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दुनिया

क्या है जर्मनी में दक्षिणपंथ और वामपंथ के मायने...

क्या जर्मन लोगों के लिए भी दक्षिणपंथ और वामपंथ के वही मायने हैं जो अमेरिका जैसे देशों के लिये हैं. ये चुनाव वामपंथ और दक्षिणपंथ जैसे शब्दों में भी बदलाव के संकेत दे रहे हैं.

पुरानी आदतें मुश्किल से ही जाती हैं. वॉशिंगटन पोस्ट समेत तमाम अखबारों की मानें तो सितंबर में होने वाले जर्मन चुनावों में चांसलर पद के लिए एसपीडी की ओर से मार्टिन शुल्त्स की उम्मीदवारी फिर से वामपंथ के उभार के संकेत दे रही है. वहीं एएफडी को दुनिया भर में बढ़ती धुर दक्षिणपंथी प्रवृत्ति का हिस्सा माना जा रहा है.

चुनावी सर्वे बताते हैं कि जर्मन आम चुनावों के बाद नयी संसद में जिन छह पार्टियों को प्रतिनिधित्व मिलेगा, उनमें क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टी (सीडीयू)-क्रिश्चियन सोशल यूनियन (सीएसयू), सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (एसपीडी), वामपंथी पार्टी (डी लिंके), ग्रीन पार्टी, अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (एएफडी) और फ्री डेमोक्रेटिक पार्टी (एफडीपी) शामिल हैं. यह देखना दिलचस्प होगा कि इस सियासी माहौल में दक्षिणपंथियों और वामपंथियों का तालमेल कितना सहज होगा.

सन 1789 में फ्रांसीसी क्रांति के दौरान उपजे इन शब्दों का अर्थ हर दौर और हर संस्कृति में बदलता रहा है और वर्तमान में ये एक अहम बदलाव से गुजरते नजर आ रहे हैं. इस बदलाव के दो अहम कारण माने जा सकते हैं. पहला जर्मनी की चांसलर अंगेला मैर्केल का सोशल डेमोक्रेटिक नीतियों की ओर झुकाव और दूसरा अमेरिका समेत दुनिया भर में पॉपुलिज्म यानी लोकलुभावन राष्ट्रवाद का उफान. 

राष्ट्रवाद और नाटो

पारंपरिक रूप से रूढ़िवादी सीडीयू-सीएसयू, ये दोनों ही मुख्य धारा की सबसे राष्ट्रवादी पार्टियां रही हैं. वे नाटो के साथ सघन संबंधों की समर्थक रही हैं. लंबे समय तक रुढ़िवादी इस बात को खारिज करते रहे कि जर्मनी प्रवासियों को अपनी तरफ आकर्षित करे या फिर यहां के समाज में उनका एकीकरण करे. लेकिन मैर्केल की वजह से चीजें बदलीं. मैर्केल के नेतृत्व में न केवल रूढ़िवादियों ने शरणार्थियों के प्रति स्वागत का रुख अपनाया बल्कि आप्रवासन जैसे मसलों को जर्मनी के भविष्य के साथ भी जोड़ कर देखा. हालांकि अब भी एक बड़ा तबका दोहरी नागरिकता जैसे विषयों का विरोध करता है. लेकिन शरणार्थियों के प्रति मैर्केल की नरम नीति ने पॉपुलिस्ट पार्टी एएफडी को उभरने के लिए राजनीतिक जमीन दी. यह पार्टी न केवल शरणार्थियों के खिलाफ है, बल्कि यह आम तौर पर आप्रवासन के भी खिलाफ है. इस पार्टी का नारा है, "जर्मनी जर्मन लोगों के लिए है". इसके नेता अकसर नस्ली भाषा भी प्रयोग करते हैं.

ट्रंप ने जब अमेरिका के लिए नाटो के महत्व पर सवाल उठाये तो एसपीडी और ग्रीन पार्टी ने पारंपरिक वाम रुख के विपरीत रूढ़िवादियों का साथ दिया. लेफ्ट पार्टी कम्युनिस्ट पूर्वी जर्मनी की सत्ताधारी सोशलिस्ट यूनिटी पार्टी से निकली है. वह नाटो विरोधी और रूस समर्थक है. वहीं एसपीडी और ग्रीन पार्टी व्लादिमीर पुतिन की कटु आलोचक हैं.

उग्र दक्षिणपंथी एएफडी नाटो को महज एक रक्षा गठबंधन तक सीमित करने और विदेशों में तैनात जर्मन सैनिकों को वापस बुलाने के पक्ष में है. ट्रंप की ही तरह, एएफडी के पास भी पुतिन के लिए बहुत समय है. यह पार्टी रूस से जर्मनी का "दोस्त" बनने को कहती है. अमेरिकी सर्वे बताते हैं कि एएफडी जर्मनी में बसे रूसी मूल के लोगों में खासी लोकप्रिय है जिन्हें अकसर "रूसी जर्मन" कहा जाता है.

