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दुनिया

क्या वाकई कम हुआ भारत में लिंग भेद?

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम 2015 इंडेक्स के मुताबिक भारतीय महिलाओं की स्थिति पिछले साल के मुकाबले सुधरी है. राजनीतिक भागीदारी में आगे आने लेकिन शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक मोर्चे पर पीछे रह जाने का कारण उनका महिला होना ही है.

कुल 145 देशों के वैश्विक जेंडर गैप इंडेक्स में भारत 114वें स्थान से ऊपर उठकर 108वें स्थान पर आ गया है. सबसे आगे है आइसलैंड और टॉप के अन्य देशों में नॉर्वे, फिनलैंड, स्वीडन जैसे नॉर्डिक देश हैं. विकासशील देशों में चीन 91वें स्थान के साथ और ब्राजील 85वें नंबर पर आकर भारत से आगे हैं.

जेंडर गैप इंडेक्स हर देश में महिलाओं और पुरुषों के बीच चार तरह के अंतर पर आधारित होता है. ये हैं आर्थिक भागीदारी और अवसर, शिक्षा प्राप्ति, स्वास्थ्य एवं अस्तित्व, और राजनीतिक सशक्तिकरण. इन चार कसौटियों में राजनीतिक सशक्तिकरण को छोड़कर भारत का प्रदर्शन बाकी तीन क्षेत्रों में बहुत खराब रहा. राजनीतिक क्षेत्र में आए इस उछाल का कारण मंत्री स्तर के पदों पर महिलाओं की तादाद 9 प्रतिशत से बढ़कर 22 प्रतिशत होना है.

लेबर फोर्स यानि श्रमिक बल में भागीदारी के मामले में 7 फीसदी की कमी के साथ भारत सऊदी अरब से भी पीछे है. इसका कारण समान काम के लिए कम आय मिलना और कम से कम महिलाओं का श्रमबल में शामिल होना पाया गया है. भारत में भी कंपनियों के बोर्ड स्तर पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए कानून बनाए गए हैं लेकिन शुरुआती या थोड़ी अनुभवी नौकरीपेशा महिलाओं को कार्यक्षेत्र में वापस शामिल करने में कई दुराग्रह काम करते हैं.

भारत में केवल 8 फीसदी बोर्ड सीटों पर महिलाएं हैं. हर साल वर्कफोर्स से बाहर होने वाली प्रशिक्षित महिलाओं में सबसे ज्यादा भारत में ही हैं. जब मध्यम और वरिष्ठ पदों तक ही पर्याप्त महिलाएं नहीं पहुंचेंगी तो उन्हें बोर्ड रूम तक पहुंचाने में कोई भी कानून काम नहीं आएगा. आंकड़े दिखाते हैं कि कानून बनने के बावजूद बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में दर्ज 5,711 कंपनियों में से करीब 530 ऐसी हैं जिनके बोर्ड में एक भी महिला डॉयरेक्टर नहीं है. जिन दूसरी कंपनियों ने अंतिम समय सीमा के भीतर नियुक्तियां कीं, वे भी कंपनी के महत्वपूर्ण पुरुष सदस्यों की पत्नी, सास या कोई और नजदीकी संबंधी हैं. इस प्रतिनिधित्व को छद्म नहीं तो क्या माना जाए जब कामकाजी महिलाओं को इसमें कोई हिस्सेदारी ही ना मिले.

नॉन प्रॉफिट संस्था कैटेलिस्ट की रिसर्च दिखाती है कि भारत में आधी से अधिक महिलाएं जूनियर और मिड लेवल के पदों पर आते आते नौकरियों से बाहर हो जाती हैं. ज्यादातर मामलों में ऐसा युवा महिला कर्मियों के मातृत्व से जुड़ी जिम्मेदारियों के कारण होता है. मां बनने के बाद कई कंपनियां उन्हें काम पर वापस लौटने का रास्ता नहीं देतीं और बच्चे की जिम्मेदारी होने के कारण उन्हें नई नौकरी पर रखने में कंपनियां हिचकिचाती हैं. कैटेलिस्ट की निदेशिका शाची इर्डे बताती हैं कि, मातृत्व अवकाश, क्रेच की सुविधा और लचीले काम के घंटे होना मददगार होगा...फिलहाल तो वे पाइपलाइन में ही नहीं हैं."

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की स्टडी में बताया गया है कि भारत के श्रमबल में महिलाओं और पुरुषों की बराबर भागीदारी से देश की जीडीपी को 27 फीसदी बढ़ाया जा सकता है.

LINK: http://www.dw.de/dw/article/0,,18861801,00.html

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