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ब्लॉग

क्यों हमेशा गरीबों पर ही चलते हैं बुलडोजर?

शनिवार को दिल्ली की शकूर बस्ती में जो कुछ हुआ, उससे वे सब बातें एक बार फिर से उजागर हो गईं जिनके कारण भारत दुनिया भर में बदनाम है. इस घटना पर राजनीति भी तेज हो गई है.

यूं तो भारत एक लोकतंत्र है जिसमें हर नागरिक को समान अधिकार प्राप्त हैं, लेकिन हकीकत यह है कि गरीब और अमीर के बीच हर तरह की खाई मौजूद है और वह बढ़ती जा रही है. यह खाई एक ओर जीवनस्तर की है तो दूसरी ओर बुनियादी अधिकारों और सरकारी रवैये की. जहां सरकार, नौकरशाही और न्यायपालिका अमीर के प्रति पक्षपात प्रदर्शित करती नजर आती है, वहीं गरीब के प्रति उसका रवैया उपेक्षा बल्कि नफरत से भरा है. गरीबों का उत्पीड़न करने में सरकारी एजेंसियां सबसे आगे रहती हैं जबकि उनका संवैधानिक दायित्व उसे संरक्षण देने का है.

सर्दी में ही क्यों?

यह केवल संयोग नहीं हो सकता कि जब भी दिल्ली में अतिक्रमण हटाने के नाम पर गरीबों की झुग्गी-झोंपड़ियों को हटाया जाता है, उस समय कड़ाके की ठंड पड़ रही होती है. सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देश हैं कि ऐसी कोई भी कार्रवाई करने से पहले झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वालों के लिए रहने की वैकल्पिक व्यवस्था की जाए और उनके पुनर्वास की पक्की योजना बनाने के बाद ही उन्हें उनकी झोंपड़ियों से हटाया जाए. लेकिन शायद ही कभी ऐसा किया जाता हो. झुग्गी-झोंपड़ियों को गिराने वाली एजेंसी चाहे दिल्ली विकास प्राधिकरण हो या रेलवे, सभी ऐसी निर्ममता और संवेदनहीनता के साथ काम करते हैं कि देखने वालों के दिल दहल उठते हैं.

जिन गरीबों को कड़ाके की ठंड के बीच उनकी झोंपड़ियों से बेघर करके खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर किया जाता है, उनकी स्थिति की तो बस कल्पना ही की जा सकती है. शनिवार को रेलवे ने अपनी जमीन पर बसी 1200 झुग्गियों पर बुलडोजर चलवा दिया. अगर यह मानें कि एक झुग्गी में औसतन चार लोग रह रहे थे, तो जाहिर है कि लगभग पांच हजार लोगों को बेघर कर दिया गया. आश्चर्य नहीं कि इस सब अफरातफरी में छह माह की एक बच्ची की मौत हो गई. रेलवे इस मौत से भी पल्ला झाड़ रही है लेकिन पोस्टमार्टम की रिपोर्ट से स्पष्ट है कि मौत झुग्गियों को गिराने के दौरान ही हुई.

घटना पर राजनीति

संसद का सत्र चल रहा है और स्वाभाविक रूप से इस घटना पर राजनीति भी तेज हो गई है. रेलवे और दिल्ली पुलिस कानूनी दृष्टि से तकनीकी सफाई दे रहे हैं, दिल्ली सरकार ने जांच के आदेश दे दिये हैं और कांग्रेस तथा अन्य पार्टियां गरीबों की हमदर्द बनने का ढोंग कर रही हैं, बिना यह सोचे कि जब वे सत्ता में थीं तब भी क्या इस तरह की घटनाएं नहीं होती थीं? बुनियादी सवाल यह है कि क्या जमीन का स्वामित्व किसी भी व्यक्ति या संस्था या संगठन को यह अधिकार देता है कि वह जब चाहे उस पर रहने वाले को बेदखल कर दे? क्या संपत्ति का अधिकार जीवन के अधिकार से बड़ा है? क्या खाली कराई गई जमीन के विकास के नाम पर लोगों से उनके जीवनयापन का अधिकार छीना जा सकता है? क्या सरकार का काम गरीबों को रिहाइशी सुविधाएं मुहैया कराना है या जो थोड़ी-बहुत उन्हें उपलब्ध हैं, उन्हें भी छीन लेना है?

भारतीय लोकतंत्र को इन सवालों के जवाब ढूंढने होंगे. इन सवालों का संबंध किसी एक राजनीतिक दल से नहीं बल्कि समूची व्यवस्था से है. देश की नौकरशाही जनता की सेवा करने के बजाय उसका दमन करना अपना फर्ज समझती है और एक लोकतांत्रिक व्यवस्था के अधीन काम करने वाली नौकरशाही के रूप में नहीं बल्कि औपनिवेशिक उत्पीड़नकारी नौकरशाही के रूप में काम करती है. जब तक राजनीतिक नेतृत्व उस पर लगाम नहीं कसेगा और उसे उसके कर्तव्य का बोध नहीं होगा, तब तक ऐसी दुखद घटनाएं होती रहेंगी. शायद ही कभी किसी अमीर व्यक्ति से कर्ज वसूल करने के लिए उसे उसके घर से बेदखल किया गया हो लेकिन औद्योगिक विकास के नाम पर गरीब गांव वालों से उनकी जमीन छीन कर उन्हें सड़क पर लाकर फेंक देना आम बात हो गई है. यदि आम गरीब नागरिक का विश्वास इस व्यवस्था से उठ गया, तो इसका चलना बहुत कठिन हो जाएगा.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

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