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दुनिया

क्या राजनाथ से आएगा बीजेपीराज

पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी की जिम्मेदारी संभालने वाले राजनाथ सिंह को बीजेपी में दोबारा अध्यक्ष बना दिया गया है. पार्टी उस बार बुरी तरह हार गई थी लेकिन फिर भी उन्हीं पर जुआ खेला गया. क्या राजनाथ इस बाजी को मार पाएंगे.

चाल चरित्र और चेहरे की बात करने वाली बीजेपी ने चेहरा बदला है. दागी छवि और कमजोर राजनीतिक हैसियत वाले नितिन गडकरी को ठीक चुनाव के पहले किनारे कर दिया गया है, हालांकि इसमें आय कर के छापों ने भी बड़ी भूमिका अदा की है. रिले रेस में बेटन फिर से 61 साल के राजनाथ सिंह के हाथ में दे दी गई है, जिन्होंने खुद यह बेटन 2009 में गडकरी को सौंपी थी.

शानदार जनाधार और साफ छवि वाले राजनाथ एक नाकाम नेता माने जाते हैं. "पद नहीं, बल्कि जिम्मेदारी" के लिए अध्यक्ष बनने वाले राजनाथ का कहना है, "मैं सच में उम्मीद कर रहा हूं कि एनडीए (बीजेपी नेतृत्व वाली) 2014 में सरकार बना पाएगी." हालांकि यह काम कैसे होगा, इसका फॉर्मूला खोला जाना बाकी है. बीजेपी में एक दिन पहले तक यह नहीं पता था कि उनके अध्यक्ष कौन होंगे.

क्यों हटे गडकरी

पार्टी ने संविधान बदल कर गडकरी को दोबारा अध्यक्ष बनाने की तैयारी कर रखी थी लेकिन ऐन मौके पर उनकी कंपनियों पर पड़े आयकर के छापों ने उनका खेल बिगाड़ दिया. राजनीतिक विश्लेषक सुकेश रंजन बताते हैं, "लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में पार्टी ने तय किया कि वह जिस स्तर पर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कांग्रेस का विरोध कर रही है, उसे ध्यान में रखते हुए ऐसे शख्स को अध्यक्ष नहीं बनाया जा सकता, जिस पर खुद दाग लगा हो." हालांकि पार्टी के अंदर बहुत सी आवाजें उठीं लेकिन बीजेपी सर्वसम्मति से अध्यक्ष बनाने की परंपरा को किसी तरह बचाए रखने में कामयाब रही. रंजन कहते हैं कि बीजेपी का आदर्श यानी आरएसएस आखिरी वक्त तक गडकरी के नाम पर अड़ा रहा और इसलिए यह सिर्फ "तकनीकी सर्वसम्मति" है.

Rajnath Singh

पार्टी बड़ा या नेता

आम तौर पर किसी पार्टी का सबसे बड़ा नेता ही उसका अध्यक्ष होता है और पार्टी उसी के नाम पर वोट मांगती है. लेकिन बीजेपी के संविधान के अनुसार अध्यक्ष हर दो साल पर चुना जाता है और कोई अध्यक्ष दो बार से ज्यादा नहीं चुना जा सकता. "संगठन को मजबूत करने और किसी एक पार्टी पर निर्भरता कम करने" की वजह से ऐसे नियम बनाए गए लेकिन बीजेपी की पहचान कभी भी वाजपेयी और आडवाणी की छवि से बाहर नहीं निकल पाई.

अटल बिहारी वाजपेयी बीजेपी के सबसे बड़े नेता रहे, जो तीन बार प्रधानमंत्री बने, जबकि आडवाणी कुछ दिनों तक उप प्रधानमंत्री के पद पर रह पाए. पिछली बार पार्टी ने उन्हें एनडीए का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया और गठबंधन औंधे मुंह गिरी. इस बार आडवाणी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं होंगे. यानी बीजेपी उस चेहरे की तलाश कर रही है, जो उनकी नैया पार कराए. राजनाथ सिंह निश्चित तौर पर ऐसा चेहरा नहीं हैं लेकिन कम से कम नितिन गडकरी से बेहतर हैं. उनके पास उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री पद का अनुभव है और संगठन के मामले में उन्हें मजबूत माना जाता है.

सत्ता का सवाल

राजनाथ सिंह के पास 10 साल से सत्ता से बाहर रहने वाली पार्टी को जिताने के अलावा इसकी छवि बेहतर करने की चुनौती है. बीजेपी अब भी हिन्दुत्व की अपनी छवि से बाहर नहीं निकल पाई है. हालांकि रंजन का कहना है कि राजनाथ के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के अंदर से होगी, "कई बार लोकतांत्रिक ढांचे में आप अति लोकतांत्रिक हो जाते हैं. बीजेपी में ऐसी ही हालत है. कई स्वर सामने आते हैं और राजनाथ सिंह को उन्हें साथ लेकर चलना होगा." राजनाथ को उन सभी नेताओं के साथ रिश्ते बेहतर बनाने होंगे, जो हाल में बड़े नेता बन कर उभरे हैं. इनमें सुषमा स्वराज और अरुण जेटली भी शामिल हैं. सुकेश रंजन का कहना है कि इसके बाद ही उन्हें आगे की रणनीति के लिए सहयोगी पार्टियों की ओर देखना होगा.

तो क्या राजनाथ सिंह की ताजपोशी नरेंद्र मोदी के प्रधानंमत्री पद की दावेदारी पर सवालिया निशान है. यह मुश्किल सवाल है क्योंकि विकास के नाम पर वोट बटोरने वाले मोदी की छवि एक कट्टर हिन्दू नेता की भी है और बीजेपी इस बात को जानती है कि धर्मनिरपेक्ष भारत में मोदी के नाम पर सबसे वोट पाना नामुमकिन है. शायद इसीलिए उसने राजनाथ के रूप में एक और रास्ता खोल लिया है. इस बीच मोदी ने ट्वीट किया, "मैंने श्री राजनाथ सिंहजी को फोन करके बधाई दी है."

रिपोर्टः अनवर जे अशरफ

संपादनः महेश झा

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