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मंथन

क्यों इतना खतरनाक है इबोला

दुनिया की अधिकतर जैव विविधता तो आंखों को दिखाई ही नहीं देती क्योंकि वह बहुत ही सूक्ष्म होती है और आंखों से नहीं देखी जा सकती. ठीक इबोला के वायरस की तरह.

फलाहारी चमगादड़ यानि फ्रूट बैट से फैलने वाली इस बीमारी से वैसे कोई दो चार नहीं होना चाहेगा और न ही इसके वायरस से. लेकिन एम्सटरडम में लोग ऐसा कर रहे हैं और इसके लिए 14 यूरो भी दे रहे हैं. इबोला वायरस के मॉडल के साथ वह एक ग्लास कैबिन में बंद कर दिए जाते हैं. इबोला वायरस का यह मॉडल कांच से बनाया गया है. एम्सटरडम में जू फॉर माइक्रोब्स नाम की दुनिया की पहली इमारत है जहां सूक्ष्म जीवाणुओं के बारे में पूरी जानकारी है.

पश्चिम अफ्रीका में इबोला महामारी के कारण फैली अफरातफरी निश्चित ही लोगों को इस माइक्रोपिया म्यूजियम में खींचेगी. इस संग्रहालय की कोशिश है कि लोगों को समझाया जाए और बताया जाए कि जीवाणुओं की दुनिया कैसी होती है. और कि ये जीवाणु और कीटाणु जैव विविधता का एक छोटा सा हिस्सा नहीं बल्कि काफी बड़ा हिस्सा हैं. माइक्रोब या जीवाणु हमारे शरीर पर और हमारे अंदर सब जगह रहते हैं. अधिकतर इनसे हमें फायदा होता है और ये हमारा लाभ उठाते हैं. आंत में पाए जाने वाले जीवाणु हमारा खाना मिनटों में पचा देते हैं. अगर इनमें गड़बड़ हो जाए तो आप सोच सकते हैं कि क्या परेशानी पैदा हो सकती है. हालांकि इबोला इन फायदेमंद जीवाणुओं में शामिल नहीं है.

खतरनाक और जानलेवा

ये वायरस इंसान के लिए खतरा इसलिए है क्योंकि इंसानी शरीर तेजी से इसे स्वीकार नहीं कर पाता. माइक्रोपिया में वरिष्ठ बायोलॉजिस्ट जैस्पर बुइक्स बताते हैं, "अगर वायरस जानवरों में हजारों साल से हो तो जानवरों को इसके हिसाब से ढलना ही पड़ेगा. लेकिन यह तभी काम करता है जब प्राणी आनुवंशिक तौर पर बिलकुल अलग अलग तरह के हों. अगर जानवर और पेड़ पौधों के जीन्स बहुत एक जैसे हों तो संवर्धित वायरस पूरी प्रजाति को खत्म कर देगा क्योंकि जीन्स में ऐसी विविधता ही मौजूद नहीं है जो प्रतिरोधी हो." वैसे तो इबोला का वायरस प्रोटीन कवच में बंद एक डीएनए ही है लेकिन वह जानवरों में क्रमिक विकास के दौरान विकसित होता रहा है और बढ़ता रहा है.

इस तरह सोचा जाए तो वायरस जैव विविधता के दुश्मन नहीं हैं बल्कि वह नष्ट करके चुनाव करते हैं. होस्ट और पैथोजन के साथ साथ बढ़ने को इवॉल्यूशन कहा जाता है. यही कारण है कि सर्दी जुकाम जैसी बीमारियों के वायरस से इंसान की मौत नहीं होती. और इबोला वायरस का प्राकृतिक घर माने जाने वाले फलाहारी चमगादड़ों की भी इससे मौत नहीं होती. पर फिर इंसान क्यों मारा जा रहा है?

वैश्वीकरण बड़ा कारण

अफ्रीका के हिस्सों में इबोला वायरस लंबे समय से है लेकिन अधिकतर इंसानी बस्तियों से दूर रहा है. विरल इलाकों में कभी किसी संक्रमित जानवर को खाने से इंसान को बीमारी हो भी जाती तो वह फैलती नहीं. स्विट्जरलैंड में उष्णकटिबंधीय और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर काम करने वाले संस्थान के निदेशक मार्सेल टानेर का कहना है कि वैश्वीकरण ने समीकरण बदल दिए हैं, "2013 के अंत में शायद एक ही व्यक्ति इससे संक्रमित हुआ. लेकिन तेज शहरीकरण और तेज यात्रा के कारण इंसान ज्यादा से ज्यादा हिस्सों में पहुंचने से बीमारी के तेजी से फैलने की आशंका बढ़ी. वायरस तेजी से लोगों के संपर्क में आया. इतना ही नहीं स्थानीय स्वास्थ्य सेवा के कमजोर होने के कारण भी आप देख सकते हैं कि बीमारी कितनी तेजी से फैली."

टानेर ने बताया कि जंगलों में चमगादड़ों में कई तरह के वायरस होते हैं जो उन्हें तो नुकसान नहीं पहुंचाते लेकिन इंसान के लिए खतरा पैदा करते हैं. टानेर के मुताबिक, "चमगादड़ आनुवांशिक तौर पर पुरानी प्रजाति है. क्रमिक विकास के दौरान उनके पास कई तरह के वायरस से बचने के लिए खुद को ढालने का काफी समय था. और हो सकता है कि इसी क्रम में कभी इंसान भी खुद को इबोला वायरस के अनुकूल बना ले."

वैसे भी जंगलों के खत्म होने के कारण जानवरों और इंसानों के बीच की दूरी कम हुई है और संपर्क बढ़ा है. हो सकता है कि लंबे समय में विश्व की जैव विविधता पर इंसान का असर कई प्रजातियों के खात्मे का कारण बन सकता है. माइक्रोपिया के जास्पर बुइक्स कहते हैं, "जानवरों के रहने की जगहें कम होने के कारण प्रजातियों की आनुवांशिक विविधता कम होगी और इसलिए वायरस या बैक्टीरिया से होने वाली बीमारियां उन्हें जल्दी खत्म करेंगी."

इबोला के कारण अफ्रीका में बंदरों की संख्या कम हो चुकी है. अलग थलग पड़ी प्रजातियां जो विलुप्ति के कगार पर हैं, उनके लिए इबोला ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता है.

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