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दुनिया

क्या बौद्ध धर्म दलितों की पीड़ा हर पाएगा?

बाबासाहब भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि मैं हिंदू जन्मा अवश्य हूं, इसमें मेरा कोई नियंत्रण नहीं था, किंतु मैं हिंदू रहकर मरूंगा नहीं. उनके कहे इस वाक्य का असर दलितों पर आज भी कायम है.

सैकड़ों सालों से जाति के जंजीर में बंधे दलित, मुक्ति की चाह में हिंदू धर्म को त्याग कर अंबेडकर की तरह बौद्ध धर्म अपना लेते हैं. हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के आत्महत्या कर चुके दलित छात्र रोहित वेमुला की मां और भाई ने अंबेडकर की 125वीं जयंती पर मुंबई में बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया. इसे दलितों के प्रति समाज और सरकार की उपेक्षा से जोड़कर देखा जा रहा है.

क्यों छोड़ते हैं हिंदू धर्म?

14 अप्रैल 1891 को महू में एक दलित हिंदू परिवार में जन्मे बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर हिंदू धर्म में दलितों के साथ होने वाले भेदभाव और छुआछुत से दुखी थे. इसके खिलाफ संघर्ष में कोई उल्लेखनीय सफलता नहीं मिलने पर उन्होंने इस धर्म का त्याग कर दिया. 14 अक्टूर 1956 को उन्होंने लाखों दलितों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली. तब से लाखों दलित बौद्ध धर्म अपना चुके हैं.

हिंदू समाज में बराबरी का हक मांगते दलित अक्सर निराशा में धर्म छोड़ते हैं. यही निराशा रोहित वेमुला के परिवार वालों में देखी जा रही है. रोहित वेमुला के भाई राजा वेमुला का कहना है कि उनके भाई ने अपनी जान इसलिए दी क्योंकि दलित होने के कारण उसे भेदभाव का शिकार होना पड़ा था. उनका कहना है, "मेरा भाई बौद्ध बनना चाहता था. उसने ऐसा करने की कोशिश भी की लेकिन बन न सका."

अंबेडकर जयंती पर हर साल लाखों लोग बौद्ध धर्म में दीक्षित होते हैं. महाराष्ट्र में नवबौद्धों की संख्या ज्यादा है. अब उत्तर प्रदेश और बिहार के बहुत से दलित स्वयं को बौद्ध धर्म से जोड़ने लगे हैं. इस सबके पीछे जातिवाद, भेदभाव और छुआछुत कुछ बड़े कारण हैं. विचार दर्शन में आए परिवर्तन के कारण बहुत कम लोग बौद्ध धर्म अपनाते हैं.

दिवंगत दलित चिंतक प्रोफेसर तुलसीराम का कहना था कि धार्मिक व्यवस्था में बदलाव लाए बगैर सिर्फ कानून के जरिये सामाजिक या धार्मिक स्तर पर दलित उत्पीड़न खत्म नहीं कर सकते. उनके अनुसार हिंदू धर्म की जाति व्यवस्था ही दलित उत्थान में सबसे बड़ी बाधा है.

बौद्ध धर्म में दलित

जागरूक दलितों को अब यह लगने लगा है कि हिंदू धर्म को छोड़ देना ही उनके लिए बेहतर विकल्प हो सकता है. राजनीतिक दलों के लिए दलितों का महत्व 'थोक वोट बैंक' से ज्यादा नहीं है. जागरूक दलितों का एक छोटा वर्ग इस वोट बैंक की दलाली करने लगता है, जबकि शिक्षित-जागरूक दलितों का बड़ा वर्ग अपने आत्मसम्मान के साथ समझौता करते हुए पीड़ा झेलता है. इसी पीड़ा से परेशान होकर इस वर्ग का झुकाव बौद्ध धर्म के प्रति हो जाता है. एक अनुमान के मुताबिक देश में बौद्ध धर्म के लोगों की कुल जनसंख्या 0.84 करोड़ है, जिनमें से अधिकांश नवबौद्ध यानि हिंदू दलितों से धर्म बदल कर बने हैं.

अकेले महाराष्ट्र में लगभग 60 लाख बौद्ध हैं, जो अंबेडकर से प्रभावित हैं. देश के बाकी राज्यों में भी लाखों लोगों ने हिंदू कर्मकांडों को छोड़ दिया है. अछूत समझी जाने वाली जाति से संबंध रखने वाले विनोद आठवले कहते हैं कि पलायन कोई रास्ता नहीं है लेकिन टकराव से भी कुछ हल नहीं निकलेगा. वैसे हिंदू धर्म को छोड़ बौद्ध हुए दलितों की शैक्षिक और आर्थिक स्थिति बेहतर है. इसका कारण नवबौद्धों की जागरुकता को माना जाता है. इसी जागरुकता के कारण उनके रोजगार का प्रतिशत भी बेहतर हुआ है और वे अपेक्षाकृत संपन्न हुए हैं.

कभी दलितों के साथ तो कभी महिलाओं के साथ परंपरा के नाम पर हिंदू धर्म में भेदभाव होता रहा है. अगर ऐसा ही चलता रहा, तो यह सबसे प्राचीन धर्म विघटित होकर कमजोर होता जाएगा. एक जीवंत धर्म की पहचान यही है कि वह समय के साथ चले और समय दकियानूसी विचारों को छोड़ने का है. अन्यथा राम ही जाने राम नवमी मनाने को कितने हिंदू रह जाएंगे!

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