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विज्ञान

क्या लैब में बनेंगे इंसान

वैज्ञानिकों ने बिल्कुल शुरूआत से जीनोम डिजाइन कर अपनी पसंद के गुणों वाला एक साधारण सा फफूंद जैसा जीव बनाने में सफलता हासिल की है. ये डिजाइनर जीव बायोटेक्नोलॉजी का भविष्य कहे जा रहे हैं.

यह डिजाइनर जीव हैं, यीस्ट यानि खमीर, वैज्ञानिकों ने जिसके क्रोमोजोम से अनावश्यक जीन मिटा कर उसकी आनुवंशिक संरचना को पूरी तरह बदल दिया है. बारह साल पहले रिसर्चरों ने पहला कृत्रिम वायरस बनाया था. उसके करीब पांच साल बाद एक बैक्टीरियम या जीवाणु का पूरा जीनोम बनाया गया और अब यीस्ट के साथ जीवविज्ञानियों ने इस दिशा में एक और कदम आगे बढ़ाया है.

न्यू यॉर्क यूनिवर्सिटी में लैंगोन मेडिकल सेंटर के जेफ बोएके और उनकी टीम ने लैब में एक यीस्ट की कोशिका के कुल 16 में से एक क्रोमोजोम बना डाला है. सवाल यह उठता है कि आखिर इसका महत्व क्या है. असल में यीस्ट की कोशिका इंसान की कोशिकाओं से बहुत मिलती जुलती होती हैं. जेफ बोएके बताते हैं, "यीस्ट की कोशिका इंसानी कोशिकाओं से बहुत ज्यादा जुड़ी होती हैं. इसलिए हमने यीस्ट से जो सबक सीखे हैं वे हमारे लिए बिल्कुल सीधे तौर पर प्रासंगिक हैं."

यीस्ट एक ऐसा सूक्ष्म जीव होता है जिसमें सिर्फ एक ही कोशिका होती है. इंसान और बाकी बड़े जानवरों की ही तरह, यीस्ट की कोशिका भी 'यूकैरियोटिक' होती है यानि कोशिका में एक न्यूक्लियस या केन्द्रक होता है. जबकि वायरस या बैक्टीरिया की कोशिका में न्यूक्लियस नहीं होता.

जटिल पहेली है क्रोमोजोम

धरती की सभी जिंदा चीजों की तरह यीस्ट के क्रोमोजोम में भी डीएनए होता है. मशीनें रसायनिक तौर पर डीएनए बना सकती हैं लेकिन बहुत छोटे छोटे टुकड़ों में. ऐसी करीब 2,000 छोटी छोटी इकाइयों से डीएनए बन सकता है, जिन्हें 'बेस पेयर' कहते हैं. कृत्रिम रूप से क्रोमोजोम बनाना कितना कठिन है इसका अंदाजा इस बात से ही लग जाता है कि यीस्ट की कोशिका के क्रोमोजोम में तीन लाख से भी ज्यादा बेस पेयर्स यानि मूल जोड़े होते हैं.

मारबुर्ग यूनिवर्सिटी के सिॆथेटिक बायोलॉजिस्ट टॉर्स्टेन वाल्डमिंगहाउस बताते हैं, "इनको एक साथ लाना एक बड़ी चुनौती है. इसमें बहुत सारे लोग और कई साल लग जाते हैं." इस स्टडी में बोएके के साथ 60 से भी ज्यादा अंडरग्रेजुएट छात्रों ने काम किया. वाल्डमिंगहाउस यीस्ट के बारे में एक और खास बात बताते हैं कि अगर उन्हें मिलते जुलते डीएनए के टुकड़ों वाली खुराक दी जाए तो वे इन टुकड़ों को एक साथ जोड़ना शुरू कर देते हैं. इसी गुण का इस्तेमाल करके बोएके और उनकी टीम ने मूल यीस्ट के क्रोमोजोम की जगह एक एक करके कृत्रिम टुकड़े लगाए. ऐसे वैज्ञानिकों ने तब तक किया जब तक यीस्ट का क्रोमोजोम पूरी तरह नया नहीं हो गया.

'डिजाइनर इंसान'

जीन के व्यवहार के अलावा भी यीस्ट के इस प्रयोग से बहुत महत्वपूर्ण जानकारियां मिलती है. सदियों से इनका इस्तेमाल ब्रेड को फुलाने, बीयर या वाइन बनाने और कई दूसरे कामों में होता आया है. इससे बायोइथेनॉल और मलेरिया की दवा आर्टिमिसिनीन भी बनाई जाती है. इस प्रक्रिया में वैज्ञानिक यीस्ट के अंदर एक एक करके किसी खास उत्पाद के छोटे छोटे टुकड़े जोड़ कर अपना मनचाहा उत्पाद पा सकते हैं.

इंसान का जीनोम कहीं ज्यादा बड़ा होता है. उसमें तीन अरब से भी ज्यादा बेस पेयर्स होते हैं. इसलिए इंसान का पूरा जीनोम कृत्रिम रूप से बनाना बहुत कठिन है. वाल्डमिंगहाउस कहते हैं कि फिलहाल यह किसी 'साइंस फिक्शन' से कम नहीं है. उनका मानना है कि इंसान का क्रोमोजोम बनाने की कोई जरूरत भी नहीं है. "हम यीस्ट और बैक्टीरिया को और बेहतर ढंग से उपयोग में लाना चाहते हैं ताकि वे ज्यादा से ज्यादा चीजें बनाएं. क्या हम इंसान को भी और बेहतर ढंग से इस्तेमाल करना चाहेगें. मुझे नहीं लगता कोई ऐसा करना चाहेगा."

रिपोर्टः ब्रिगिटे ओस्टेराथ/ आरआर

संपादनः आभा मोंढे

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