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दुनिया

क्या हो रहा है 'स्पेशल इकोनॉमिक जोन' की जमीनों का?

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एसईजेड यानी 'स्पेशल इकोनॉमिक जोन' के अंतर्गत ली गई जमीनों के बारे में देश के सात राज्यों से सवाल किया है. सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि उद्योग बसाने के लिए खरीदी गई जमीन बेकार क्यों पड़ी है.

सुप्रीम कोर्ट ने 'स्पेशल इकोनॉमिक जोन' के फायदे पर उठते सवालों और लोगों की जमीन हड़पे जाने के विवादों के बीच भारत के सात राज्यों से पूछा है कि उन्होंने एसईजेड वाली जमीनें खाली क्यों छोड़ी हुई हैं. सेज का प्रोजेक्ट भारत में शुरू से ही विवादों में घिरा रहा है. चीन की मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री की सफलता को देख, उसी की तर्ज पर भारत में भी साल 2005 में एसईजेड कानून बनाया गया. निर्माण के क्षेत्र में आगे बढ़ने के अलावा ऐसे स्पेशल जोन स्थापित करने का दूसरा प्रमुख मकसद देश की तेजी से बढ़ती आबादी के लिए रोजगार के अवसर पैदा करना था. एसईजेड एक्ट 2005 के तहत ऐसे सैकड़ों प्रोजेक्ट्स को मंजूरी मिली. लेकिन एक दशक से भी अधिक समय बीत जाने के बाद आज उनके नतीजों पर उंगलियां उठ रही हैं.

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने सात राज्यों को नोटिस भेजा है और उन्हें जवाब देने के लिए एक महीने का समय दिया है. कोर्ट ने यह कदम एक एडवोकेसी ग्रुप की याचिका पर कार्रवाई करते हुए उठाया. याचिकाकर्ता समूह ने लिखा है कि पिछले पांच सालों के दौरान एसईजेड के नाम पर खरीदी गई 80 फीसदी जमीन खाली पड़ी है. उन्होंने इनमें से अधिकतर को खेती योग्य भूमि बताया है. भारत के मुख्य न्यायाधीश जेएस खेहर की अगुआई वाली बेंच ने इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा, "हमने याचिकाकर्ता की प्रार्थना पर सात राज्यों को नोटिस भेजा है."

हाल के सालों में टैक्स रियायतें देकर कंपनियों को 'स्पेशल इकोनॉमिक जोन' में लाए जाने का चलन दुनिया भर में चला है. लेकिन वर्ल्ड बैंक का कहना है कि ऐसे क्षेत्रों की स्थापना के कारण निर्यात से आय बढ़ाने या आर्थिक विकास को और आगे ले जाने के मामले में मिली जुली सफलता ही मिली है.

भारत में पिछले पांच सालों में ही करीब पांच हजार हेक्टेयर (12,355 एकड़) भूमि को एसईजेड के लिए अभिगृहीत किया गया है. इसमें से केवल 362 हेक्टेयर का ही उसके तय प्रयोजन के लिए इस्तेमाल किया गया. ये आंकड़े एसईजेड फार्मर्स प्रोटेक्शन वेलफेयर एसोसिएशन ने कोर्ट में दाखिल अपनी याचिका में दिए हैं. इस समूह को अदालत में पेश कर रहे उनके वकील कॉलिन गोन्साल्वेस कहते हैं, "कई किसान अपनी जमीन के छिन जाने के कारण बेहाल हो गए." वे आगे बताते हैं कि ना केवल उन्होंने अपनी जमीन खोयी, बल्कि उसके बदले में उन्हें कोई दूसरा काम भी नहीं मिला. कारण ये रहा कि जिस इंडस्ट्री के वहां लगाए जाने की योजना थी वो तो लगी ही नहीं.

गोन्साल्वेस ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने उद्योग मंत्रालय को भी इस बाबत नोटिस भेजा है. इस पर प्रतिक्रिया देते हुए उद्योग मंत्रालय के एक निदेशक टीवी रवि ने कहा, "जब हमें नोटिस मिलेगा, तब हम उसका जवाब दे देंगे." रवि ने बताया, "मंत्रालय अभी नीतियों में बदलाव करने पर कोई विचार नहीं कर रहा है. अगर निवेशक नहीं आते हैं, तो शायद हम इस पर पुनर्विचार करें." भूमि अधिकार कार्यकर्ताओं की मांग है कि अगर 'स्पेशल इकोनॉमिक जोन' में उद्योग धंधे ना चलें और विस्थापित लोगों को नौकरियां ना मिलें, तो फिर उनकी जमीनें वापस कर दी जानी चाहिए.

भारत सरकार के ऑडिटर्स की 2013 की एक रिपोर्ट दिखाती है कि एसईजेड वाली केवल 62 फीसदी जमीन ही उसके तय प्रयोजन के लिए इस्तेमाल हो रही है. और उनसे भी जितनी नौकरियां पैदा होने की उम्मीद थी, उसका केवल आठ फीसदी ही पैदा हुई हैं. रिपोर्ट में बताया गया कि कई एसईजेड की जमीनों को 'डिनोटिफाई' कराके ऊंची कीमतों पर प्राइवेट डिवेलपर्स को बेच दिया गया है.

आरपी/वीके (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन)

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