1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

क्या शियाओं से युद्ध लड़ रही है सऊदी सरकार?

सऊदी अरब के पूरबी हिस्से में स्थित अवामिया में महीनों से युद्ध हो रहा है. शहर के कुछ हिस्से बर्बादी का मंजर बन गये हैं. सुन्नी सल्तनत की देश के शिया समुदाय पर सख्ती ने हालात को बिगड़ने दिया है.

दुनिया की नजरों से ओझल सऊदी अरब के पूरब में स्थित अवामिया पिछले तीन महीनों से भारी लड़ाई के केंद्र में है. सैटेलाइट से ली गई तस्वीरें पूरी तरह से ध्वस्त शहर के हिस्सों को दिखाती हैं.सोशल मीडिया पर गोलीबारी और ध्वस्त इमारतों की तस्वीरें घूम रही हैं. विदेशी रिपोर्टरों को इलाके में जाने की अनुमति नहीं है. लड़ाई का केंद्र अवामिया का ऐसिहासिक मुहल्ला अल मसोरा है. शहर की तंग गलियों में शिया चरमपंथी शूदी सैनिकों से लोहा ले रहे हैं. अब तक 15 लोगों के मरने की खबर है. लड़ाई में भारी हथियारों का भी इस्तेमाल हो रहा है. जब से सोशल मीडिया पर कनाडा में बनी बख्तरबंद गाड़ियां अवामिया में नागरिकों के खिलाफ कार्रवाई में इस्तेमाल होती दिखी हैं, ओटावा में सऊदी अरब को हथियारों की बिक्री रोकने की मांग हो रही है.  

जबरन विस्थापन

अवामिया में विवाद की फौरी वजह शहर के 400 साल पुराने केंद्र को स्थानीय आबादी के विरोध के बावजूद तोड़कर वहां शॉपिंग मॉल बनाने की सऊदी सरकार की योजना थी. संयुक्त राष्ट्र ने अप्रैल में ही सरकार से ओल्ड सिटी को नहीं गिराने और लोगों का विस्थापन रोकने की मांग की थी. संयुक्त राष्ट्र की विशेष सांस्कृतिक दूत करीमा बेनून ने सांस्कृतिक विरासत के मिटने की आशंका जतायी थी.

जर्मन विदेश नीति सोसायटी के सेबाश्चियन सोंस इस दलील को नहीं मानते कि सऊदी सरकार निवासियों के जीवनस्तर को बेहतर बनाने के लिए ढांचागत सुधार कर रही है. वे कहते हैं, "ये असल में पुनर्वास परियोजना ही लगती है. वहां दबदबे वाले शिया अल्पसंख्यकों को इधर उधर बसाने और उनके जीवन का आधार छीनने की योजना है." सोंस का कहना है कि यह नीति देश में सालों से शिया लोगों के दमन और उन्हें अप्रभावी बनाने के सऊदी सरकार की सालों से चली आ रही नीति के अनुकूल है.

वहाबी देश में शिया

विवाद की असली वजह शिया लोगों का उत्पीड़न और उन्हें कमजोर करना है. सऊदी अरब की 3 करोड़ की आबादी में करीब 10 प्रतिशत शिया हैं. वे मुख्य रूप से देश के पूर्वी हिस्से में रहते हैं. यह वह इलाका है जहां मुख्य रूप से सऊदी तेल निकाला जाता है. लेकिन देश की दौलत में शिया लोगों को हिस्सा नहीं मिलता. राजनीतिक जीवन में उनकी भागीदारी नहीं ही है. उनपर इस बात का भी दबाव है की ज्यादातर लोग वहाबी हैं और वे शिया समुदाय को धर्मभ्रष्ट मानते हैं.

धार्मिक अल्पसंख्यकों का असंतोष अरब वसंत के दौरान उभरा था. उस समय छोटा अवामिया विरोध का केंद्र बन गया था. खासकर तब जब पड़ोसी बहरीन में सुन्नी शासकों के खिलाफ शिया बहुमत के विद्रोह को सऊदी सैनिक समर्थन से कुचल दिया गया था. अवामिया लोकप्रिय शिया मौलवी निम्र अल निम्र का गृहनगर भी है जिन्हें शियाओं के साथ भेदभाव के खिलाफ विरोध का नेतृत्व करने की कीमत 2016 में जान देकर चुकानी पड़ी. कथित आतंकवाद के आरोप में उन्हें सूली चढ़ा दी गयी.

हिंसा के बदले हिंसा

रियाद सरकार की सख्ती का नतीजा हिंसा के बढ़ने के रूप में सामने आया है. ये कहना है यूरोप में सऊदी मानवाधिकार संगठन के अली आदुबिसी का. वे खुद अवामिया के हैं और इस समय बर्लिन में शरणार्थी के तौर पर रहते हैं. अरब वसंत के बाद वे कई बार सऊदी जेल में रहे. उनका कहना है कि सऊदी अधिकारियों की हिंसा के कारण होने वाली मौतों, उत्पीड़नों से उनका इरादा मजबूत हुआ है जो समझते हैं कि उन्हें हथियारों से अपनी रक्षा कपनी होगी.

इस बीच शहर की 90 फीसदी आबादी शहर छोड़कर भाग गयी है या उन्हें जबरन कहीं और बसा दिया गया है. मानवाधिकार कार्यकर्ता अदुबिसी इसे अपने ही नागरिकों के खिलाफ सऊदी सरकार का युद्ध बताते हैं जैसा कि देश के 80 साल के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ.एमनेस्टी के अनुसार कम से कम 14 लोग सवालिया मुकदमों के बाद मौत की सजा के तामील होने का इंतजार कर रहे हैं. ऐसे में विद्रोही आत्मसमर्पण को तैयार नहीं दिखते.

ताकत का प्रदर्शन

सऊदी अरब के बारे में एक किताब लिखने वाले एंड्र्यू हैमंड के लिए सऊदी कार्रवाई का समय दिलचस्प है. वे ताकत के कथित प्रदर्शन को राजघराने में उत्तराधिकार में बदलाव के साथ जोड़कर देखते हैं. पूर्व युवराज नजेफ को हटा दिया गया है जिसकी वजह से उनके परिवार का ताज पर सीधा दावा खत्म हो गया है. नये युवराज अपने को ताकतवर नेता के रूप में पेश कर रहे हैं. हैमंड के अनुसार, "जो एक ओर घरेलू मोर्चे पर शिया को रोकता है तो बाहरी मोर्चे पर ईरान को."

सउदी सरकार को फिलहाल सुन्नी आबादी का समर्थन मिल रहा है, अवामिया में लोगों को बांटने और इमारतों को तो़ड़ने की सराकर की नीति को फौरी तौर पर सफलता मिल सकती है, जिसका लक्ष्य हैमंड के अनुसार शिया आबादी की दृढ़ता को तोड़ना है. अतीत में इसकी मिसालें भी हैं. 1979 में पास ही स्थित प्रांतीय राजधानी कतीफ में विरोध प्रदर्शनों के बाद सिटी सेंटर को नेस्तनाबूद कर दिया गया था. बाद में वहीं एक पार्क और सुन्नी मस्जिद बना दी गई.