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मंथन

क्या वाकई अच्छा है बायोफ्यूल

पुआल से बायोफ्यूल बन सकता है. स्विट्जरलैंड की कंपनी क्लारिआंट ने नई तकनीक की मदद से पुआल से चीनी निकालने में कामयाबी हासिल की है. इससे बायोफ्यूल बनाया जा सकता है.

स्विस कंपनी क्लारिआंट पुआल की मदद से ईथेनॉल बना रही है. इसे साधारण पेट्रोल में मिलाया जा सकता है. कंपनी 2006 से इस पर रिसर्च कर रही है. कंपनी के प्रमुख मार्कुस रारबाख कहते हैं, "पुआल या पेड़ों के तने को प्रकृति ने ऐसे बनाया है कि वे हर मौसम में टिके रहें. इसका नतीजा यह है कि उनसे चीनी निकालना महंगा, बहुत मुश्किल और बहुत दिमाग का काम है. हम आधुनिक एन्जाइम और एन्जाइम को बनाने के तरीके के जरिए बायोफ्यूल निकालने में सफल हुए हैं."

ईंधन विशेषज्ञों को लगता है कि इस तरह के बायोफ्यूल पर शोध अहम है. लेकिन अब भी वैज्ञानिकों का मानना है कि खाने वाली फसलों के बिना यह मुमकिन नहीं. विशेषज्ञों का कहना है, "कचरे से अगली पीढ़ी का बायोईंधन बनाने में कम संभावनाएं हैं. जर्मनी में ऊर्जा के लिए इस्तेमाल किए जा सकने वाले पुआल की क्षमता एक करोड़ टन है, जिससे करीब 17 लाख टन पेट्रोल के बराबर ईंधन मिल सकता है. यह जर्मन गाड़ियों में इस्तेमाल होने वाले ईंधन का नौ फीसदी हिस्सा है."

बायोईंधन पसंद नहीं

फिलहाल कई ड्राइवर बायोईंधन भरना पसंद नहीं करते. जर्मनी में ही सिर्फ 15 फीसदी लोग गाड़ी में ई-10 नाम का मिक्स बायोईंधन भरते हैं. फसल के बजाए पौधों के अवशेषों से बना नया बायोईंधन, इस बारे में कोई एक मत नहीं. कुछ ग्राहक मानते हैं कि यह एक अच्छा विकल्प है और आने वाले समय में विकास को इसी दिशा में ले जाना होगा. लेकिन कुछ ग्राहक कहते हैं कि यह गाड़ी की मोटर के लिए अच्छा नहीं है और इस पर भरोसा नहीं किया जा सकता.

ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए नया बायोईंधन फिलहाल क्लारिआंट के पेट्रोल पम्प पर ही आजमाया जा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि पूरे यूरोप में इसे फैलने में अभी छह साल और लगेंगे.

रिपोर्टः आलक्सा मायर/एएम

संपादनः ईशा भाटिया

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