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दुनिया

क्या है ग्लोबल मीडिया फोरम

हम अपनी जिंदगी कैसे जीना चाहते हैं. या यूं कहें तो अब आगे कैसे चलेगा, खास तौर से एक ऐसी आर्थिक प्रणाली के साथ जहां ध्यान केवल आर्थिक बढ़ोतरी पर दी जा रही हो. हमारी धरती बहुत देर तक इस असीमित विकास को सह नहीं पाएगी.

विकास में मीडिया की एक अहम भूमिका है. इससे पश्चिमी जगत में लोग एशिया और अफ्रीका के गरीब देशों में लोगों की हालत समझ सकेंगे. इन देशों में लोगों को पता भी चलना चाहिए कि दुनिया के बाकी हिस्सों में मजदूर कानूनों की स्थिति क्या है और मिसाल के तौर पर, बांग्लादेश जैसे देशों में बाढ़ से लोग कैसे जूझते हैं. अगर मीडिया अपना काम सही तरह से करे तो शायद इन लोगों की सही वक्त पर मदद की जा सकेगी और इनकी परेशानियों का हल भी ढूंढा जा सकेगा.

17 से लेकर 19 जून तक ग्लोबल मीडिया फोरम जीएमएफ में इन मुद्दों पर बहस होगी. फोरम के आयोजक और डीडब्ल्यू प्रमुख एरिक बेटरमान कहते हैं, "जीएमएफ एक ऐसी जगह है जहां अलग अलग पेशों के लोग साथ आते हैं. यह ऐसे लोग हैं जो आम तौर पर एक दूसरे से मिलते नहीं, यानी मीडिया, आर्थिक विश्लेषक और विकास क्षेत्रों में काम कर रहे लोग."

बहस और संपर्क

जीएमएफ यानी मिलना जुलना, संपर्क और बहस. बेटरमान कहते हैं कि आयोजक के तौर पर डीडब्ल्यू कोशिश करता है कि सारे सम्मेलनों का आयोजन ऐसा हो जिससे कि सब अपने विचार सामने रख सकते हैं. यही जीएमएफ की खासियत है. जीएमएफ में हिस्सा ले रहीं बर्लिन की विशेषज्ञ एल्के होल्स्ट सम्मेलन को लेकर उत्सुक हैं. कहती हैं, "जीएमएफ में अलग अलग संस्कृतियों के लोग साथ आते हैं और आप जान सकते हैं कि उनकी प्राथमिकताएं और उनके देश में स्थिति हमसे कितनी अलग है."

जीएमएफ में कुल 50 कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है. इनमें से 40 वर्किंग ग्रुप हैं जिसमें भाग लेने वाले अपनी बात सामने रख सकेंगे. हिस्सा लेने वाले 2,000 लोगों को बहस के कई मौके मिलेंगे. सम्मेलनों का आयोजन बॉन में पूर्व जर्मन संसद में हो रहा है. जीएमएफ का मोटो है, "विकास का भविष्य - आर्थिक मूल्य और मीडिया."

आखिर किस कीमत पर

आर्थिक विकास की सीमाओं पर बहस पहली बार 1972 में हुआ. उस वक्त क्लब ऑफ रोम नाम के विशेषज्ञों की एक गुट ने इस मुद्दे पर शोध किया था. लेकिन 40 साल बाद भी दुनिया में कुछ बदला नहीं, जबकि कई लोगों का मानना है कि

GMF Foto Jakob von Uexküll

याकोब फॉन उक्सकुल

विकास अपनी सीमा तक पहुंच चुका है और कुछ हद तक इसे पार भी कर चुका है. डीडब्ल्यू प्रमुख बेटरमान इस संदर्भ में एक अहम सवाल उठाते हैं, "क्या वैश्विक समृद्धि के लिए वृद्धि जरूरी है."

क्या यह आर्थिक वृद्धि हरी होगी, यानी क्या पर्यावरण भी इसमें शामिल होगा और इस वैश्विक वृद्धि के लिए हमें क्या कीमत देनी होगी. 19 जून को इस सवाल के जवाब ढूंढने की कोशिश की जाएगी. इसके लिए प्यूमा स्पोर्ट्स कंपनी के पर्यावरण प्रमुख याकोब फॉन उक्सकुल जीएमएफ में शामिल होंगे. उक्सकुल ने वैकल्पिक नोबेल पुरस्कारों की भी स्थापना की है. मंगलवार शाम को अमेरिकी शोधकर्ता और रूस की एक अर्थशास्त्री एक अहम सवाल पर बहस करेंगे- क्या किसी देश के सकल धरेलू उत्पाद और उसके आर्थिक विकास पर ध्यान देना इतना अहम है या क्या आजकल सकल घरेलू खुशहाली पर ध्यान दिया जाना चाहिए.

विकास का अलग चेहरा

बर्लिन की शोधकर्ता एल्के होल्स्ट अपने वर्कशॉप में विकास और जेंडर पर बात करेंगी. उनका मानना है कि जहां कहीं भी आर्थिक वृद्धि की बात होती हैं, वहां ज्यादातर पुरुष उच्च श्रेणी के अधिकारी होते हैं और फैसले लेते हैं. होल्स्ट मानती हैं कि अगर किसी कंपनी के प्रबंधन में ज्यादा महिलाएं और अलग अलग वर्ग के लोग होते, तो विकास का चेहरा भी आज अलग होता.

लेकिन कई विशेषज्ञ अब भी विकास पर सवाल नहीं उठा रहे. 17 जून को जीएमएफ का मुद्दा होगा, "लोग जितने स्वस्थ और शक्तिशाली होंगे, उतना ही योगदान

GMF Foto Dr. Vandana Shiva

वह आर्थिक विकास की ओर दे सकेंगे." विकास और ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने पर बात करेंगे नाइजीरिया के एक पादरी और भारत की कार्यकर्ता वंदना शिवा. 17 जून को ही फिलिपींस में टेलेमेडिसिन की एक डॉक्टर मिलेंगी अफ्रीकी देश चाद की एक मानवाधिकार कार्यकर्ता से. अमेरिका के जाने माने भाषा विशेषज्ञ नोम चॉम्स्की भी शामिल होंगे.

विकास में साझेदारी

डीडब्ल्यू प्रमुख एरिक बेटरमन को इंतजार है डीडब्ल्यू के रीब्रॉडकास्टरों का, जो विश्व के 5,000 टीवी और रेडियो चैनलों में डीडब्ल्यू के कार्यक्रम प्रसारित करते हैं. बेटरमान का कहना है कि एक विदेशी प्रसारक होने की हैसियत से जीएमएफ डीडब्ल्यू के लिए एक अहम घटना है. इसमें विचार किया जाता है डीडब्ल्यू के मकसद के बारे में और इनसे काम के लिए नए विचार भी मिलते हैं.

बेस्ट ऑफ ब्लॉग्स के विजेताओं को भी डीडब्ल्यू जीएमएफ में पुरस्कृत किया जाएगा. इनमें दुनिया भर से ऐसे ऑनलाइन कार्यकर्ता शामिल हैं जिन्होंने अपनी जान पर खेल कर अपनी बात आगे रखी है.

रिपोर्टः हेंड्रिक हाइंत्से/एमजी

संपादनः प्रिया एसेलबॉर्न

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