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विज्ञान

क्यों नहीं करती दवाएं असर

कई कई दिन तक दवा लेने के बाद भी कोई असर नहीं. वही दर्द, वही कमजोरी. डॉक्टर भी बदल लिया और दवा भी, पर बीमारी है कि पीछा ही नहीं छोड़ती. क्यों होता है ऐसा?

डॉक्टर अक्सर एंटीबायोटिक दवा लेने की सलाह देते हैं. और इस बात पर भी जोर देते हैं कि दवा का कोर्स पूरा किया जाए. कोई दवा तीन दिन, कोई पांच तो कोई सात दिन लेनी होती है. अगर कभी दवा लेना भूल जाएं, तो कोर्स फिर से शुरू करना पड़ता है.

दरअसल एंटीबायोटिक वो दवा होती हैं जो शरीर में मौजूद बैक्टीरिया पर असर करती हैं. इनसे या तो बैक्टीरिया मर जाते हैं या उनकी संख्या वहीं रुक जाती है. यहां ध्यान देने वाली बात है कि एंटीबायोटिक केवल बैक्टीरिया पर ही असर करते हैं. यानि अगर आपको वायरल इंफेक्शन है तो इनसे कोई फायदा नहीं मिलेगा.

कैसे होता है असर?

कुछ एंटीबायोटिक दवाएं प्राकृतिक चीजों से बनी हैं, तो कुछ ऐसी हैं जिनमें रसायनों का इस्तेमाल किया गया है. मिसाल के तौर पर पेनिसिलिन में फफूंद की एक किस्म का इस्तेमाल किया जाता है. यह फफूंद बैक्टीरिया पर हमला करती है और उसकी कोशिका को जालीदार बना देती है. ऐसा करने से बैक्टीरिया का पूरा ढांचा गड़बड़ा जाता है और वह धीरे धीरे दम तोड़ देता है.

कुछ अन्य रसायन शरीर में बैक्टीरिया के लिए जरूरी प्रोटीन का बनना ही बंद कर देते हैं. या फिर बैक्टीरिया की कोशिका में खाने का जाना रोक देते हैं, जिससे वे ज्यादा देर जीवित नहीं रह पाते. कुछ अन्य रसायन ऐसे हैं जो बैक्टीरिया को नुकसान नहीं पहुंचाते, पर इस बात को सुनिश्चित करते हैं कि उनकी संख्या ना बढ़े. अपनी आयु पूरी होने पर बैक्टीरिया खुदबखुद ही खत्म हो जाते हैं.

वीडियो देखें 03:13

क्या है एंटीबायोटिक?

बेअसर होती दवा

लेकिन मरने से पहले बैक्टीरिया खुद को बचाने के लिए पूरी जान लगा देते हैं. वे अपनी प्रतिरोधक क्षमता को कुछ इस तरह विकसित कर लेते हैं कि दवा का असर होना बंद हो जाता है. जीन के ढांचे में बदलाव कर के वे नए तरह के प्रोटीन बनाने लगते हैं. यहां तक कि उनमें इतनी क्षमता होती है कि वे कोशिका की दीवार की मरम्मत कर लें और दीवार के चारों ओर एक ऐसा सुरक्षा कवच बना लें कि दवा उनमें प्रवेश ही ना कर सके.

बैक्टीरिया पहचानने लगते हैं कि दवा उनके किस हिस्से पर हमला कर रही है. ऐसे में वे उस प्रोटीन का बनना रोक देते हैं और नए प्रोटीन बना कर खुद को जीवित रखने में कामयाब होते हैं. बैक्टीरिया में इतनी क्षमता होती है कि एक दूसरे के संपर्क में आ कर, वे दूसरे आनुवांशिक ढांचे की नकल कर लें. इसके बाद उनकी अगली सभी पीढ़ियां इस नए ढांचे के अनुरूप काम करती हैं. यही वजह है कि दवा इन पर कोई असर नहीं कर पाती.

ठीक से लें दवा

एमआरसीए इसी तरह का एक बैक्टीरिया है जिसने खुद को दवा के अनुरूप ढाल लिया है. यह बैक्टीरिया हर साल जर्मनी में 5,000 लोगों की जान लेता है. बैक्टीरिया ऐसी प्रतिरोधक क्षमता ना बना सकें इसके लिए जरूरी है कि एंटीबायोटिक तभी लिए जाएं जब उनकी बहुत ज्यादा जरूरत हो. कई लोग थोड़ी बहुत तकलीफ होने पर भी एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन करने लगते हैं. डॉक्टरों का कहना है कि यह गलत है. बार बार दवा लेने से बैक्टीरिया को उसकी आदत पड़ जाती है और दवा काम करना बंद कर देती है. साथ ही जब दवा ले रहे हों, तो थोड़ा बेहतर महसूस होने पर कोर्स को कभी बीच में ना छोड़ें. क्योंकि उसका भी वही नतीजा होगा.

रिसर्चर तो वक्त के साथ साथ नई किस्म की एंटीबायोटिक दवाएं बनाते रहेंगे. लेकिन इसके बावजूद उनकी सलाह है कि दवा बदलने की जगह उसे ठीक से लेने पर ध्यान दें और स्वस्थ रहें.

रिपोर्ट: ब्रिगिटे ओस्टेराथ/ईशा भाटिया

संपादन: महेश झा

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