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दुनिया

क्यों चीनी भाषा के दीवाने हो गए हैं पाकिस्तानी

पाकिस्तान में युवाओं में इन दिनों चीनी भाषा सीखने की होड़ लगी है. युवा नौकरियों की उम्मीद में हैं, तो विश्लेषक इसे पाकिस्तान की गुलामी बता रहे हैं

साल 2015 में चाइना पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर यानि सीपीईसी की घोषणा हुई. इसके बाद से पाकिस्तान में चीनी भाषा सीखने वाले लोगों की संख्या में इजाफा हुआ है. इस्लामाबाद की नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ मॉडर्न लैंगुएजेज (एनयूएमएल) में भाषा सिखाने वाले मिसबाख रशीद का कहना है कि सीपीईसी से पहले यूनिवर्सिटी में करीब 200 छात्र चीनी भाषा सीख रहे थे लेकिन इसके बाद से यह संख्या 2,000 को भी पार कर गयी है. ज्यादातर युवा मंडारिन सीखना चाहते हैं. डॉयचे वेले से बातचीत में रशीद ने बताया कि 70 के दशक में यूनिवर्सिटी में चीनी विभाग इसलिए खोला गया ताकि सेना के अधिकारियों को चीनी संस्कृति के बारे में सिखाया जा सके. बाद में इसे आम नागरिकों के लिए भी खोल दिया गया. लेकिन पिछले दो सालों में जिस तरह से यहां भीड़ देखी गयी है, ऐसा अब तक कभी नहीं हुआ था.

नौकरियां ही नौकरियां

सीपीईसी 46 अरब डॉलर का प्रोजेक्ट है जिसके तहत चीन पाकिस्तान में अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है. इस प्रोजेक्ट के तहत नयी सड़कों, रेल लाइनों और तेल की पाइपलाइनों का निर्माण भी होना है, जो चीन को मध्य पूर्व से बेहतर रूप से जोड़ सकेगा. पाकिस्तान को इससे नयी नौकरियों की उम्मीद है. ऐसे में युवा नौकरियों की उम्मीद में भाषा सीख रहे हैं. मांग इतनी है कि कई प्राइवेट इंस्टीट्यूट भी भाषा सिखा रहे हैं. इस्लामाबाद स्थित कंफ्यूशियस इंस्टीट्यूट के मैनेजर मुहम्मद हसीब बताते हैं कि वे चीनी अधिकारियों के साथ मिल कर कोर्स तैयार करते हैं. इस्लामाबाद के अलावा उनके इंस्टीट्यूट लाहौर, कराची और फैसलाबाद जैसे शहरों में भी मौजूद हैं. पिछले सालों में वे एक हजार से ज्यादा युवाओं को स्कॉलरशिप भी दिलवा चुके हैं. हसीब कहते हैं, "इस प्रोजेक्ट से चीन और पाकिस्तान के बीच दूरी कम हो जाएगी. हमारे स्टूडेंट्स को ट्रांसलेटर और इंटरप्रेटर के तौर पर नौकरियां मिल सकेंगी."

चीन की गुलामी

जहां एक तरफ युवाओं में नयी नौकरियों का उत्साह है, वहीं दूसरी ओर इस प्रोजेक्ट का विरोध भी हो रहा है. डेवलपमेंट एनेलिस्ट मकसूद अहमद जान का कहना है कि पाकिस्तान ने 46 अरब डॉलर में खुद को चीन के हाथों बेच दिया है. उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि चीन मुफ्त में हमें पैसा नहीं दे रहा है. पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था इतनी बड़ी नहीं है, इसलिए चीन अब हमारे आय उत्पन्न करने वाले क्षेत्रों पर कब्जा कर लेना चाहता है."

कई आलोचक इसे "सांस्कृतिक उपनिवेश" के तौर पर भी देख रहे हैं. कल्चरल एनेलिस्ट मीर मुहम्मद अली तालपुर ने डॉयचे वेले से बातचीत में कहा, "यह सच है कि नयी भाषा सीखने से आपका दायरा बढ़ता है लेकिन चीन आर्थिक प्रोजेक्ट के जरिये अपनी संस्कृति को भी हमारे ऊपर थोप रहा है." तालपुर का मानना है कि इससे पाकिस्तान की संस्कृति और भाषा को भारी नुकसान हो सकता है.

इसी तरह बलूचिस्तान असेंबली के पूर्व स्पीकर अकरम दश्ती का कहना है कि चीन पाकिस्तान को गुलाम बनाने की कोशिश कर रहा है, "पहले अपनी संस्कृति सिखाओ, फिर अपनी भाषा और फिर व्यापार और वाणिज्य संबंधी गतिविधियों को बढ़ा कर अर्थव्यवस्था पर कब्जा कर लो." दश्ती का मानना है कि चीन की नजर पाकिस्तान के उन प्राकृतिक संसाधनों पर है, जिनका अब तक खुद पाकिस्तान ने ही लाभ नहीं उठाया है.

शाह मीर बलोच/आईबी

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