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दुनिया

क्यों गोली नहीं चलाती जर्मन पुलिस

अमेरिका में एक 12 साल के बच्चे की पुलिस की गोली लगने के कारण जान चली गयी है. माइकल ब्राउन के मामले के बाद एक बार फिर पुलिस के रवैये और ट्रेनिंग पर सवाल उठ रहे हैं.

जर्मन पुलिस अधिकारी आम तौर पर अपने हथियारों का इस्तेमाल नहीं करते. लेकिन जब कभी भी उनकी गोलियां चलती हैं तो उनका शिकार होने वाले समाज के कमजोर वर्ग के लोग होते हैं. इसकी वजह बताते हुए जर्मनी के दक्षिणी प्रांत बवेरिया के पुलिस ट्रेनिंग प्रमुख गैर्ड एंकलिंग कहते हैं, "पुलिस बल को ऐसी परिस्थितियों में बुलाया जाता है जिनका वे सही आकलन नहीं कर सकते और इन परिस्थितियों में लोगों में टनल विजन होता है यानि उनकी क्षमता सीमित होती है." छोटी छोटी बातें इन परिस्थितियों में घटनाओं को प्रभावित करती हैं. मसलन कोई राहगीर तो वहां से नहीं गुजर रहा है, मौसम कैसा है, अधिकारियों पर चिल्लाया तो नहीं जा रहा, उन्हें हड़बड़ी में तो घटनास्थल पर नहीं भेजा गया है, या क्या वे दूरी बनाए रख रहे हैं. एंकलिंग बताते हैं, "ये अत्यंत जटिल परिस्थितियां हैं."

माइकल ब्राउन का मामला

अमेरिका में ऐसी स्थितियों का अंत घातक होता है. अगस्त के शुरू में एक श्वेत पुलिस अधिकारी ने एक अश्वेत टीनएजर माइकल ब्राउन को गोली मार मार दी थी. अमेरिका में हर साल पुलिस की गोली से कई सौ लोग मारे जाते हैं और उनमें से सभी हथियारों से लैस नहीं होते. यह सिर्फ एक अनुमान है, सही आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. यह जर्मनी से बिल्कुल अलग है, जहां पुलिसकर्मी शायद ही बंदूक का इस्तेमाल करते हैं.पिछले दो सालों में जर्मनी में पुलिस की गोली से 8 लोग मरे हैं जबकि 1998 से सरकारी हथियारों से 109 जानें गई हैं. अमेरिका के विपरीत जर्मन पुलिस अधिकारियों का सामना कभी कभार ही हथियारबंद लोगों से होता है.

यह अमेरिका और जर्मनी में होने वाली मौतों में भारी अंतर का एक कारण हो सकता है, लेकिन प्रेक्षकों का कहना है कि जर्मन पुलिस अधिकारी हथियार के इस्तेमाल के मामले में बहुत चौकन्ने भी होते हैं. बर्लिन के नागरिक अधिकार और सुरक्षा संस्थान के ऑटो डिडरिक्सेन कहते हैं कि 1970 के दशक से लोगों पर पुलिस द्वारा गोली चलाने की घटनाओं में लगातार कमी आई है, "इस मामले में बहुत कुछ हुआ है और यह निश्चित तौर पर सकारात्मक है."

तनाव का असर

जर्मनी के सबसे ज्यादा आबादी वाले प्रांत नॉर्थ राइन वेस्टफेलिया में पुलिस को दी जाने वाली हथियारों की ट्रेनिंग के कोर्स का नाम ही है 'डोंट शूट'. यह कोर्स का सिर्फ नाम ही नहीं है, बल्कि ट्रेनिंग स्कूल का मुख्य लक्ष्य भी है. सबसे पहले रंगरूटों को बंदूक चलाना सिखाया जाता है. इस पुलिस ट्रेनिंग के ऑपरेटिव सेक्शन के प्रमुख ऊवे थीमे कहते हैं, "आपको पता होना चाहुए कि इसे कैसे हैंडल करना है. यह खिलौना नहीं है, इससे जान को खतरा हो सकता है." उनका कहना है कि निशाना लगाना सीखने के बाद ट्रेनी पुलिस अधिकारी तनावपूर्ण स्थिति का सामना करना सीखते हैं.

पुलिस ट्रेनिंग का बड़ा हिस्सा रोल गेम्स का होता है जिसके लिए जर्मनी के सभा 16 प्रांतों में तीन साल का समय होता है. एंकलिंग कहते हैं, "यदि तनाव की स्थिति में टनल विजन हो जाए तो हम टेस्ट की हुई रणनीति का सहारा लेते हैं, सभी यही करते हैं." यदि पुलिस अधिकारी ने बार बार तुरंत प्रतिक्रिया न दिखाने और पहले स्थिति पर नियंत्रण की ट्रेनिंग की है, जैसे संदिग्ध के साथ आराम से बात करने की, तो उसके लिए जरूरत पड़ने पर इस प्रक्रिया को दुहराने की अच्छी संभावना होती है.

कौन हैं मारे गए लोग

चीजें अक्सर हाथ से निकल जाती हैं और पिछले सालों की घातक घटनाएं किसी भी तरह से बचने लायक नहीं थीं. बोखुम के रुअर यूनिवर्सिटी के अपराध विशेषज्ञ थॉमस फेल्टेस बर्लिन में हुए एक मामले की ओर ध्यान दिलाते हैं. पुलिस ने सिटी हॉल के सामने नंगे खड़े एक आदमी को गोली मार दी जिसके हाथ में छूरा था. वह व्यक्ति शिजोफ्रेनिया का शिकार था. बर्लिन के आरबीबी टेलिविजन चैनल के अनुसार पिछले पांच सालों में पुलिस द्वारा मारे गए लोगों में दो तिहाई या तो मानसिक रूप से बीमार थे या पुलिस को उनके मनोरोग के बारे में जानकारी नहीं थी. फेल्टेस कहते हैं, "बहुत से अधिकारियों को पता नहीं होता कि वे मानसिक रूप से बीमार लोगों के साथ डील कर रहे हैं."

फेल्टेस के अनुसार उन्हें और ज्यादा ट्रेनिंग की जरूरत है. इस पर भी विचार किया जाना चाहिए कि क्या पुलिसकर्मियों को इलेक्ट्रो शॉक देने वाले टेजर गनों का इस्तेमाल करना चाहिए. जर्मन कानून के अनुसार जब भी कोई पुलिसकर्मी किसी इंसान या किसी चीज पर गोली चलाता है तो अभियोक्ता कार्यालय तुरंत उस मामले की आरंभिक जांच शुरू कर देता है. लेकिन अक्सर शुरुआती जांच के बाद मामलों को बंद कर दिया जाता है, जैसा बर्लिन वाले मामले में हुआ. फेल्टेस कहते हैं कि अभियोक्ता कार्यालय को इन मामलों की गहराई से जांच करनी चाहिए.

रिपोर्ट: डेनिस श्टूटे/एमजे

संपादन: ईशा भाटिया

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