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दुनिया

क्या हुआ क्यूबा की क्रांति का

ठीक 60 साल पहले फिडेल कास्त्रो ने क्यूबा की सत्ता पहली बार अपने हाथ में ली. उन्होंने एक महत्वाकांक्षी क्रांतिकारी प्लेटफॉर्म का वादा किया. लेकिन इन वादों में से आज कितने पूरे हुए हैं?

क्यूबा की क्रांति अधिकारिक रूप से 26 जुलाई 1953 को शुरू हुई. एक साल बाद अमेरिकी समर्थन वाले तानाशाह फुल्गेन्सियो बास्तिस्ता तख्ता पलट के बाद सत्तासीन हुए. उस समय फिडेल कास्त्रो को बहुत कम लोग जानते थे. युवा वकील जो तानाशाह के खिलाफ 1952 के चुनाव में खड़े तो हुए लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली. क्यूबा के लोग वोट कर पाते इससे पहले ही वोटिंग खत्म कर दी गई.

कास्त्रो ने करीब 130 लोगों का साथ जुटाया और सांटियागो डे क्यूबा में मोनकाडा सैनिक छावनियों को अपने हाथों में लेने की कोशिश की और वहां रखे हथियारों को हथियाने की भी. उन्हें उम्मीद थी कि इस बैरक के 400 सैनिक एक दिन पहले के सेंट जेम्स उत्सव के बाद थके हुए होंगे या फिर वहां नहीं होंगे. लेकिन यह योजना विफल हो गई और कई क्रांतिकारियों को फांसी दे दी गई जबकि बाकी पर मुकदमा चला.

कास्त्रो का लंबा और महत्वाकांक्षी राजनीतिक एजेंडा बिलकुल साफ था, उस समय भी जब उन्होंने 1953 में छावनियों पर हमला किया. सत्ता में आने के बाद उन्होने कोशिश की कि सभी को बराबर जमीन मिले, औद्योगीकरण हो, बेरोजगारी कम हो, शिक्षा के क्षेत्र में सुधार हो और एक ऐसा सिस्टम बनाया जाए जिसमें सभी क्यूबा निवासियों को स्वास्थ्य की सुविधा मिल सके. लोकतंत्र का एक खाका.

Zeugnis der Revolution auf Kuba Moncada-Kaserne

मोनाकाडा बैरेक

हालांकि 1959 तक विद्रोही क्रांति नहीं कर पाए. अब 50 साल बाद उन सुधारों की हालत क्या है जिनके बारे में कास्त्रो ने सपना देखा था. मोनकाडा छावनी को तो बंदूक की गोलियों के साथ म्यूजियम बना दिया गया है.

समाजवाद, पूंजीवाद और बाजार सुधार के बीच

क्यूबा के इतिहासकार और पार्टिसिपेटरी एंड डेमोक्रैटिक सोशियलिज्म संगठन के कार्यकर्ता पेद्रो काम्पोस का कहना है,"मोनकाडा प्रोग्राम पुरानी साम्यवादी पार्टी के जैसा नहीं बल्कि समाजवादी था." कास्त्रो का मूल प्रोग्राम "पार्टी के नियंत्रण वाला पूंजीवाद का समर्थक नहीं था जिसमें कुछ कृषि सहयोग भी होते थे, स्टालिनिज्म की तरह." कास्त्रो चाहते थे कि कर्मचारी सीधे कंपनियों में भागीदारी करें, खुद के प्रशासन वाली कृषि कोऑपरेटिव चलाएं और लोगों की लोकतांत्रिक भागीदारी बेहतर हो. उन्होंने कहा कि इसमें से सारे लक्ष्य पूरे नहीं हुए हैं.

अमेरिका की पिट्बर्ग यूनिवर्सिटी में लैटिन अमेरिकी स्टडीज के पूर्व प्रोफेसर कार्मेलो मेसा लागो का मानना है, "क्यूबा को हमेशा सशर्त और पोषित संप्रभुता ही मिली क्योंकि देश आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं है और हमेशा बाहरी लोगों पर निर्भर रहा है, चाहे वो स्पेन हो, अमेरिका, सोवियत संघ या फिर वेनेज्वेला."

