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ब्लॉग

क्यों लगानी शादी के खर्चों पर बंदिशें

शादी में होने वाले भारी भरकम खर्चों पर रोक लगाने के एक बिल को खूब सुर्खियां मिल रही हैं, लेकिन क्या इससे कुछ बदलेगा? अपूर्वा अग्रवाल को इसमें संदेह है.

शादी के खर्चों पर बंदिशें लगाने वाला एक मैरिज बिल संसद के अगले सत्र में एक निजी विधेयक के रूप में पेश हो सकता है. निजी विधेयकों की किस्मत कितनी नूरानी होती है, इसका अंदाजा तो सभी को है लेकिन इसके बावजूद इस विधेयक ने खूब ध्यान बटोरा है. साथ ही, एक नई बहस को भी हवा दी है. लोकसभा में इस विधेयक का भविष्य जो भी हो, लेकिन निजी तौर पर मैं इस विधेयक के खिलाफ हूं.

मेरा सबसे बड़ा विरोध विधेयक के उस प्रावधान से हैं जिसमें कहा गया है कि शादियों का खर्च आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर सामाजिक दबाव डालता है. मुझे नहीं लगता कि किसी ने खर्चा किया है तो उससे किसी दूसरे पर सामाजिक दबाव बनता है. दरअसल सामाजिक दबाव की बुनियादी वजह है बेटी की शादी को बोझ मानना और रुपये पैसे से आदमी की हैसियत को तय करने की मानसिकता. आज की पीढ़ी जिस खुली सोच की वकालत कर रही है वहां ऐसे दबाब मायने नहीं रखते और जब बात शादी की हो तो बिल्कुल नहीं. पैसे खर्च करना और न करना किसी व्यक्ति का निजी अधिकार है. और फिर रुपये-पैसे जैसे दबावों के चलते अगर शादी जैसे रिश्ते नहीं हो पाते तो अच्छा ही है न. समस्या खर्च से नहीं बल्कि जिंदगी के हर चरण में महसूस किए जाने वाले दबाव से है. परिवार तो लव मैरिज पर भी दबाव महसूस करते हैं और शादी न करने पर भी. क्योंकि इस तरह के दबाव के कारण महज आर्थिक नहीं हैं बल्कि ये समस्या तुलनात्मक दृष्टिकोण की है जहां व्यक्ति स्वयं से पहले औरों को देखता है लेकिन आज की पीढ़ी इस अवसाद से ग्रस्त नहीं है.

इस विधेयक के मुताबिक जो परिवार शादियों पर 5 लाख से अधिक खर्च करेंगे, उन्हें 10 फीसदी हिस्सा गरीब परिवारों की बेटियों की शादी पर खर्च करना होगा. इससे क्या समाधान निकलेगा? प्रावधान जब तक सिर्फ लड़कियों की शादी को ध्यान में रखकर तय किए जाएंगे और सिर्फ लड़की के परिवार की मदद की बात की जाएगी, इनका कोई समाधान नहीं निकलेगा. दहेज मांगने वाले या शादी पर खर्च करने वाले उतने हिस्से को अतिरिक्त मानकर, शादियां तय करेंगे और समस्या जस की तस बनी रहेगी. शादियों में होने वाली सौदेबाजी आर्थिक समस्या से कहीं अधिक एक मानसिक समस्या है. 

भारतीय समाज में तो रिश्ता दो इंसानों के साथ-साथ दो परिवारों का मिलन भी माना जाता है इसलिए दो परिवार अपने इस संबंध को जैसे मनाना चाहे, उन्हें आजादी है. बेहतर होगा अगर हम उस खर्च पर कर लगाने की बात करें ताकि सरकार की आमदनी में बढ़ोतरी हो. भारत में कई ऐसे लोग हैं जिनके कारोबार ही शादियों पर टिके हैं और मोटामोटी आपका किया गया खर्च किसी के लिए आमदनी ही होगा. इसलिए मुझे इन खर्चों में तब तक कोई समस्या नहीं नजर आती जब तक इससे किसी को कोई तकलीफ नहीं पहुंच रही है. हालांकि मैं शादियों में किए जाने वाले खर्च की पैरोकार नहीं हूं न ही किसी खर्च को बढ़ावा दे रही हूं लेकिन उस सोच के खिलाफ हूं जहां आर्थिक मदद से लेकर सहानभूति की सारी बातें सिर्फ लड़की के परिवारों के लिए ही की जाती है और नाम दिया जाता है सामाजिक दबाव का. शादी करना या शादी का जश्न मनाना लड़की या लड़के की पसंद है और उन्हीं की प्राथमिक जिम्मेदारी है. हमें इसे स्वीकार करना होगा.

 

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