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दुनिया

क्या रातों रात बन सकते हैं पर्यावरण रक्षक

सभी देश पर्यावरण सुरक्षा के एक ही नाव पर सवार हों और गरीब देशों को इसके लिए वित्तीय मदद मिले, यह नए अंतरराष्ट्रीय जलवायु समझौते का लक्ष्य है. लेकिन क्या समझौते के साथ रातों रात सबको पर्यावरण रक्षक बनाया जा सकता है.

एक बात पर सभी समहत हैं: राजनीतिज्ञ, अधिकारी, पर्यावरण कार्यकर्ता और यहां तक कि पत्रकार भी. लीमा के सम्मेलन में कुछ तो अलग है. पिछले सालों के सम्मेलनों की तुलना में पूरी तरह अलग. जर्मन वॉच के क्रिस्टॉफ बाल्स कहते हैं कि हर कहीं सकारात्मक मूड देखने को मिल रहा है. इस अच्छे माहौल की वजह है एक नए जलवायु समझौते की उम्मीद, जिसे संयुक्त राष्ट्र के सभी 195 देश समर्थन दे रहे हैं और जिस पर अगले साल पेरिस के सम्मेलन में दस्तखत हो सकते हैं. जर्मनी के पर्यावरण राज्यमंत्री योखेन फ्लासबार्थ कहते हैं कि वे किसी को नहीं जानते जो समझौते के खिलाफ हो.

अमेरिका और चीन का योगदान

विश्व भर में सबसे ज्यादा ग्रीनहाउस गैस पैदा करने वाले देशों अमेरिका और चीन ने उम्मीद भरा माहौल बनाने में योगदान दिया है. कुछ हफ्ते पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने पर्यावरण रक्षा के नए लक्ष्य पेश किए. अमेरिका 2005 से 2025 के बीच जहरीली गैसों के उत्सर्जन में 27 फीसदी की कमी करेगा. तो चीन ने 2030 तक लगातार कम कार्बन डायॉक्साइड के उत्सर्जन का वादा किया है. अहम बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र वार्ताओं में बाधा डाल रहे इन देशों ने अब पहल करने का फैसला लिया है.

और वे नया पर्यावरण समझौता चाहते हैं जो 2020 में क्योटो संधि की जगह लेगा. क्योटो समझौते में 38 धनी देशों ने 2020 तक ग्रीनहाउस गैसों में पांच फीसदी की कमी का वचन दिया था. ज्यादातर देश इसमें विफल रहे, जर्मनी कुछ अपवादों में शामिल है. नए समझौते में 1990 के साथ बदली भूराजनीतिक स्थिति को भी ध्यान में रखा जा रहा है. भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे उभरते देशों से भी अब पर्यावरण रक्षा में योगदान की मांग की जा रही है, जिन्हें क्योटो संधि में कोई बाध्यकारी जिम्मेदारी नहीं दी गई थी. और चीन भी जिसे 20 साल पहले विकासशील देश कहा गया था.

चूंकि चीन खुद सक्रिय हो रहा है, इसलिए उस पर पर्यावरण रक्षा के लिए ज्यादा प्रयास करने का दबाव है. जर्मन विकास मंत्री हैर्ड म्युलर का कहना है कि खास कर अमेरिका को अपने प्रयास यूरोपीय स्तर के करीब लाने चाहिए. हालांकि यूरोपीय लक्ष्यों की खुद यूरोप में आलोचना हुई है लेकिन लीमा से देखने पर वह जहरीली गैसों की कटौती के मामले में अगुआ है. 1990 से 2030 के बीच में 40 फीसदी की कटौती अमेरिका के लिए मुमकिन नहीं है. हालांकि उन्हें पिछले दिनों शेल गैस के जरिए इसमें कमी लाने में कामयाबी मिली है.

पर्यावरण कोष से बढ़ी उम्मीदें

चीन 2030 से गैसों के उत्सर्जन में कमी के अलावा कोई वादा करने को तैयार नहीं. कहना मुश्किल है कि क्या यह गरीब देशों के लिए पर्याप्त होगा, जिन्हें अंत में डील की पुष्टि करनी है. उन्हें पहले की ही तरह ज्यादा वित्तीय मदद की उम्मीद है. और यहां भी उम्मीद की किरणें दिखाई दे रही हैं. नए ग्रीन फंड में इस बीच ऑस्ट्रेलिया और बेल्जियम की घोषणाओं के बाद 10 अरब डॉलर की पूंजी जमा हो गई है. इस कोष से विकासशील देशों को पर्यावरण सुरक्षा की परियोजनाओं के लिए वित्तीय मदद मिलेगी. बर्लिन ने इसमें एक अरब डॉलर का योगदान दिया है और हाल ही में बर्लिन में दाता देशों का एक सम्मेलन कराया था.

अमेरिका और चीन इस बात को सही नहीं मान रहे कि पर्यावरण सुरक्षा की उनकी परियोजनाओं को अगले साल विशेषज्ञों द्वारा ठीक से जांचा परखा जाएगा, इससे पहले कि उन्हें पेरिस समझौते में शामिल किया जाए. लेकिन यूरोपीय देशों के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण है. अमेरिका और चीन के प्रति थोड़ी अविश्वसनीयता साफ हो रही है. सवाल है कि सालों तक पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते रहे देश क्या रातों रात पर्यावरण रक्षक बन सकते हैं? इसका पता लीमा में सम्मेलन के आखिरी दिनों में चलेगा.

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