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OLD - जर्मन चुनाव

क्या राजनीति से ऊब रहा है जर्मन युवा?

जर्मनी में पिछले सालों वोट देने वालों की तादाद लगातार गिरी है. राजनीतिक पार्टियों की शिकायत है कि युवा मतदान में कोई रुचि नहीं दिखा रहे हैं. लेकिन इस साल के चुनाव में भागीदारी बढी है.

जर्मनी के आखेन शहर के आलेक्सांडर ओसलिस्लो ने कम से कम एक बार तो राजनीति को समझने की कोशिश की है. 20 साल के आलेक्सांडर स्टूडेंट हैं और राजनीतिक दलों के बारे में कहते हैं, "वहां ज्यादातर बूढ़े लोग हैं, और जिस तरह से वे राजनीतिक ढांचों के बारे में बात करते हैं, वह युवाओं के लिए अजीब सा है." आलेक्सांडर पिछले पांच साल से ग्रीन पीस के साथ जुड़े हुए हैं. कई बार उन्होंने पर्यावरण को बचाने के लिए रैलियां आयोजित की हैं. तेल रिसाव से होने वाले नुकसान की तरफ लोगों का ध्यान खींचने के लिए तो वह अटलांटिक के उत्तरी सागर में जहाज ले कर भी गए हैं.

बिना पार्टी के ही

आलेक्सांडर की तरह क्लारिसा फिगुरा भी पर्यावरण के लिए काम कर रही हैं. 29 साल की क्लारिसा पिछले कुछ महीनों से ग्रीन पीस के साथ जुडीं हुई हैं. वह हर हफ्ते बॉन शहर में अन्य छात्रों से मिलती हैं और इस बात पर चर्चा करती हैं कि नदियों और सागरों से मछलियों को अंधाधुंध निकालने पर कैसे रोक लगाई जाए. वह समाज में बदलाव लाने के लिए भले ही सक्रिय हों, लेकिन राजनीति से वह दूर भागती हैं, "आप छोटे स्तर पर शुरुआत करते हैं, पहले अपने चुनाव क्षेत्र से. फिर जब तक आप उम्मीदवार बन कर चुने जाते हैं और वाकई कुछ करने की स्थिति में आते हैं, तब तक बहुत वक्त खर्च हो चुका होता है."

Greenpeace Protest Kohle

ग्रीन पीस के प्रदर्शन

युवा कुछ कर दिखाना चाहते हैं, लेकिन पारंपरिक ढंग से पार्टियों के साथ जुड़ कर नहीं. हनोवर यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र पढ़ाने वाले हाइको गाइलिंग का भी यही अनुभव रहा है. डॉयचे वेले से बातचीत में उन्होंने कहा, "अगर आप यह देखें कि 40 प्रतिशत आबादी सामाजिक, राजनीतिक या किसी न किसी रूप से सक्रिय है, तो यह तो बहुत ही अच्छी संख्या है. लेकिन पार्टियां अपनी जो छवि बना लेती हैं, उस से बहुत से लोगों को दिक्कत है." हाइको गाइलिंग का कहना है कि लोगों के लिए ये पार्टियां कंटेनर जैसी होती हैं, "लोग ठीक तरह से नहीं जानते कि उनके अंदर क्या है." वह मानते हैं कि यही वजह है कि युवा पार्टियों की बहस सुनने में कोई रुचि नहीं दिखाते, "इसका मतलब यह है कि अगर वे किसी चीज के लिए लड़ रहे हैं तो वे साथ ही नतीजे भी देखना चाहते हैं."

पार्टियों का भविष्य

दस साल पहले के आंकड़ों को देखें तो पाएंगे कि जर्मनी में करीब 80 फीसदी मतदाता चुनाव में हिस्सा लेते थे. पिछले चुनाव से इसकी तुलना करें तो यह संख्या गिर कर करीब 71 प्रतिशत हो गयी है. ना केवल वोट देने वालों की संख्या में कमी आई है, जर्मनी में पार्टियों को अपने अस्तित्व की भी चिंता सता रही है. पार्टियों में सदस्यों की संख्या कम होती जा रही है और औसत उम्र बढ़ती जा रही है. मिसाल के तौर पर 30 साल पहले एसपीडी पार्टी के हर तीसरे सदस्य की उम्र 35 से कम थी. आज हर 10वें शख्स की उम्र इतनी है.

Reichstag Berlin Flaggen auf Halbmast Tsunami 2004

ना केवल वोट देने वालों की संख्या में कमी आई है, जर्मनी में पार्टियों में सदस्यों की संख्या भी कम होती जा रही है.

राजनीति शास्त्री रोबर्ट फेरकांप इसे चिंताजनक बताते हैं. हालांकि उनका कहना है कि बाकी देशों की तुलना में जर्मनी में हालात बहुत अच्छे हैं. उनके लिए चिंता का विषय चुनाव के दौरान घर से बाहर ना निकलने वाले लोगों की संख्या नहीं है, बल्कि उसकी वजह है, "जिन लोगों की हम बात कर रहे हैं, जो वोट नहीं दे रहे, ये वे लोग हैं जिन्होंने लोकतंत्र से खुद को दूर कर लेने का फैसला किया है." रोबर्ट फेरकांप का कहना है कि ये वे लोग हैं जो समाज के पिछले तबके से नाता रखते हैं और जिन्हें इस बात का अंदाजा नहीं है कि राजनीति उनके लिए कितना मायने रखती है. उनको इस बात का डर है कि यदि ऐसा ही होता रहा तो जर्मनी में सामाजिक रूप से लोकतंत्र बंट जाएगा. और ऐसा सिर्फ राजनीतिक स्तर पर ही नहीं होगा, बल्कि यह युवाओं की एक ऐसी पीढ़ी होगी जो ना ही बच्चों के स्कूलों में कोई रुचि दिखाएगी और ना ही किसी और सामाजिक काम में.

रिपोर्ट: जनेट जाइफर्ट/आईबी

संपादन: महेश झा

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