यूरोपीय संघ और कारोबारी साझेदारी

यूरोपीय संघ के मुद्दे पर सिर्फ दक्षिणपंथियों और वामपंथियों के बीच ही मतभेद नहीं है बल्कि इस बारे में वामपंथियों और धुर दक्षिणपंथियों की राय भी एक दूसरे से नहीं मिलती. जहां रूढ़िवादी यानी सीडीयू-सीएसयू, एसपीडी, ग्रीन और एफडीपी यूरोपीय संघ की घोर समर्थक हैं, वहीं एएफडी चाहती है कि जर्मनी यूरोपीय संघ और यूरो, दोनों को छोड़ दे जबकि वामपंथी पार्टी का मत इस बारे में कुछ और ही है. जर्मन वामपंथी नेताओं ने ब्रेक्जिट को यूरोपीय संघ के भीतर मौजूद सामाजिक असमानता का नतीजा बताया था. पार्टी यूरोपीय संघ की संधि में बड़े संशोधनों की पैरवी करती है.

हैरानी की बात नहीं है कि कारोबार समर्थक सीडीयू-सीएसयू और एफडीपी टीटीआईपी और सीईटीए जैसे अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक समझौतों का समर्थन करती हैं. वहीं एएफडी, लेफ्ट पार्टी और ग्रीन पार्टी इनका विरोधी करती है, ठीक वैसे ही जैसे ट्रंप करते हैं. अलबत्ता विरोध की वजह दूसरी हैं. एसपीडी और खास तौर से पूर्व आर्थिक मंत्री और मौजूदा विदेश मंत्री जिगमार गाब्रिएल इन समझौतों का समर्थन करते हैं. हालांकि यह आशंका भी है कि इन समझौतों की वजह से जर्मनी में काम करने वाले लोगों को नुकसान हो सकता है.

आर्थिक और मौद्रिक नीति

यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां वामपंथ और दक्षिणपंथ की राय आपस में मिलती है. आमतौर पर सीडीयू-सीएसयू और एफडीपी टैक्स में कमी और वित्तीय मितव्ययिता की समर्थक हैं तो व्यापार पर सरकारी नियमन के खिलाफ है. वहीं एसपीडी, ग्रीन और लेफ्ट ऐसी सरकार का समर्थन करती हैं जिसका जोर धन के बंटवारे पर हो.

आर्थिक नीतियों पर एएफडी का मिला-जुला रुख है. एक तरफ पार्टी पारंपरिक दक्षिणपंथी नीतियों मसलन सरकारी सब्सिडी का विरोध, आयकर की ऊपरी सीमा तय करने और संतुलित बजट जैसे कदमों का समर्थन करती है, वहीं वह सरकारी संपत्तियों के निजीकरण का विरोध करती है. एएफडी परिवारों के लिए बेहद उदार सामाजिक लाभ कार्यक्रमों का समर्थन करती है.

सुरक्षा और निजी स्वतंत्रता

एएफडी अमेरिका जैसी कानून व्यवस्था नीतियों समर्थन करती है लेकिन उसके पार्टी मंच से कभी "आतंकवाद" शब्द का उल्लेख भी नहीं किया गया. सीडीयू-सीएसयू जैसे दल आतंकवाद से लड़ने के लिए खुफिया सेवाओं को मजबूत बनाने पर बल देते हैं जबकि लेफ्ट और ग्रीन पार्टियां सरकार की तरफ से बढ़ती निगरानी का विरोध करती हैं. एसपीडी का रुख यहां अस्पष्ट नजर आता है, शायद इसलिये क्योंकि वह इस समय सत्तारूढ़ गठबंधन में जूनियर पार्टनर है.

अभिजात्य वर्ग और बाहरी लोग

पारंपरिक रूप से दक्षिणपंथी धड़े अभिजात्य वर्ग के हितों की बात करते आये हैं वहीं वाम धड़ा गरीब और जरूरतमंदों के पक्षधर रहे हैं. लेकिन पॉपुलिस्ट अपने आप को जनसाधारण की आवाज बताते हैं. यहां भी विभाजन दक्षिणपंथियों और वामपंथियों से ज्यादा स्थापित राजनीतिक दलों और नये दलों के बीच नजर आता है.

पर्यावरण और ऊर्जा

ग्रीन पार्टी के लिए ये सबसे अहम मुद्दे हैं. लेकिन इन मसलों पर दक्षिणपंथ-वामपंथ का विभाजन अब अतीत की बात हो गयी है. साल 2011 में मैर्केल ने जर्मनी में परमाणु बिजली घरों को बंद करने का फैसला किया था. अमूमन यह वामदलों का रुख रहा है. इसने अन्य राजनीतिक दलों के लिए भी रास्ते खोले. एएफडी देश के परमाणु प्लांटों को चलाने के हक में है. वह चाहती है कि सरकार अक्षय ऊर्जा को प्रोत्साहन देना बंद करे. वहीं एफडीपी भी जर्मनी के अक्षय ऊर्जा कानून को बदलना चाहती है. हालांकि एसपीडी और वाम दल जर्मनी की वर्तमान ऊर्जा नीति का समर्थन करते हैं लेकिन यह किसी भी पार्टी की प्राथमिकता नहीं है.

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