1980 के अंत में, आयरन कर्टेन के गिरने, यानी दूसरे विश्व युद्ध में यूरोप का विभाजन होने से क्यूबा में आर्थिक और सामाजिक संकेत सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गए. लेकिन ये सब 1990 में सोवियत संघ के विघटन के साथ ही उलट गया. क्यूबा को साम्यावादी देशों का सहयोग मिलना बंद हो गया. देश मुश्किल परिस्थिति में चला गया.

आज फिडेल कास्त्रो के भाई राउल कास्त्रो के आर्थिक सुधार देश के लोगों को चुनौती दे रहे है. लोगों की आय का फर्क बढ़ता जा रहा है, गरीब लोगों की संख्या बढ़ रही है. सामाजिक कल्याण के कार्यक्रम कम कर दिए गए हैं. पहले की तुलना में 70 फीसदी कम लोगों को सरकारी मदद मिल रही है.

मेसा लागो कहते हैं कि केंद्रीकृत योजनाओं के कारण कृषि उत्पादन ठहरा हुआ है. अधिकतर जमीन सरकार के पास है. देश के सिर्फ 10 फीसदी लोग आजाद हैं. औद्योगीकरण नहीं के बराबर है. राउल कास्त्रो ने हाल ही में सरकारी नौकरियों में कटौती की घोषणा की है जिससे क्यूबा की एक तिहाई जनता नौकरियां खो देगी.

राजनीतिक स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय छवि

क्यूबा की सामाजिक स्थिति ढुलमुल है. एक ओर क्यूबा में पूरे लैटिन अमेरिका में बच्चों की मृत्यु दर सबसे कम है और जीवन प्रत्याशा सबसे ज्यादा. वहीं दूसरी और सामाजिक सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं लगातार खराब हुई है. क्यूबा के इतिहासकार और राजनीति विज्ञानी अर्मांडो चागुसेदा बताते हैं कि न केवल ये सेवाएं कम की गई हैं बल्कि "अतिरेक भी, क्योंकि इन क्षेत्रों में निवेश कम किया गया है. पानी और कचरे के प्रबंधन में कटौती" भी की गई है जो देश में महामारी फैला सकती है. प्रशिक्षित डॉक्टर देश छोड़ कर जा रहे हैं. इससे देश में डॉक्टरों की कमी हो रही है.

50 Jahre nach der Revolution in Kuba

50 साल बाद

क्यूबा की सरकार को कम विदेशी सहायता के साथ काम करना पड़ता है. वेनेज्वेला, अर्जेंटीना, बोलिविया, निकारागुआ, इक्वाडोर आर्थिक मदद कम कर रहे हैं. आंतरिक रूप से भी लोगों का सहयोग कम है. मेसा लागो मानते हैं, "सबसे बड़ी समस्या है राजनीतिक ठहराव की. जो तानाशाही सरकारी है, एक पार्टी जो अभिव्यक्ति की आजादी पर गंभीर नियंत्रण कर रही है. लोगों को सार्वजनिक विरोध प्रदर्शन या हड़ताल की भी अनुमति नहीं. मीडिया और कर्मचारी संगठन सरकार का ही विस्तार हैं."

लेकिन हालात बदले हैं. हाल ही में क्यूबा के लोगों की देश से बाहर जाने की संभावना कम हो रही है निजी निवेश के साथ. लेकिन इन सुधारों में भी तानाशाही की गंध है. चागुआसेदा कहते हैं, मोनकाडा के 60 साल बाद मूलभूत बदलाव जिन्हें फिडेल कास्त्रो ने सोचा था वे नहीं हुए. वे कहते हैं, नागरिक थके हुए हैं और उनके पास कोई ताकत नहीं है. विचारधारा बंटी हुई थी. शांतिपूर्ण नागरिक विरोध की संभावना भी कम है. क्यूबा के लोग खुद को उनके विपक्षी के तौर पर देखते हैं, "जो संभ्रांत अमीर हैं और जो सूचना और ताकत की चाबी पर काबू रखते हैं."

रिपोर्टः मुनोज लिमा/एएम

संपादनः एन रंजन

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