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ब्लॉग

क्या भारत में पनप रही है साइंस विरोधी भावना

दुनिया में विज्ञान विरोधी नजरिये की घुसपैठ ने बुद्धिवादियों, वैज्ञानिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को चिंता में डाल दिया है. और तो और अर्थशास्त्री, उद्योगपति और अर्थनीति के जानकार भी इस रवैये से खासे परेशान नजर आते हैं.

ऐसा नहीं है कि पिछड़े हुए या विकासशील देश ही इस रवैये की चपेट में हैं, जहां विज्ञान और अर्थव्यवस्था की तरक्की की रफ्तार अपेक्षाकृत धीमी हैं. वैज्ञानिक सोच के विरोधी समूह अमेरिका, रूस, चीन, जापान जैसे विकसित देशों में भी सक्रिय हो चुके हैं. 2014-15 के सालों में भारत में भी विज्ञान और प्रति-विज्ञान को लेकर टकराव नये सिरे से उभर आए थे. आक्रामक तरीके से ये विचार सामने लाने की कोशिश भी खूब हुई कि "प्राचीन” भारत ज्यादा वैज्ञानिक और ज्यादा प्रौद्योगिकी विचार संपन्न था. जबकि आधुनिकता में प्राचीनता का कभी विरोध होता ही नहीं है, रूढ़ियों का होता है. 2015 में भारतीय विज्ञान कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन में प्राचीन भारत के "आविष्कार” इस अंदाज मे बताए गए कि ये धार्मिक जलसा जैसा हो गया. "आविष्कारों” में अंग प्रत्यारोपण से लेकर विमान तक की दुहाई दी गई थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसमें शिरकत की थी और गणेश का उदाहरण देकर उन्होंने एक तरह से विज्ञान और तर्क के समांतर चल रही एक अवैज्ञानिक और विज्ञान विरोधी धारा को ही पुष्ट किया था. इससे कुछ समय पहले महाराष्ट्र में ही जानेमाने तर्कवादी और अंधविश्वास उन्मूलन अभियान के अगुआ डॉक्टर नरेंद्र दाभोलकर की हत्या कर दी गई थी.

पड़ोसी पाकिस्तान में भी कम बुरे हाल नहीं जहां बददिमागी और अतार्किकता का एक अदृश्य बाजार पनप रहा है. अमेरिका में भी वैज्ञानिक समुदाय इस बात से चिंतित है कि कई लोग अपने बच्चों को टीका लगवाने ही नहीं दे रहे हैं, उनकी दलील है कि टीकाकरण उनके बच्चों में नई बीमारी भर देगा. भूतप्रेत से लेकर "ईश्वरीय शाप” के झांसे में आए लोग अब जलवायु परिवर्तन की मान्य और प्रमाणित अवधारणा को ही सिरे से खारिज करने पर तुले हैं. विज्ञान और तर्क विरोधी रवैये से औद्योगिक विकास का भी पहिया रुक जाने का खतरा पैदा हो गया है. क्योंकि अगर नए आविष्कार नहीं होंगे तो आखिरकार कमाई भी नहीं होगी. विकास और समृद्धि आजकल नई खोजों और बाजार में उनकी खपत पर ही निर्भर है. अगर विज्ञान और प्रौद्योगिकी में नई खोजें, नये अध्ययन, और नये प्रयोग नहीं होंगे तो लोग तो जहां के तहां ही थमे रह जाएंगे. स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक की पूरी शिक्षा चरमरा जाएगी. जीवन में उपयोगी ज्ञान की भारी किल्लत हो जाएगी और अर्थव्यवस्था एक शून्य में स्थिर हो जाएगी.

यही सब सरोकार उन तीन नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों के जेहन में थे जो पिछले दिनों भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय और स्वीडन की नोबेल मीडिया संस्था के साझे कार्यक्रम में शिरकत करने दिल्ली आए थे. विलियम ई मोएर्नर (रसायनशास्त्र 2014), हेराल्ड वारमस (चिकित्सा 1989) और सर्ज आरोश (भौतिकी 2012) ने एंटी-साइंस प्रवृत्ति के प्रति आगाह किया. आशय ये था कि इस "लोकप्रियतावाद” के चक्कर में हम पीढ़ियों और शताब्दियों की मेहनत से हासिल वैज्ञानिक जमीन और वैज्ञानिक जमीर को गंवा न बैठे. ये तीनों वैज्ञानिक संयोगवश गुजरात में होने वाले वाइब्रेंट गुजरात सम्मिट में भी मौजूद थे. विदेशी और देशी निवेशकों को खींचने के लिए इस विराट आयोजन की शुरुआत मोदी के मुख्यमंत्री काल में हुई थी. उसी गुजरात के सरकारी स्कूलों में मीडिया खबरों के मुताबिक ‘तेजोमय भारत' नाम की किताब पढ़ाने को कहा गया जिसमें स्टेम सेल की खोज को कौरवों की पैदाइश से जोड़ दिया गया है, टीवी का श्रेय भी योगविद्या और दिव्यदृष्टि को हासिल है. तथ्य और मिथक के घालमेल से फिर क्या होगा. 

सामाजिक जीवन में निरंतर तार्किकता, चेतना संपन्न बहस का अभाव, धार्मिक कट्टरता का बढ़ता दायरा, मनोरंजन और मीडिया में लोकप्रियतावादी बहसों को बढ़ावा, अंधविश्वासों और रूढ़ियों पर आधारित कार्यक्रमों का बोलबाला, स्कूलों में विज्ञान विषयों की पढ़ाई का कमजोर स्तर, विज्ञान विषयों मे रोचकता का अभाव, बच्चों को विज्ञान और जीवन में तादात्म्य स्थापित करने की प्रेरणा नदारद और खराब आर्थिक स्थितियां. ये कुछ कारण हैं जिसकी वजह से आज एंटीसाइंस विचारधारा तेजी से पांव पसार रही है और लोग विज्ञान से छिटक रहे हैं.

सरकारों को लोकप्रियतावाद का जामा उतार फेंकना होगा. तारीफ और वोट बटोरने के लिए, जैसा जिस समुदाय की रूढ़ियां या कट्टर मान्यताएं हैं, वैसा ही कर देने या बोल देने से दूरगामी नुकसान का ध्यान भी रखना होगा. दोनो चीजें एक साथ नहीं चल सकतीं. एक ओर ऐसी विज्ञान कांग्रेस जहां प्राचीनता के गुणगान के नाम पर मूर्खताओं का बोलबाला हो और दूसरी ओर वाइब्रेंट गुजरात जैसे, बड़ी आर्थिक महत्त्वाकांक्षा वाले आयोजन. सरकार के अलावा एक बार फिर वैज्ञानिक तर्कवादी बौद्धिक बिरादरी पर ये जिम्मेदारी आन पड़ी है कि तमाम जोखिमों के बावजूद उसे समाज में स्वस्थ और प्रगतिशील बहस को जिंदा रखना ही होगा और सरकारों को भी इसके लिए बाध्य करते रहना होगा. सजग इस तौर पर भी रहना होगा कि कहीं विज्ञान और इसकी उपलब्धियां मुक्त बाजार की प्रतिस्पर्धी कुटिलता की शिकार न बन जाएं और वो जनकल्याण के न होकर मुनाफे के औजार बन जाएं.

ब्लॉगः शिवप्रसाद जोशी

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