1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

ब्लॉग

क्या बढ़ती असहिष्णुता का है कोई समाधान?

केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने लेखकों और साहित्यकारों से अपने पुरस्कार ना लौटाने और प्रधानमंत्री से मिलकर चर्चा करने की अपील की है. पर क्या सरकार वाकई कोई समाधान निकालना चाहती है, पूछ रहे हैं कुलदीप कुमार.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के सत्ता में आने के बाद से देश में लगातार बढ़ती जा रही असहिष्णुता और सार्थक संवाद की कम होती जा रही संभावना के खिलाफ विरोध अब केवल कुछ मुट्ठी भर लेखकों, फिल्मकारों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों तक ही सीमित नहीं रह गया है. देश में व्याप्त स्थिति पर चिंता जताने वालों में पूर्व नौसेनाध्यक्ष एडमिरल रामदास, पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में जीनियस माने जाने वाले कंडक्टर जुबिन मेहता, शीर्ष फिल्म अभिनेता शाहरुख खान, चोटी के सरोदवादक अमजद अली खान, उद्योग जगत के एनआर नारायणमूर्ति, किरण शॉ मजूमदार, भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन, प्रसिद्ध वैज्ञानिक पीएम भार्गव और भारतीय मूल के ब्रिटिश अर्थशास्त्री लॉर्ड मेघनाद देसाई के नाम भी जुड़ गए हैं.

रविवार को नई दिल्ली के मावलंकर सभागार में हुई एक विशाल सभा में इरफान हबीब और रोमिला थापर जैसे देश के दिग्गज इतिहासकारों और नब्बे-वर्षीय वयोवृद्ध साहित्यकार कृष्णा सोबती जैसी करिश्माई हस्तियों ने इस "असहिष्णुता की संस्कृति" के खिलाफ जोरदार ढंग से आवाज उठाई और सरकार को चेताया कि वह स्थिति की गंभीरता को समझकर उसे सुधारने की दिशा में प्रयास करे और इस देशव्यापी विरोध को "बनावटी विद्रोह" बता कर खारिज न करे.

क्यों चुप हैं मोदी?

अभी तक सरकार की ओर से इस दिशा में कोई प्रयास नहीं किया गया है. ऐसे में केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह का यह कहना कोई मायने नहीं रखता कि विरोध कर रहे साहित्यकारों द्वारा अपने पुरस्कार और अन्य अलंकरण लौटाना सही नहीं है और उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर बात करनी चाहिए. सवाल यह उठता है कि क्या प्रधानमंत्री की ओर से इस प्रकार की कोई पेशकश हुई है. क्या अभी तक उन्होंने इस विषय पर अपने विचार राष्ट्र के सामने रखे हैं? क्या हर विषय पर लगातार बोलने वाले मोदी गोमांस पर छिड़े विवाद, विवेकवादी लेखकों की हत्या, पाकिस्तानी गायकों और लेखकों के कार्यक्रमों के विरोध, सत्तारूढ़ दल के प्रवक्ताओं, विधायकों, सांसदों और मंत्रियों के विवादास्पद बयानों पर अब तक कोई भी ऐसी प्रतिक्रिया व्यक्त कर पाये हैं जिससे देशवासियों के मन में आश्वस्ति का भाव जग सके?

उल्टे भारतीय जनता पार्टी के एक प्रवक्ता पद्मभूषण लौटाने की घोषणा करने वाले वैज्ञानिक पीएम भार्गव को "सोनिया गांधी का नगाड़ा बजाने वाला" बता चुके हैं, तो एक दूसरे बड़े नेता उन्हें नक्सल-समर्थक की उपाधि से विभूषित कर चुके हैं. केंद्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा लेखकों की पृष्ठभूमि की जांच करवाने की जरूरत बता चुके हैं और कह चुके हैं कि अगर उन्हें इतनी ही दिक्कत है तो वे लिखना बंद क्यों नहीं कर देते. बिहार चुनावों के दौरान अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ बीजेपी के भड़काऊ विज्ञापनों पर स्वयं निर्वाचन आयोग प्रतिबंध लगा चुका है. वित्त और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय संभालने वाले मंत्री अरुण जेटली कह रहे हैं कि स्वयं मोदी ही "वैचारिक असहिष्णुता" के सबसे ज्यादा शिकार हैं और विरोध "प्रायोजित और निर्मित" यानि बनावटी है. ऐसे में राजनाथ सिंह जिस संवाद की शुरुआत का सुझाव दे रहे हैं, उसकी गुंजाइश ही कहां बचती है!

कहां है विकास?

अभी तक सरकार को यह समझ में नहीं आ रहा कि देश भर में व्यापक पैमाने पर लोग इस बात से चिंतित हैं कि प्रधानमंत्री का विकास का एजेंडा पीछे रह गया है और हिंदुत्ववादी विघटनकारी एजेंडा हावी हो गया है. रोजमर्रा के इस्तेमाल की चीजें, खासकर खाने-पीने की वस्तुएं, लगातार महंगी होती जा रही हैं. उधर लगातार ऐसे मुद्दे उठाए जा रहे हैं जो लोगों को आपस में जोड़ते नहीं, बल्कि समाज के एक वर्ग या समुदाय को दूसरे के खिलाफ खड़ा करते हैं. ऐसा माहौल विकास के लिए अनुकूल नहीं कहा जा सकता.

यह अकारण नहीं है कि देश के राष्ट्रपति, जिन पर संविधान की रक्षा करने का दायित्व है, पिछले एक माह में तीन बार सरकार और देश को बढ़ती जा रही असहिष्णुता के प्रति आगाह कर चुके हैं. अब अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसी मूडीज ने भी मोदी सरकार को लगातार बिगड़ती जा रही स्थिति और उसके आर्थिक विकास पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव के प्रति चेताया है. ये सभी सरकार के राजनीतिक विरोधी नहीं हैं और इनकी चेतावनी को केवल "बनावटी विरोध" या "राजनीति-प्रेरित विरोध" कह कर खारिज नहीं किया जा सकता. अभी भी वक्त है जब मोदी सरकार सत्तारूढ़ दल और उसके समर्थक संगठनों के अतिवादी तत्वों पर लगाम लगा कर स्थिति को और अधिक बिगड़ने से बचा सकती है. लेकिन इसके लिए उसे तत्काल पहल करनी होगी.

ब्लॉग: कुलदीप कुमार

DW.COM