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डीडब्ल्यू अड्डा

क्यों लिव इन संबंधों को रूढ़िवादी चश्मे से देखता है समाज?

देश के चार महानगरों में शुमार कोलकाता में लिव-इन संबंधों के मामले में तस्वीर छोटे शहरों से अलग नहीं है. यह भी तब जबकि बांग्ला समाज में प्रेम विवाह को सहज ही स्वीकृति मिली हुई है.

बंगाल की गिनती प्रगतिशील राज्यों में होती है और बांग्ला साहित्य और कविताओं में प्रेम और श्रृंगार रस की भरमार है. लेकिन यह समाज भी लिव-इन संबंधों को रूढ़िवादी चश्मे से ही देखता है. मीडिया का नजरिया भी ऐसे मामलों में समाज की आम सोच से अलग नहीं है.

मधुमिता और स्वप्निल ने जब बिना शादी के एक साथ रहने का फैसला किया तो उनको इस बात का अनुमान नहीं था कि कोलकाता जैसे महानगर में भी आगे चल कर इतनी मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा. दो महीने की तलाश के बावजूद उनको कोई भी मकान देने को तैयार नहीं हुआ. सबकी दलील यही थी कि इससे मोहल्ले के बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा.

आखिर में महानगर के उपनगर न्यूटाउन इलाके में एक एनआरआई ने उनको फ्लैट किराए पर दिया. मधुमिता बताती है, "हमने यह नहीं सोचा था कि आधुनिकता के इस दौर में प्रगतिशीलता के दावों के बावजूद इस महानगर की सोच अब भी रूढ़िवादी और पारंपरिक ही है." स्वपिनल कहते हैं, "लिव-इन संबंधों पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर लगने के बावजूद समाज अब भी इसे आधुनिकता के चश्मे से देखने या ऐसे संबंधों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है." वह कहते हैं कि जब कोलकाता में यह स्थिति है तो राज्य के बाकी शहरों की स्थिति का अनुमान लगाना कोई मुश्किल नहीं है.

प्यार तक तो ठीक है लेकिन..

यह हालत तब है जबकि प्रेम संबंधों के मामले में यह राज्य काफी आधुनिक है. कविगुरू रवींद्रनाथ टैगोर के रचे रवींद्र संगीत का बांग्ला संस्कृति पर बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ा है. विभिन्न विषयों को संबोधित करने वाला रवींद्र संगीत बेहद लोकप्रिय है और बांग्ला लोकाचार के लिए एक ऐसी नींव बनाता है, जो अंग्रेजी जगत पर शेक्सपियर के प्रभाव से भी शायद ज्यादा असरदार है.

उनके अलावा दूसरे साहित्यकारों व कवियों ने भी अपनी रचनाओं में प्रेम और इसके सौंदर्य का बेहतरीन वर्णन किया है. सत्यिजत रे से लेकर तमाम बांग्ला फिल्मकारों ने भी अपनी फिल्मों में प्रेम के विविध पहलुओं का उत्कृष्ट चित्रण किया है. यहां इस बात का जिक्र करने का मकसद यह है कि कोलकाता समेत पूरे बंगाल में प्रेम को कभी कोई अछूत या अश्लील चीज नहीं समझा गया. बावजूद इसके जब लिव-इन संबंधों की बात आती है, तो पढ़ा-लिखा बुद्धिजीवी तबका भी अपनी पारंपिरक सोच के आवरण से बाहर निकलने को तैयार नहीं होता और इस मुद्दे पर नाक-भौं सिकोड़ने लगता है.

महानगर में कई ऐसे मामले भी सामने आते रहे हैं जब किराए पर मकान नहीं मिलने की मजबूरी के चलते प्रेमी युगल को पति-पत्नी होने का नाटक करना पड़ा है. या फिर उनकी समस्या मुंबई से तबादले पर यहां आए सुरेश और नीता की तरह ही हल हो सकती है. किराए पर मकान मिलने में होने वाली दिक्कतों के चलते उनको अपना फ्लैट खरीदना पड़ा. एक मकान-मालिक ने तो एक महीने बाद ही इस बात का पता चलने पर मकान खाली करा लिया था.

कब बदलेगी सोच?

लेकिन आखिर क्या वजह है कि लगातार आधुनिक होते इस समाज का रवैया लिव-इन संबंधों को ले कर आज भी सोच पुरानी है? एक कॉलेज में समाज विज्ञान पढ़ाने वाले प्रोफेसर सुदर्शन मजुमदार कहते हैं, "दरअसल, कुछ मामलों में समाज का रूढ़िवादी नजरिया अब तक नहीं बदला है. लिव-इन संबंध भी इनमें से एक है." वह कहते हैं कि लोग दरअसल अब तक इस बात को पचाने के लिए तैयार नहीं हैं कि विपरीत लिंग वाले दो वयस्क बिना शादी के भी साथ रह सकते हैं. एक महिला सामाजिक कार्यकर्ता सुनंदा गोस्वामी कहती हैं, "महानगर के पुराने इलाकों में तो शायद अगले दशक तक भी लोग इस बात को कबूल नहीं करेंगे. दरअसल यह सोच हमें अपनी पारंपरिक व पारिवारिक विरासत में मिली है. यह हमारे भीतर गहरी रची-बसी है."

समाजविज्ञानियों और लिव-इन संबंधों वाले ज्यादातर जोड़ों का कहना है कि इस मामले पर समाज की सोच में बदलाव जरूरी है. लेकिन आधुनिकता के तमाम साधन अपनाने वाला यह समाज अब भी कम से कम इस मामले में अपनी सोच बदलने को तैयार नहीं नजर आता. तब तक ऐसे जोड़ों को या तो महानगर से सटे उपनगरों, सूने छोरों या अपने निजी फ्लैट में ही रहना पड़ेगा और वह भी अपने संबंधों पर लगातार पर्दा डालने की कोशिश करते हुए.

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