्टी संगठन में ऊपर उठना अब आवश्यक नहीं रह गया है. सामाजिक न्याय की अलमबरदार पार्टियां और नेता इस रुझान को बढ़ाने में सबसे आगे रहे हैं.

बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद को जब चारा कांड में आरोपी होने के कारण जेल जाना पड़ा तो उन्होंने अपनी जगह अपनी पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री की गद्दी पर बैठा दिया. तब तक राबड़ी देवी एक घरेलू महिला थीं और राजनीति से कतई दूर थीं. लेकिन पार्टी में इसके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठी और बड़े-बड़े अनुभवी नेता हाथ जोड़कर कतार में लग गए. समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव के परिवार के दर्जन भर सदस्य विधायक, सांसद, मंत्री और मुख्यमंत्री हैं. कम्युनिस्ट पार्टियों को छोडकर अन्य पार्टियों में भी हालत कमोबेश ऐसी ही है. कांग्रेस में तो गांधी परिवार का वर्चस्व जगजाहिर है लेकिन भारतीय जनता पार्टी में भी राष्ट्रीय स्तर पर नहीं लेकिन राज्यों के स्तर पर नेताओं के परिजनों को खासा महत्व दिया जाता है.

तमिलनाडु की घटनाओं को इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाना जरूरी है क्योंकि उनसे राजनीतिक मूल्यों के क्षरण और पार्टियों के जेबी संगठनों में तब्दील होने की पुष्टि होती है. चुनाव आयोग ने एक नोटिस भेज कर शशिकला के पार्टी महासचिव बनने पर सवालिया निशान लगा दिया है क्योंकि पार्टी संविधान के मुताबिक इस पद के लिए बाकायदा चुनाव होता है जिसमें पार्टी सदस्य वोट डालते हैं. लेकिन शशिकला के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. उधर शशिकला ने अपने पद के अधिकारों का प्रयोग करके ई. मधुसूदनन जैसे उन वरिष्ठ नेताओं को पार्टी से निकालना शुरू कर दिया है जो पन्नीरसेल्वम का साथ दे रहे हैं. विधायकों की खरीद-फरोख्त की आशंका भी व्यक्त की जा रही है. यानी स्वार्थ-आधारित राजनीति अपने असली रूप में जनता के सामने है.

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