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खेल

क्रॉस और फरिश्तों से आगे फुटबॉल

दुनिया के कई देशों में फुटबॉल सिर्फ बुखार नहीं बल्कि धर्म बन चुका है. जर्मनी में एक बच्चे ने अपनी कब्र के पत्थर पर फुटबॉल लगवाने की जिद कर दी. चर्च ने ऐसा करने से इनकार किया लेकिन नए धर्म के आगे पुरानी सोच को झुकना पड़ा.

लंबे समय से बीमार नौ साल के येन्स पास्कल ने आखिरी पलों में अपनी मां से कहा, "मम्मी मैं चाहूंगा कि जब मैं मरूं तो कब्र के पत्थर पर क्लब का लोगो लगाया जाए." जर्मन फुटबॉल क्लब बोरुसिया डॉर्टमुंड के प्रशंसक उस बच्चे की मौत के बाद घरवालों ने कब्र के पत्थर पर एक फुटबॉल लगानी चाही. लेकिन कैथोलिक चर्च ने ऐसा करने की इजाजत नहीं दी. कहा ऐसा करना है तो जमीन नहीं मिलेगी. चर्च ने इसे अपने नियमों के खिलाफ बताया.

बात जंगल में आग की तरह पूरे जर्मनी में फैली. कैथोलिक चर्च के फैसले का भारी विरोध हो गया. फेसबुक पर 10,000 से ज्यादा लोगों ने तल्ख कमेंट कर बच्चे के समर्थन में अभियान छेड़ दिया है. अभियान को 'येन्स पास्कल की आखिरी ख्वाहिश' नाम दिया गया है. कुछ लोगों ने कहा, "चर्च को नियमों की नहीं, हृदय की बात करनी चाहिए." दूसरे व्यक्ति ने अपने कमेंट में कहा, "इससे फर्क नहीं पड़ता कि आप कौन से क्लब के फैन हैं. इस मामले में हम सब एक साथ है और हम तभी रुकेंगे जब बच्चे की आखिरी इच्छा पूरी की जाएगी." तीखे विरोध के बाद चर्च थोड़ा झुका भी है. उसका कहना है कि फुटबॉल का प्रतीक लगाया जा सकता है लेकिन सबसे ऊपर नहीं.

करीब डेढ़ लाख लोगों दबाव में चर्च के झुकने के बाद फेसबुक के 'येन्स पास्कल की आखिरी ख्वाहिश' पेज पर कहा गया, "अब हमें पत्थर मिल गया है, भले ही उसकी जगह योजना से थोड़ी हटकर है हमें उम्मीद है कि अब वह चिरकालीन शांति में रहेगा."

Grabstein eines BVB Fans

डॉर्टमुंड के फैन येन्स पास्कल के पिता आंद्रेयास फ्लामे क्नीट

इस मामले के बाद जर्मनी के दूसरे फुटबॉल क्लब और डॉर्टमुंड के धुर विरोधी शाल्के ने अपने प्रशंसकों के लिए कब्रिस्तान बनाने का एलान किया है. 4000 वर्ग मीटर के कब्रिस्तान में इंटरनेट के जरिए बुकिंग कराई जा सकती है. शाल्के के मुताबिक फिलहाल उसके पास 1904 कब्रें हैं. कब्र के ऊपर शाल्के क्लब की तरह नीले रंग का आवरण बनाएगा, उपर फुटबॉल बनाई जाएगी. आवरण की कीमत 1,000 यूरो से ज्यादा है. सालाना फीस भी है. 25 साल तक देखरेख की सुविधा भी है. कब्रिस्तान को फुटबॉल के स्टेडियम जैसा बनाया गया है, उसमें नीले और सफेद फूल भी लगे हैं. क्लब ने बयान में कहा हैं, "कीमत डिजायन और रख रखाव की है. शाल्के किसी की मौत से पैसा नहीं बनाएगा." शाल्के के प्रमुख एंडर उलुपिनार के मुताबिक, "शाल्के के प्रंशसकों के लिए ऐसी जगह की जरूरत है."

कब्र के लिए पत्थर तराशने वाले कारीगर भी मान रहे हैं कि समय बहुत बदल चुका है. डॉयचे वेले ने ट्रियर शहर में 40 साल से पत्थर की नक्काशी करने वाले ऐसे ही एक कारीगर हांस-पेटर मेलसिजेडेख से बातचीत की और पूछा कि क्रब के लिए अब लोग किस तरह के अलग डिजायन के पत्थर चाहते हैं? जवाब में मेलसिजेडेख ने कहा, " मैंने एक कब्र के लिए मोटरसाइकिल के आकार का पत्थर तराशा, उसके पास ही एक कब्र पर फुटबॉल बनी हुई थी. कोलोन में एक कब्र का पत्थर मोबाइल फोन की तरह दिखता है. इन दिनों यह कोई असामान्य बात नहीं रह गई है." तो क्या ऐसे पत्थर लगाने की अनुमति मिली? मेलसिजेडेख कहते हैं, "संबंधित प्रशासनिक निगमों ने इसकी इजाजत दी. मुझे पत्थर पर इस तरह की कारीगरी करने में कोई दिक्कत नहीं है."

क्या इन पत्थरों की तुलना डॉर्टमुंड (जर्मनी का फुटबॉल क्लब) के नौ साल के प्रशंसक बच्चे की कब्र वाले मामले से की जा सकती है? इन मामलों में काफी समानता है. व्यक्तिगत तौर पर मेलसिजेडेख को समझ में नहीं आता कि क्यों कैथोलिक चर्च ऐसे मुद्दों से इनकार करता है. समय बदल रहा है और कब्र पर लगे संकेत भी बदल रहे हैं. वो कहते हैं कि अब क्लासिक क्रॉस या मूर्ति नहीं लगाई जाती.

मेलसिजेडेख जैसे लोगों को यह भी लगता है कि नगर निगम के कब्रिस्तानों के बजाए कैथोलिक कब्रिस्तानों में नियम ज्यादा कड़े हैं? ट्रियर में चर्च के दो कब्रिस्तान हैं, वहां मूर्तियां लगी हैं और निगम के कब्रिस्तानों की तुलना में नियम भी कड़े हैं. कब्र के पत्थर को लेकर दोनों तरह के कब्रिस्तानों में लोगों को नियमों की ज्यादा जानकारी भी नहीं है. दफनाने के बाद कब्रिस्तान में जाने पर पता चलता है कि यहां कड़े नियम हैं.

निगम के कब्रस्तानों को लगता है कि विवाद होने पर मामला कोर्ट में जा सकता है और फैसला उनके खिलाफ जा सकता है. मेलसिजेडेख बताते हैं, "वे अदालत में कहेंगे कि इस तरह का पत्थर या सीमेंट का ये, वो आप कब्र पर नहीं लगा सकते, यह नियम के खिलाफ है. लेकिन अदालत में यह मामला नहीं टिकेगा. अदालत बुनियादी सिद्धांत की बात करेगी और कहेगी कि हर किसी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है."

रिपोर्टः ओंकार सिंह जनौटी/सारा श्टेफान (रॉयटर्स, एएफपी)

संपादनः एन रंजन

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