क्यों वर्ल्ड कप खेलने नहीं गई भारतीय टीम | खेल | DW | 14.06.2018
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खेल

क्यों वर्ल्ड कप खेलने नहीं गई भारतीय टीम

1950 में भारतीय फुटबॉल फेडरेशन के एक फैसले ने भारत में फुटबॉल की तस्वीर ही बदल दी. जानकार मानते हैं कि उस वक्त अगर वह फैसला न लिया गया होता तो आज भारत का फुटबॉल के क्षेत्र में अलग ही मुकाम होता.

एक अरब की आबादी वाले देश में क्या कहीं फुटबॉल नहीं खेली जाती? क्या आजादी के 70 साल बाद भी यहां लोगों में फुटबॉल के खेल को लेकर दीवानगी पैदा नहीं हुई. यह सवाल फीफा विश्वकप के आंकड़ों को देखकर उठना लाजिमी है, जिसमें आज तक कोई भी भारतीय टीम नहीं खेली. कहा जाता है कि भारत ने साल 1950 के फुटबॉल विश्वकप में क्वालिफाई किया था, लेकिन टीम खेलने नहीं पहुंची. सुनने में तो यह भी आता है कि भारतीय टीम नंगे पैर फुटबॉल खेलती थी और फीफा मुकाबलों में खिलाड़ियों को जूते पहन कर गेम में शामिल होना होता था. जिस वजह से फीफा ने भारतीय टीम पर प्रतिबंध लगा दिया.

लेकिन फ्री प्रेस जर्नल ने उस वक्त फुटबॉल टीम के कप्तान रहे शैलेंद्र नाथ मन्ना के एक साक्षात्कार का हवाला देते हुए कहा है, "नंगे पैर फुटबॉल न खेल सकने का तर्क ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन की ओर से असल वजहों को छुपाने के लिए दिया गया था." मन्ना मानते थे कि इसका असल कारण टीम को ब्राजील न भेजना था.

लंबे वक्त तक ऐसा भी कहा जाता रहा कि ब्राजील में होने वाले इस विश्वकप में टीम को भेजना भारत के लिए बहुत महंगा सौदा था. उस वक्त की परिस्थिति में टीम बर्मा से होकर ब्राजील तक जाती, जो बहुत ही महंगा पड़ता. वहीं वित्तीय कारणों के चलते तुर्की ने भी विश्वकप से अपने पैर पीछे खींच लिए थे.

लेकिन कई मैग्जीन और फुटबॉल रिसर्च, आर्थिक स्थिति के तर्क को खारिज करते हुए कहते हैं कि आयोजक भारतीय टीम के सारे खर्चे को वहन करने के लिए तैयार थे. लेकिन आंतरिक कारणों के चलते ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन इस मामले पर सहमति नहीं बना पाया. नतीजतन, साल 1950 के विश्वकप में 16 की बजाय 14 टीमों ने भाग लिया. एशिया से भाग लेने वाली दोनों टीमें इससे नदारद रहीं. यहां तक कि एक समूह में सिर्फ दो टीमें खेली. स्पोर्ट्स जानकार यह भी कहते हैं कि फेडरेशन ने फीफा विश्वकप की बजाय हमेशा ही ओलपिंक को तवज्जो दी, और इसी बेरुखी के चलते टीम 1950 के फीफा विश्वकप में नहीं गई.

इस टूर्नामेंट में भारत के क्वालिफाई करने का एक कारण कुछ टीमों का टूर्नामेंट में भाग न लेना भी रहा. आंकड़ों के मुताबिक, भारत को स्वीडन, इटली और पराग्वे के साथ एक ग्रुप में रखा गया था. टूर्नामेंट में भारत का पराग्वे के साथ 25 जून को पहला मैच था. कार्यक्रम के मुताबिक उस साल 3 जुलाई 1950 तक विश्वकप के सभी लीग मैच भारत को समाप्त कर लेने थे. बड़ी टीमों के टूर्नामेंट से बाहर होने का एक कारण द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद कई देशों पर लगे प्रतिबंध भी थे. जिसके बाद ब्राजील फुटबॉल फेडरेशन ने एशिया से भारतीय टीम को मुकाबले में शामिल होने का न्योता दिया था. 

शुरू हो रहा है फुटबॉल वर्ल्ड कप

कुछ रिपोर्ट्स में ब्राजील तक आने-जाने में लगने वाले समय को भी भारतीय रुख का कारण बताया गया. इस तर्क के मुताबिक विश्वकप ब्राजील में होना था, ब्राजील तक पहुंचने में भारतीय टीम को पानी के जहाज से जाना पड़ता. इसमें करीब तीन से चार महीने का समय लगता. इसका मतलब था कि टीम कम से कम तीन-चार मैचों को खेलने के लिए सात-आठ महीने का समय लगाती. कुछ रिपोर्ट्स ने समय के अंतर को जिम्मेदार ठहराया. इसके मुताबिक भारतीय टीम 70 मिनट का गेम खेलती थी, लेकिन विश्वकप में आमतौर पर मैच 90 मिनट का होता है.

कारण चाहे जो भी रहे हो लेकिन सच्चाई तो यही है कि तब से आज तक कोई भी भारतीय टीम फुटबॉल विश्वकप के करीब भी नहीं पहुंच सकी है. मन्ना सारी उम्र यह मानते रहे कि अगर उस वक्त भारतीय टीम ने विश्वकप में हिस्सा लिया होता तो देश में फुटबॉल की तस्वीर ही बदल जाती.

फुटबॉल के कम लोकप्रियता के लिए कई लोग क्रिकेट को भी जिम्मेदार ठहराते हैं लेकिन सच्चाई यह भी है कि क्रिकेट ने देश को जश्न के कई मौके दिए हैं. 1950 के फैसले के बाद फुटबॉल देश में पिछड़ती गई और खेल प्रेमियों के दिल में खाली जगह क्रिकेट की सफलता ने भर दी.

लेकिन अब फुटबॉल में जान फूंकने की कोशिश हो रही है. सुनील छेत्री के नेतृत्व में टीम अच्छा प्रदर्शन कर रही है. भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली और सर्वकालीन महान बल्लेबाजों में शुमार सचिन तेंदुलकर भी फुटबॉल के प्रति लोगों को जागरुक कर रहे हैं. भारत की अंडर-19 और अंडर-17 फुटबॉल टीमों का जोशीला और शानदार प्रदर्शन भी सुनहरे भविष्य की नींव जरूर रख रहा है.

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