1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

ब्लॉग

क्रूरता की कीमत पर सुंदरता से तौबा

किसी के जीवन की कीमत पर इंसानी देह की सुंदरता बढ़ाने से भारत ने तौबा कर ली है. पशुओं पर क्रूर प्रयोग कर सौंदर्य प्रसाधन बनाने और आयात करने को प्रतिबंधित कर भारत ने अमेरिका और चीन जैसे अग्रणी देशों के लिए नजीर पेश की है.

सौंदर्य प्रसाधनों का जाननरों पर परीक्षण करने को प्रतिबंधित करने के कुछ महीने बाद ही भारत ने ऐसे परीक्षण से गुजरने वाले प्रोडक्ट के आयात पर भी रोक लगा कर मुनाफे पर टिके कारोबारी हितों के बजाय जीव मात्र के जीवन को अहमियत देने का संदेश दुनिया को देने की कोशिश की है. सही मायने में भारत का यह फैसला न सिर्फ जीव हिंसा को रोकने के लिहाज से महत्वपूर्ण है बल्कि आर्थिक कूटनीति के नजरिए से भी अहम है. बेशक इस मुहिम के पीछे केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी का सार्थक सहयोग हासिल है लेकिन इसमें स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन के सक्रिय योगदान को नहीं नकारा जा सकता है.

दरअसल अगले 13 नवंबर से प्रभावी होने वाले इस प्रतिबंध को लागू करने के लिए भारत सरकार ने ड्रग एंड कॉस्मेटिक कानूनों में बदलाव किया है. ये नियम स्वास्थ्य मंत्रालय के क्षेत्राधिकार में आते हैं. इसलिए सौंदर्य प्रसाधनों का जानवरों पर परीक्षण पहले से प्रतिबंधित होने के बाद अब इसमें आयात भी प्रतिबंधित हो गया है.

इस नियम में बदलाव का सीधा असर चीन, जापान और अमेरिका से होने वाले आयात पर पड़ना लाजिमी है. हालांकि इस पहल के संवेदनात्मक पक्ष से इतर कारोबारी लिहाज से देखा जाए तो कानून के जानकारों का मानना है कि भारत को इस तरह का प्रतिबंध नहीं लगाने वाले देशों के साथ आयात निर्यात संबंधी अंतरराष्ट्रीय करार तोड़ने पड़ सकते है. अंतरराष्ट्रीय कानून के जानकार प्रोफेसर अविनाश हजेला का मानना है कि भारत सौंदर्य प्रसाधनों के लिए दुनिया का बड़ा बाजार है. इस क्षेत्र की चीन, जापान और खासकर अमेरिका की तमाम कंपनियों ने द्विपक्षीय समझौंतों के तहत भारत में भारी निवेश किया है. ऐसे में ये कंपनियां भारत में पुराने नियमों की बाध्यता का हवाला देकर हर्जाने का दावा कर सकती हैं. हालांकि दुनिया को अहिंसा का संदेश देने वाले देश में इस तरह की पहल को कारगर बनाने के लिए आर्थिक नुकसान की दलील निराधार और बेमानी लगती है.

ऐसे में इस बात की चिंता की जानी चाहिए कि प्रतिबंध प्रभावी तौर पर कितना लागू हो पाएगा. दरअसल बीते छह दशक का इतिहास बताता है कि कानूनों की बहुलता के मामले में भारत अव्वल होने के बाद भी इन्हें लागू कर पाने में नितांत अक्षम साबित हुआ है. खासकर सौंदर्य प्रसाधनों के जानवरों पर पूर्व परीक्षण को प्रतिबंधित करने के चंद महीने बाद भी अब तक सरकार ठोस प्रमाण नहीं दे पाई है कि उक्त बदलाव के फलस्वरुप कितने जानवरों को जीवनदान मिला है. इसी तरह तीस दिन की तैयारियों के बाद जानवरों पर प्रयोग करने वाले सौंदर्य प्रसाधनों का आयात तस्करी के माध्यम से भारत की सीमा में नहीं आ पाएगा, इसकी गारंटी भी आने वाला वक्त ही दे सकेगा.

DW.COM

संबंधित सामग्री