क्यों गलत हो जाती हैं भविष्यवाणियां | विज्ञान | DW | 28.10.2017
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विज्ञान

क्यों गलत हो जाती हैं भविष्यवाणियां

भविष्य में क्या होगा, इस बात को जानने की जिज्ञासा हम सबके अंदर होती है, लेकिन कुछ भविष्यवाणियां सही साबित होती है तो कुछ गलत निकलती हैं, आखिर क्यों?

मौसम के पूर्वानुमान से लेकर से लेकर चुनावी मुकाबलों तक, अकसर हमारा वास्ता कई तरह की भविष्यवाणियों से पड़ता है. अहम फुटबॉल मुकाबलों से पहले ऑक्टोपस, हाथी और उदबिलाव जैसे जानवरों की भविष्यवाणियों की खबरें भी आपने सुनी होंगी. भारत में तो सड़कों पर भी भविष्य बाचने वाले मिल जाते हैं.

भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है, इसका सही सही अंदाजा लगाना तो मुश्किल है. लेकिन कुछ नियमों और विश्लेषणों के आधार भविष्य को लेकर कुछ अनुमान तो लगाये ही जा सकते हैं. फ्रांसीसी खलोगशास्त्री अलेक्सिस बुवार्ड के समय में नेप्चून ग्रह अदृश्य था, लेकिन उन्होंने 1821 में अंदाजा लगा लिया कि युरेनस यानी वरुण ग्रह के निकट एक और ग्रह होना चाहिए. 25 साल बाद नेप्चून की खोज के साथ बुवार्ड का अंदाजा सही साबित हुआ.

इसी तरह 1870 में रूस के रसायनशास्त्री दिमित्री मेंदेलेयेव ने पिरियोडिक टेबल बनाया. उस समय तक सारे रासायनिक तत्वों की खोज नहीं हुई थी. टेबल में जहां कोई तत्व फिट नहीं बैठता था मेंदेलेयेव उसे खाली छोड़ देते थे. उनका कहना था कि इन जगहों को कभी न कभी भर दिया जायेगा. और ऐसा ही हुआ.

ऐसी भविष्यवाणियां करना संभव है क्योंकि प्राकृतिक विज्ञान नियमों पर आधारित है. लेकिन सामाजिक और आर्थिक विषयों पर भविष्यवाणियां हमेशा जोखिम भरा काम रही हैं. अर्थशास्त्री प्रोफेसर थॉमस बावर आर्थिक विकास और आबादी के विकास का आकलन करते हैं यानि उसकी भविष्यवाणी करते हैं. वह कहते हैं, "यदि मैं एक ऐसे समय में भविष्यवाणी करना चाहूं जो मेरे काफी करीब है तो मेरे पास बहुत सी सूचनाएं होती हैं जिनके आधार पर मैं अच्छी भविष्यवाणी कर सकता हूं. लेकिन वह समय बहुत दूर भविष्य में हो तो मैं संभवतः बहुत ही गलत आकलन करूंगा." प्रोफेसर बावर कहते हैं कि भविष्यवाणियों के चलते लोगों के व्यवहार में परिवर्तन होता है, जो भविष्यवाणियों को गलत कर देते हैं.

थिंकटैंक क्लब ऑफ रोम ने 1972 में कहा था कि 2000 तक दुनिया के संसाधन खत्म हो जायेंगे. उसके बाद तेल, गैस और कोयला खत्म हो जाना चाहिए था. लेकिन हम आज भी इनका इस्तेमाल कर रहे हैं. इसी तरह ब्रेक्जिट के लिए मतदान खत्म होने के कुछ पहले तक सर्वे संस्थायें ब्रिटेन के यूरोपीय संघ में रहने की भविष्यवाणी कर रही थीं. लेकिन नतीजा इसका उल्टा निकला.


दरअसल आर्थिक और सामाजिक भविष्यवाणियां इसलिए भी पक्की नहीं होती कि उसके पीछे बहुत से कारक होते हैं. प्रो. थॉमस बावर बताते हैं, "स्वाभाविक रूप से भविष्यवाणी तब गलत हो जाती है जब कोई अप्रत्याशित घटना घट जाये. अमेरिका में रियल इस्टेट बुलबुले का फूटना, कोई प्राकृतिक आपदा, महत्वपूर्ण कारोबारी देश में राजनीतिक उथल पुथल. ये सारी घटनाएं भविष्यवाणियों को गलत कर सकती हैं."

फिर भी हमें भविष्यवाणियों का हमेशा इंतजार रहता है. ऐसा क्यों है? प्रो. बावर कहते हैं, "हमें भविष्यवाणियों की जरूरत है ताकि भविष्य के बारे थोड़ा अनुमान हो सके, योजनाओं के लिए सुरक्षा हो सके. ताकि योजनायें बनायी जा सकें."

दूसरी तरफ, जलवायु परिवर्तन से हमारे जीवन पर पड़े वाले प्रभावों को लेकर लगातार चेतावनी दी जा रही हैं, लेकिन इनके चलते अब तक हमारे व्यवहार में कोई खास बदलाव नहीं आया है. इसकी वजह यह है कि हम कल्पना ही नहीं करते हैं कि हमारी पूरी जिंदगी और दुनिया एकदम से बदल जाएगी. दूसरा, हमें उम्मीद रहती है कि ये भविष्यवाणी भी दूसरी भविष्यवाणियों की तरह 100 फीसदी सच नहीं साबित होगी. और जिंदगी इसी उम्मीद पर चल रही है.

रिपोर्ट: कोरा रिष्टर

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