1. Inhalt
  2. Navigation
  3. Weitere Inhalte
  4. Metanavigation
  5. Suche
  6. Choose from 30 Languages

दुनिया

क्या बहुरेंगे गरीबों के दिन?

एक अनुमान के अनुसार देश में गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले परिवारों की संख्या करीब साढ़े पांच करोड़ है, इनकी बुनियादी जरूरतों को ध्यान में रखते हुए सरकार यूनिवर्सल बेसिक इनकम योजना पर विचार कर रही है.

देश में गरीबी एक बड़ा मुद्दा है. आजादी के बाद से इनकी संख्या में लगातार वृद्धि हुई है हालांकि अनुपात के लिहाज से इसमें गिरावट भी आयी है. देश की लगभग सभी सरकारों ने इस वर्ग की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए समय समय पर विभिन्न योजनाओं का सहारा लिया हैं. इस पर हर साल अरबों रुपये खर्च होता है, फिर भी गरीबों की बदहाली दूर नहीं हो पाती. वर्तमान सरकार अब ‘यूनिवर्सल बेसिक इनकम योजना' यानी यूबीआई पर विचार कर रही है जिससे हर व्यक्ति की एक निश्चित आमदनी सुनिश्चित की जा सके.

मील का पत्थर

यूनिवर्सल बेसिक इनकम के तहत देश के प्रत्येक नागरिक के लिए एक आधारभूत आय की व्यवस्था का लक्ष्य तय किया जाता है. सरकार की यह महत्वकांक्षी योजना अभी विचार के स्तर पर ही है. इस साल के आर्थिक सर्वे में इस योजना पर जोर दिया गया लेकिन आम बजट में इसका उल्लेख नहीं किया गया. मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने इसकी वकालत करते हुए कहा कि यूबीआई एक बड़ी योजना होगी. उनके अनुसार गरीबी उन्मूलन की दिशा में यह योजना मील का पत्थर साबित हो सकती है.

देश भर में केंद्र सरकार की तरफ से प्रायोजित योजनाओं की संख्या 900 से अधिक है. जीडीपी बजट आवंटन में इनकी हिस्सेदारी पांच फीसदी के आसपास है. इसे ध्यान में रखते हुए सर्वे में यूबीआई को मौजूदा स्कीमों के लाभार्थियों के लिए विकल्प के तौर पर पेश करने का प्रस्ताव दिया गया है. आर्थिक सर्वे के अनुसार इस तरह से तैयार किए जाने पर यूबीआई न केवल जीवन स्तर बेहतर कर सकता है, बल्कि मौजूदा योजनाओं का प्रशासनिक स्तर भी बेहतर कर सकता है.

सब्सिडी का विकल्प

आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार सरकार भोजन, रोजगार, बिजली, पानी, खाद, तेल, गैस पर मिल रही सब्सिडी तथा बेरोजगारी भत्ते व वृद्धावस्था पेंशन जैसे जन-कल्याण से जुड़े विभिन्न कार्यक्रमों पर हर साल अरबों रुपये धन खर्च करती हैं. इसमें धांधली और कमियों की वजह से इसका पूरा फायदा जनता को नहीं मिल पाता. यूबीआई योजना के समर्थकों को लगता है कि इसमें कोई धांधली या खामी नहीं होगी और जरूरतमंद को सीधा फायदा मिलेगा. अरविंद सुब्रमण्यम के अनुसार यह गरीबी घटाने के लिए जारी कल्याणकारी योजनाओं का विकल्प साबित होगी.

इस योजना का खाका अब तक पेश नहीं किया गया है इसलिए खजाने पर पड़ने वाले बोझ का अनुमान लगाना संभव नहीं है. सरकार लाभार्थी के खाते में सालाना 10,000 से 15,000 रुपये की राशि जमा कर सकती है. अगर इस योजना से सभी को जोड़ने की कवायद की जाती है तो सरकारी खजाने पर पड़ने वाले बोझ की रकम 15 लाख करोड़ तक जा सकती है. वैसे, इसकी शुरुआत गरीबों को निश्चित आर्थिक रकम देकर की जा सकती है. उस स्थिति में भी कम से कम तीन लाख करोड़ की आवश्यकता होगी. इस योजना को मौजूदा सब्सिडी को खत्म करके उसके विकल्प के रूप में इसे शुरू किया जा सकता है.

चुनौति

आर्थिक सर्वे में इसकी चुनौतियों को भी सामने रखा गया है. इसमें आशंका जताई गई है कि यह मौजूदा कल्याणकारी योजनाओं की जगह लेने के बजाय एक समानांतर व्यवस्था भी बन सकती है और ऐसा होने पर वित्तीय रूप से उपयोगी नहीं रह जाएगी. सरकार फिलहाल इसे लागू करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है. सरकार ने अपने आर्थिक सर्वे में यूबीआई को लेकर चर्चा तो की है लेकिन पेश आम बजट में इसका उल्लेख नहीं किया गया. अर्थशास्त्री डॉ. अभय पेठे का कहना है कि मौजूदा सब्सिडी के साथ इस योजना को लागू कर पाना इतना आसान नहीं है. इसको चरणबद्ध तरीके से लागू करने की जरूरत है ताकि सरकारी खजाने पर बोझ न बढ़ने पाए. प्रोफेसर अरुण कुमार जन-कल्याण से जुड़ी समस्त सरकारी योजनाओं को समाप्त कर यूबीआई को लागू करने के तर्क को उचित नहीं मानते. योजना की व्यावहारिकता पर सवाल उठाते हुए सीपीआई के राष्ट्रीय सचिव अतुल अंजान का कहना है ग्रामीण भारत के लोगों की जिंदगी सवारने पर सरकार को ध्यान देना चाहिए.

समाजशास्त्री डॉ साहेबलाल का कहना है, "अच्छा कदम होते हुए भी इसमें काफी चुनौतियाx है, सब्सिडी खत्म करना सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती है, एकदम से ऐसे कदम नहीं उठाये जा सकते हैं."  उनके अनुसार, राजनीतिक दलों और अन्य पक्षकारों के बीच इसको लेकर एक सकारात्मक वातावरण बनाने की आवश्यकता है, अन्यथा यह उल्टे परिणाम देगी. जानकारों के अनुसार योजना के लाभार्थी को एक निश्चित रकम देना तभी कारगर होगा जब उस रकम से उसकी बुनियादी ज़रूरते पूरी हो जाए. अन्यथा यह योजना मील का पत्थर साबित होने की बजाय झुनझना बनकर रह जाएगी.

 

DW.COM

संबंधित सामग्री